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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 99

From जैनकोष



एवंविधे समये भवत् यत्सामायिकं पञ्चप्रकारपापात् साकल्येन व्यावृत्तिस्वरूपं तस्योत्तरोत्तरा वृद्धि: कर्तव्येत्याह --


एकान्ते सामयिकं निर्व्याक्षेपे वनेषु वास्तुषु च
चैत्यालयेषु वापि च परिचेतव्यं प्रसन्नधिया ॥99॥


टीका: 

परिचेतव्यं वृद्धिं नेतव्यम् । किं तत् ? सामायिकम् । क्व ? एकान्ते स्त्रीपशुपाण्डुकिविवर्जिते प्रदेशे । कथम्भूते ? निव्र्याक्षेपे चित्तव्याकुलतारहिते शीतवातदंशमशकादिबाधावर्जित: इत्यर्थ: इत्थम्भूते एकान्ते । क्व ? वनेषु अटवीषु, वास्तुषु च गृहेषु, चैत्यालयेषु च अपिशब्दाद् गिरिगह्वरादिपरिग्रह: । केन चेतव्यम् ? प्रसन्नधिया प्रसन्ना अविक्षिप्ता धीर्यस्यात्मनस्तेन अथवा प्रसन्नासै धीश्च तया कृत्वा आत्मना परिचेतव्यमिति ॥




सामायिक योग्य स्थान




एकान्ते सामयिकं निर्व्याक्षेपे वनेषु वास्तुषु च

चैत्यालयेषु वापि च परिचेतव्यं प्रसन्नधिया ॥99॥


टीकार्थ:

सामायिक के लिए एकान्त स्थान होना चाहिए । एकान्त का अर्थ है, जिस स्थान में स्त्री, पशु और नपुंसक आदि का आवागमन न हो । निव्र्याक्षेप अर्थात् चित्त को व्याकुल करने वाले शीत, वायु तथा डांस मच्छर आदि की बाधा से रहित हो, एकान्त स्थान चाहे अटवी हो या घर, देवस्थान अथवा अपि शब्द से पर्वत, गुफा आदि कोई भी स्थान हो, वहाँ पर प्रसन्नचित्त होकर सामायिक करना चाहिए । प्रसन्नधिया शब्द का 'प्रसन्ना-अविक्षिप्ता धीर्यस्य स प्रसन्नधीस्तेन' इस प्रकार बहुब्रीहि समास और 'प्रसन्ना चासौ धीश्च इति प्रसन्नधीस्तया' इस प्रकार कर्मधारय समास भी होता है । इस विशेष्य और हेतु को बतलाया है ।



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