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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 103

From जैनकोष



तथा सामायिकं स्वीकृतवन्तो ये तेऽपरमपि किं कुर्वन्तीत्याह --


शीतोष्णदंशमशकपरीषहमुपसर्गमपि च मौनधराः
सामयिकं प्रतिपन्ना अधिकुर्वीरन्नचलयोगाः ॥103॥


टीका: 

अधिकुर्वीरन् सहेरन्नित्यर्थ: । के ते ? सामयिकं प्रतिपन्ना: सामायिकं स्वीकृतवन्त: । किं विशिष्टा: सन्त: ? अचलयोगा: स्थिरसमाधय: प्रतिज्ञानुष्ठानापरित्यागिनो वा । तथा मौनधरास्तत्पीडायां सत्यामपि क्लीबादिवचनानुच्चारका: दैन्यादिवचनानुच्चारका: । कमधिकुर्वीरन्नित्याह- शीत्येत्यादि-शीतोष्णदंशमशकानां पीडाकारिणां तत्परिसमन्तात् सहनं तत्परीषहस्तं, न केवलं तमेव अपि तु उपसर्गमपि च देवमनुष्यतिर्यक्कृतम् ॥




परीषह / उपसर्ग सहने का उपदेश




शीतोष्णदंशमशकपरीषहमुपसर्गमपि च मौनधराः

सामयिकं प्रतिपन्ना अधिकुर्वीरन्नचलयोगाः ॥103॥


टीकार्थ:

जिन्होंने सामायिक को स्वीकार किया है, ऐसे गृहस्थ ध्यान में स्थिर होकर ध्यान करने की प्रतिज्ञा से चलायमान नहीं होते हुए तथा मौनव्रतधारी बनकर शीत-उष्ण, डांस-मच्छर आदि की पीड़ाकारक परीषह को तथा देव-मनुष्य एवं तिर्यञ्चों के द्वारा किये गये उपसर्ग को दीनतापूर्वक शब्दों का उच्चारण नहीं करते हुए सहन करें ।



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