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ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 115

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साम्प्रतं नवप्रकारेषु प्रतिग्रहादिषु क्रियमाणेषु कस्मात् किं फलं सम्पद्यत इत्याह --


उच्चैर्गोत्रं प्रणतेर्भोगो, दानादुपासनात्पूजा
भक्तेः सुन्दररूपं स्तवनात्कीर्तिस्तपोनिधिषु ॥115॥


टीका: 

तपोनिधिषु यतिषु । प्रणते: प्रणामकरणादुच्चैर्गोत्रं भवति । तथा दानादशनशुद्धिलक्षणाद्भोगो भवति । उपासनात् प्रतिग्रहणादिरूपात् सर्वत्र पूजा भवति । भक्तेर्गुणानुरागजनितान्त: श्रद्धाविशेषलक्षणाया: सुन्दररूपं भवति । स्तवनात् श्रुतजलधीत्यादिस्तुतिविधानात् सर्वत्र कीर्तिर्भवति ॥




नवधा भक्ति का फल




उच्चैर्गोत्रं प्रणतेर्भोगो, दानादुपासनात्पूजा

भक्तेः सुन्दररूपं स्तवनात्कीर्तिस्तपोनिधिषु ॥115॥


टीकार्थ:

यतियों को प्रणाम करने से उच्चगोत्र का बंध होता है । भोजन की शुद्धिपूर्वक दान देने से भोगों की प्राप्ति होती है । पडग़ाहनादि करने से सर्वत्र पूजा-प्रभावना होती है । भक्ति -- उनके गुणानुराग से उत्पन्न अन्तरङ्ग में श्रद्धाविशेष से सुन्दररूप और स्तुति अर्थात् 'आप ज्ञान के सागर स्वरूप हैं' इत्यादि स्तुति करने से कीर्ति प्राप्त होती है ।



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