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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 116

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नन्वेवंविधं विशिष्टं फलं स्वल्पं दानं कथं सम्पादयतीत्याशङ्काऽपनोदार्थमाह --


क्षितिगतमिव वटबीजं पात्रगतं दानमल्पमपि काले
फलतिच्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृताम् ॥116॥


टीका: 

अल्पमपि दानमुचितकाले । पात्रगतं सत्पात्रे दत्तम् । शरीरभृतां संसारिणाम् । इष्टं फलं बह्वनेकप्रकारं सुन्दररूपभोगोपभोगादिलक्षणं फलति । कथम्भूतम् ? छायाविभवं छाया माहात्म्यं विभव: सम्पत् तौ विद्येते यत्र । अस्यैवार्थस्य समर्थनार्थं क्षितीत्यादिदृष्टान्तमाह । क्षितिगतं सुक्षेत्रे निक्र्षिप्तं यथा अल्पमति वटबीजं बहुफलं फलति । कथम्? छायाविभवं छाया आतपनिरोधिनी तस्या विभव: प्राचुर्यं यथा भवत्येवं फलति ॥




अल्पदान से महाफल




क्षितिगतमिव वटबीजं पात्रगतं दानमल्पमपि काले

फलतिच्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृताम् ॥116॥


टीकार्थ:

सत्पात्र को दिया गया अल्प भी दान संसारी प्राणियों को सुन्दर रूप तथा भोगोपभोगादि अनेक प्रकार के इष्ट फल प्रदान करता है । दान के पक्ष में छाया विभवं का समास - 'छाया माहात्म्यं विभव: सम्पत् तौ विद्येते यत्र' यह फल का विशेषण है । छाया का अर्थ माहात्म्य होता है और विभव का अर्थ सम्पत्ति होता है। छाया और माहात्म्य ये दोनों जिस फल में विद्यमान हैं, उस फल की प्राप्ति दान देने से होती है । जिस प्रकार उत्तम भूमि में बोया गया छोटा-सा वट का बीज प्राणियों को बहुत भारी छाया और बहुत अधिक रूप में फल प्रदान करता है । 'छाया-आतपनिरोधिनी तस्या विभव: प्राचुर्यं यथाभवत्येवं' इस प्रकार वटबीज पक्ष में छाया का अर्थ धूप का अभाव और विभव का अर्थ प्राचुर्य-अधिकता लिया गया है ।



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