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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 134

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ते तत्राविकृतात्मान: सदा स्थिता: किं कुर्वन्तीत्याह-


नि:श्रेयसमधिपन्ना-स्त्रैलोक्यशिखामणिश्रियं दधते
निष्किट्टिकालिकाच्छवि-चामीकरभासुरात्मान: ॥134॥


टीका: 

नि:श्रेयसमधिपन्ना: प्राप्तास्ते दधते धरन्ति । काम् ? त्रैलोक्यशिखामणिश्रियं त्रैलोक्यस्य शिखा चूडाऽप्रभागस्तत्र मणिश्री: चूडामणिश्री: ताम् । किंविशिष्टा: सन्त इत्याह- निष्किट्टेत्यादि । किट्टं च कालिका च ताभ्यां निष्क्रान्ता सा छविर्यस्य तच्चामीकरं च सुवर्णं तस्येव भासुरो निर्मलतया प्रकाशमान आत्मा स्वरूपं येषाम् ॥




मुक्तजीव कहाँ रहते हैं ?




नि:श्रेयसमधिपन्ना-स्त्रैलोक्यशिखामणिश्रियं दधते

निष्किट्टिकालिकाच्छवि-चामीकरभासुरात्मान: ॥134॥


टीकार्थ:

जिस प्रकार कीट-कालिमा से रहित होकर सुवर्ण कान्ति को धारण करता हुआ अतिशय दीप्तिमान होता है, उसी प्रकार द्रव्यकर्म-भावकर्मरूपी कालिमा का अभाव हो जाने से यह आत्मा पूर्णरूप से निर्मल होता हुआ प्रकाशमान रहता है । ऐसे सिद्ध परमेष्ठी लोक के शिखर पर चूड़ामणि की शोभा को धारण करते हैं ।



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