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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 135

From जैनकोष



एवं सल्लेखनामनुतिष्ठतां नि:श्रेयसलक्षणं फलं प्रतिपाद्य अभ्युदयलक्षणं फलं प्रतिपादयन्नाह-


पूजार्थाज्ञैश्वर्यै:, बलपरिजनकामभोगभूयिष्ठै:
अतिशयितभुवनमद्भुत-मभ्युदयं फलति सद्धर्म: ॥135॥


टीका: 

अभ्युदयम् इन्द्रादिपदावाप्तिलक्षणम् । फलति अभ्युदयफलं ददाति । कोऽसौ ? सद्धर्मसल्लेखनानुष्ठानोपार्जितं विशिष्टं पुण्यम् । कथम्भूतमभ्युदयम् ? अद्भुतं साश्चर्यम् । कथम्भूतं तदद्भुतम् ? अतिशयितभुवनं यत: । कै: कृत्वा ? पूजार्थाज्ञैश्वर्यै: ऐश्वर्यशब्द: पूजार्थाज्ञानां प्रत्येकं सम्बध्यते । किंविशिष्टैरेतैरित्याह- बलेत्यादि । बलं सामथ्र्यं परिजन: परिवार: कामभोगौ प्रसिद्धौ । एतद्भूयिष्ठा अतिशयेन बहवो येषु । एतैरुपलक्षितै: पूजादिभिरतिशयितभुवनमित्यर्थ: ॥




सद्धर्म का फल




पूजार्थाज्ञैश्वर्यै:, बलपरिजनकामभोगभूयिष्ठै:

अतिशयितभुवनमद्भुत-मभ्युदयं फलति सद्धर्म: ॥135॥


टीकार्थ:

सल्लेखना धारण करने से उपार्जित हुआ विशिष्ट पुण्यरूप समीचीन धर्म उस आश्चर्यकारी अभ्युदय-इन्द्रादिकरूप फल को देता है, जो बल, परिजन, काम तथा भोगों से परिपूर्ण पूजा, अर्थ, आज्ञारूप ऐश्वर्य के द्वारा समस्त लोक को अभिभूत करता है ।



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