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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 68

From जैनकोष



तत्र दिग्व्रतस्वरूपं प्ररूपयन्नाह --


दिग्वलयं परिगणितं कृत्वातोऽहं बहिर्न यास्यामि
इति सङ्कल्पो दिग्व्रतमामृत्यणुपापविनिवृत्यै ॥68॥


टीका: 

दिग्व्रतं भवति । कोऽसौ ? सङ्कल्प: । कथम्भूतम् ? अतोऽहं बहिर्न यास्यामी त्येवं रूप: । किं कृत्वा ? दिग्वलयं परिगणितं कृत्वा समर्यादं कृत्वा । कथम् ? आमृति मरणपर्यन्तं यावत् । किमर्थम् ? अणुपापविनिवृत्यै सूक्ष्मस्यापि पापस्य विनिवृत्त्यर्थम् ॥




दिग्व्रत का लक्षण




दिग्वलयं परिगणितं कृत्वातोऽहं बहिर्न यास्यामि

इति सङ्कल्पो दिग्व्रतमामृत्यणुपापविनिवृत्यै ॥68॥


टीकार्थ:

दसों दिशाओं में सीमा निर्धारित करके ऐसा संकल्प करना कि मैं इस सीमा से बाहर नहीं जाऊंगा, इसे दिग्व्रत कहते हैं । दिग्व्रत मरणपर्यन्त के लिए धारण किया जाता है । दिग्व्रत का प्रयोजन सूक्ष्म पापों से निवृत्त होता है । अर्थात् मर्यादा के बाहर सर्वथा जाना-आना बन्द हो जाने से वहाँ सूक्ष्म पाप की भी निवृत्ति हो जाती है ।



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