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ग्रन्थ

ग्रन्थ:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 70

From जैनकोष



एवं दिग्विरतिव्रतं धारयतां मर्यादात: परत: किं भवतीत्याह --


अवधे-र्बहिरणुपाप-प्रतिविरतेर्दिग्व्रतानि धारयतां
पञ्च महाव्रतपरिणति-मणुव्रतानि प्रपद्यन्ते ॥70॥


टीका: 

अणुव्रतानि प्रपद्यन्ते । काम् ? पञ्चमहाव्रतपरिणतिम् । केषाम् ? धारयताम् । कानि ? दिग्व्रतानि । कुतस्तत्परिणतिं प्रपद्यन्ते ? अणुपापप्रतिविरते: सूक्ष्ममपि पापं प्रतिविरते: व्यावृत्ते: । क्व ? बहि: । कस्मात् ? अवधे: कृतमर्यादाया: ॥




दिग्व्रत की मर्यादा के बाहर अणुव्रतों के महाव्रतपना




अवधे-र्बहिरणुपाप-प्रतिविरतेर्दिग्व्रतानि धारयतां

पञ्च महाव्रतपरिणति-मणुव्रतानि प्रपद्यन्ते ॥70॥


टीकार्थ:

जो मनुष्य दसों दिशाओं में आने-जाने की मर्यादा करके मर्यादा के बाहर नहीं आता-जाता, इसलिए स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही प्रकार के पाप छूट जाते हैं । अतएव मर्यादा के बाहर अणुव्रत भी महाव्रतपने को प्राप्त हो जाते हैं ।



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