• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 2

From जैनकोष



368. किं ता भूमयो नारकाणां सर्वत्रावासा आहोस्वित्‍क्‍वचित्‍क्‍वचिदिति प्रन्निर्धारणार्थमाह-
368. क्‍या इन भूमियों में सर्वत्र नारकियों के निवास-स्‍थान हैं या कहीं-कहीं, इस बात का निश्‍चय करने के लिए अब आगे का सूत्र कहते हैं-
तासु त्रिंशत्‍पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि पंच चैव यथाक्रमम् ।।2।।
उन भूमियों में क्रम से तीस लाख, पचीस लाख, पन्‍द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पाँच कम एक लाख और पाँच नरक हैं ।।2।।
369. तासु रत्‍नप्रभादिषु भूमिषु नरकाण्‍यनेन संख्‍यायन्‍ते यथाक्रमम्। रत्‍नप्रभायां त्रिंशन्‍नरकशतसहस्राणि, शर्कराप्रभायां पञ्चविंशतिर्नरकशतसहस्राणि, वालुकाप्रभायां पञ्चदश नरकशतसहस्राणि, पंकप्रभायां दश नरकशतसहस्राणि, धूमप्रभायां त्रीणि नरकशतसहस्राणि, तमःप्रभायां पञ्चोनमेकं नरकशतसहस्रं, महातमःप्रभायां पञ्च नरकाणि। रत्‍नप्रभायां नर‍कप्रस्‍तारास्‍त्रयोदश। ततोऽध आ सप्‍तम्‍या द्वौ[1] द्वौ नरकप्रस्‍तारौ[2] हीनौ। इतरो विशेषो लोकानुयोगतो[3] वेदितव्‍यः।
369. उन रत्‍नप्रभा आदि भूमियों में, इस सूत्र द्वारा क्रम से नरकों की संख्‍या बतलायी गयी है। रत्‍नप्रभा में तीस लाख नरक हैं। शर्कराप्रभा में पचीस लाख नरक हैं। वालुकाप्रभा में पन्‍द्रह लाख नरक हैं। पंकप्रभा में दश लाख नरक हैं। धूमप्रभा में तीन लाख नरक हैं। तमःप्रभा में पाँच कम एक लाख नरक हैं और महातमःप्रभा में पाँच नरक हैं। रत्‍नप्रभा में तेरह नरकपटल हैं। इससे आगे सातवीं भू‍मि तक दो-दो नरक पटल कम हैं। इसके अतिरिक्‍त और विशेषता लोकानुयोग से जान लेनी चाहिए।
विशेषार्थ- पहले सात पृथिवियों का निर्देश किया ही है। उनमें से पहली पृथिवी के तीन भाग हैं- खरभाग, पंकभाग और अब्‍बहुल भाग। खर भाग सबसे ऊपर है। इनमें रत्‍नों की बहुताय‍त है और यह सोल‍ह हजार योजन मोटा है। दूसरा पंकभाग है, इसकी मोटाई चौरासी हजार योजन है। तथा तीसरा अब्‍बहुल भाग है। इसकी मोटाई अस्‍सी हजार योजन है। नारकियों के रहने के आवास को नरक कहते हैं। रत्‍नप्रभा भूमि के प्रथम भाग और दूसरे भाग में नरक नहीं हैं। तीसरे भाग में हैं। इस प्रकार प्रथम भूमि के तीसरे भाग की और शेष छह भूमियों की जितनी-जितनी मोटाई बतलायी है उसमें से ऊपर और नीचे एक-एक हजार योजन भूमि को छोड़कर सातों भूमियों के बाकी के मध्‍य भाग में नरक हैं। इनका आकार विविध प्रकार का है। कोई गोल हैं, कोई त्रिकोण हैं, कोई चौकोण हैं और कोई अनिश्चित आकार वाले हैं। ये सब नरकपटल क्रम से अवस्थित हैं। जिस प्रकार पत्‍थर या मिट्टी के एक थर पर दूसरा थर अवस्थित होता है उसी प्रकार ये पटल हैं। पहली भूमि में ये पटल तेरह हैं और आगे की भूमियों में क्रम से दो-दो पटल कम होते गये हैं। एक पटल दूसरे पटल से सटा हुआ है। इनमें नरक हैं। नरक जमीन के भीतर कुएं के समान पोल का नाम है। यह ऊपर, नीचे चारों ओर जमीन से घिरी रहती है। इन्‍हीं नरकों में नारकी जीव अपनी आयु के अन्तिम समय तक रहते हैं और वहाँ नाना प्रकार के दुःख भोगते हैं।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ सप्‍तम्‍या द्वं द्वं नरक-आ. दि.1, दि. 2 ।
  2. ↑ -प्रस्‍तारा हीनाः। इतरो आ. दि. 1. दि. 2 ।
  3. ↑ लोकानियोगतो दि. 1, दि. 2 ।
Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि_-_अधिकार_3_-_सूत्र_2&oldid=135914"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 6 May 2026, at 16:14.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki