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ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 3

From जैनकोष



370. अथ तासु भूमिषु नारकाणां कः प्रतिविशेष इत्‍यत आह-
370. उन भूमियों में रहने वाले नारकियों में क्‍या विशेषता है इस बात को बतलाने के लिए अब आगे सूत्र को कहते हैं-
नारका नित्‍याशुभतरलेश्‍यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ।।3।।
नारकी निरन्‍तर अशुभतर लेश्‍या, परिणाम, दे‍ह, वेदना और विक्रिया वाले हैं ।।3।।
371. लेश्‍यादयो व्‍याख्‍यातार्थाः। अशुभतरा इति प्रकर्षनिर्देशः तिर्यग्‍गतिविषयाशुभलेश्‍याद्यपेक्षया अधोऽधः स्‍वगत्‍यपेक्षया च वेदितव्‍यः। ‘नित्‍य’शब्‍द[1] आभीक्ष्‍ण्‍यवचनः। नित्‍यमशुभतरा लेश्‍यादयो येषां ते नित्‍याशुभतरलेश्‍यापरिणामदेहवेदनाविक्रिया नारकाः। प्रथमाद्वितीययोः कापोती लेश्‍या, तृतीयायामुपरिंष्‍टात्‍कापोती अधो नीला, चतुर्थ्‍यां नीला, पञ्चम्‍यामुपरि नीला अधः कृष्‍णा, षष्‍ठयां कृष्‍णा, सप्‍तम्‍यां परमकृष्‍णा। स्‍वायुः[2]प्रमाणावधृता[3] द्रव्‍यलेश्‍या उक्‍ताः। भावलेश्‍यास्‍तु अन्‍तमुहूर्तपरिवर्तिन्‍यः। परिणामाः स्‍पर्शरसगन्‍धवर्णशब्‍दाः क्षेत्रविशेषनिमित्‍तवशादतिदुःखहेतवोऽशुभतराः। देहाश्‍च तेषामशुभनाम[4]कर्मोदयादत्‍यन्‍ताशुभतरा विकृताकृतयो हुण्‍डकसंस्‍थाना[5] दुर्दर्शनाः। तेषामुत्‍सेधः प्रथमायां सप्‍त धनूंषि त्रयो हस्‍ताः षडंगुलयः। अधोऽधो-द्विगुणद्विगुण[6] उत्‍सेधः। अभ्‍यन्‍तरासद्वेद्योदये सति अनादिपारिणामिकशीतोष्‍णबाह्यनिमित्‍तजनिता[7] अतितीव्रा वेदना भवन्ति नारकाणाम्। प्रथमाद्वितीयातृतीयाचतुर्थीषु उष्‍णवेदनान्‍येव नरकाणि। पञ्चम्‍यामुपरि उष्‍णवेदने द्वे नरकशतसहस्रे। अधः शीतवेदन[8]मेकं शतसहस्रम्। षष्‍ठीसप्‍तम्‍योः शीतवेदनान्‍येव। शुभं[9] विकरिष्‍याम इति अशुभतरमेव विकुर्वन्ति, सुखहेतूनुत्‍पादयाम इति दुःखहेतूनेवोत्‍पादयन्ति। त एते भावा अधोऽधोऽशुभतरा वेदितव्‍याः।
371. लेश्‍यादिक का पहले व्‍याख्‍यान कर आये हैं। ‘अशुभतर’ इस पद के द्वारा तिर्यंचगति में प्राप्‍त होने वाली अशुभ लेश्‍या आदिक की अपेक्षा और नीचे-नीचे अपनी गति की अपेक्षा लेश्‍यादिक की प्रकर्षता बतलायी है। अर्थात् तिर्यंचों में जो लेश्‍यादिक हैं उनसे प्रथम नरक के नारकियों के अधिक अशुभ हैं आदि। नित्‍य शब्‍द आभीक्ष्‍ण्‍य अर्थात् निरन्‍तरवाची है। तात्‍पर्य यह है कि नारकियों की लेश्‍या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रिया निरन्‍तर अशुभ होते हैं। यथा, प्रथम और दूसरी पृथिवी में कापोत लेश्‍या है। तीसरी पृथिवी में ऊपर के भाग में कापोत लेश्‍या है और नीचे के भाग में नील लेश्‍या है। चौथी पृथिवी में नील लेश्‍या है। पाँचवीं पृथिवी में ऊपर के भाग में नील लेश्‍या है और नीचेके भागमें कृष्‍ण लेश्‍या है। छठी पृथिवीमें कृष्‍ण लेश्‍या है। और सातवीं पृथिवीमें परम कृष्‍ण लेश्‍या है। द्रव्‍य लेश्‍याएँ अपनी आयु तक एक सी कही गयी हैं। किन्‍तु भावलेश्‍याएँ अन्‍तर्मुहूर्त में बदलती रहती हैं। परिणाम से यहाँ स्‍पर्श, रस, गन्‍ध, वर्ण और शब्‍द लिये गये हैं। ये क्षेत्रविशेष के निमित्त से अत्‍यन्‍त दुःख के कारण अशुभतर हैं। नारकियों के शरीर अशुभ नामकर्म के उदय से होने के कारण उत्‍तरोत्तर अशुभ हैं। उनकी विकृत आकृति है, हुंडक संस्‍थान है और देखने में बुरे लगते हैं। उनकी ऊँचाई प्रथम पृथिवी में सात धनुष, तीन हाथ और छह अंगुल है। तथा नीचे-नीचे प्रत्‍येक पृथिवी में वह दूनी-दूनी है। ना‍रकियों के अभ्‍यन्‍तर कारण असाता वेदनीय का उदय रहते हुए अनादिकालीन शीत और उष्‍णरूप बाह्य निमित्त से उत्‍पन्‍न हुई तीव्र वेदना होती है। पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी पृथिवी में मात्र उष्‍ण वेदना वाले नरक हैं। पाँचवीं पृथिवी में ऊपर के दो लाख नरक ऊष्‍ण वेदना वाले हैं। और नीचे के एक लाख नरक शीत वेदना वाले हैं। तथा छठी और सातवीं पृथिवी के नरक शीत वेदना वाले ही हैं। नारकी ‘शुभ विक्रिया करेंगे’ ऐसा विचार करते हैं पर उत्तरोत्तर अशुभ विक्रिया को ही करते हैं। ‘सुखकर हेतुओं को उत्‍पन्‍न करेंगे’ ऐसा विचार करते हैं, परन्‍तु वे दुःखकर हेतुओं को ही उत्‍पन्‍न करते हैं। इस प्रकार ये भाव नीचे-नीचे अशुभतर जानने चाहिए।
विशेषार्थ- यहाँ टीका में लेश्‍या के दो भेद कर के भावलेश्‍या अन्‍तमुहूर्त में बदलती रहती है यह कहा है। सो इसका तात्‍पर्य यह है कि जहाँ जो भावलेश्‍या कही है उसमें परिवर्तन नहीं होता। मात्र उसमें योग और कषाय के अनुसार तरतमभाव होता रहता है; क्‍योंकि प्रत्‍येक नारकी के वही योग और वही कषाय रहनी चाहिए ऐसा नियम नहीं है। किन्‍तु अपने- अपने जघन्‍य, मध्‍यम और उत्‍कृष्‍ट काल के अनुसार या द्रव्‍य, क्षेत्र और भाव के अनुसार योग और कषाय का परिवर्तन नियम से होता है। यतः कषायानुरंजित योगप्रवृत्ति का नाम लेश्‍या है अतः योग और कषाय के बदलने से अपनी मर्यादा के भीतर वह भी बदल जाती है। मात्र जहाँ कापोत लेश्‍या का जघन्‍य अंश कहा है वहाँ वही रहता है वह बदलकर कापोत लेश्‍या का मध्‍यम और उत्‍कृष्‍ट अंश नहीं होता या जहाँ परम कृष्‍ण लेश्‍या कही है वहाँ वही रहती है वह बदल कर अन्‍य लेश्‍या नहीं होती। शेष कथन सुगम है।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ ‘अय खलु नित्‍यशब्‍दो नावश्‍यं कूटस्‍थेष्‍वविचालिषु भावेषु वर्तते। किं तर्हि ? आभीक्ष्‍ण्‍येऽपि वर्तते। तद्यथा-नित्‍यप्रहसितो नित्‍यप्रजल्पि‍त इति।’ पा. म. भा. पृ. 57।
  2. ↑ स्‍वायुधः प्रमा-मु, ता., ना.,।
  3. ↑ -माणेऽववृता आ., दि. 1, दि. 2 ।
  4. ↑ नामोदया- आ., दि. 1, दि. 2।
  5. ↑ संस्‍थापना। तेषां आ., दि. 1, दि. 1, दि. 2।
  6. ↑ द्विगुणो द्विगुण आ., दि. 1, दि. 2।
  7. ↑ जनिताः सुतीव्रा मु, दि. 1, दि.2, आ., ता.।
  8. ↑ वेदनानामेकं आ., दि. 1, दि. 2।
  9. ↑ शुभं करि- मु., आ., दि. 1, दि. 2।
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