ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 4
From जैनकोष
372. किमेतेषां नारकाणां शीतोष्णजनितमेवदुःखमुतान्यथापि भवतीत्यत आह-
372.क्या इन नारकियों के शीतोष्णजनित ही दुःख है या दूसरे प्रकार का भी दुःख है, इस बात को बतलाने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
परस्परोदीरितदुःखाः ।।4।।
तथा वे परस्पर उत्पन्न किये गये दुःख वाले होते हैं ।।4।।
373. कथं परस्परोदीरितदुःखत्वम् ? नारकाः[1] भवप्रत्ययेनावधिना मिथ्यादर्शनोदयाद्विभङ्गव्यपदेशभाजा च दूरादेव दुःखहेतूनवगम्योत्पन्नदुःखाः प्रत्यासत्तौ परस्परालोकनाच्च प्रज्वलितकोपाग्नयः पूर्वभवानुस्मरणाच्चातितीव्रानु-बद्धवैराश्च श्वश्रृगालादिवत्स्वाभिघाते प्रवर्तमानाः स्वविक्रियाकृतासिवासीपरशुभिण्डिमालशक्तितोमरकुन्तायोधनादिभिरायुधैः स्वकरचरणदशनैश्च छेदनभेदनतक्षणदंशनादिभिः परस्परस्यातितीव्रं दुःखमुत्पादयन्ति।
373. शंका- नारकी परस्पर एक-दूसरे को कैसे दुःख उत्पन्न करते हैं ? समाधान-नारकियों के भवप्रत्यय अवधिज्ञान है जिसे मिथ्यादर्शन के उदय से विभंगज्ञान कहते हैं। इस ज्ञान के कारण दूर से ही दुःख के कारणों को जानकर उनको दुःख उत्पन्न हो जाता है और समीप में आने पर एक-दूसरे को देखने से उनकी क्रोधाग्नि भभक उठती है। तथा पूर्वभव का स्मरण होनेसे उनकी वैर की गाँठ और दृढ़तर हो जाती है। जिससे वे कुत्ता और गीदड़ के समान एक-दूसरे का घात करनेके लिए प्रवृत्त होते हैं। वे विक्रिया से तलवार, बसूला, फरसा, हाथ से चलाने का तीर, बर्छी, तोमर नाम का अस्त्र विशेष, बरछा और हथौड़ा आदि अस्त्र-शस्त्र बनाकर उनसे तथा अपने हाथ, पाँव और दाँतों से छेदना, भेदना, छीलना और काटना आदि के द्वारा परस्पर अतितीव्र दुःख को उत्पन्न करते हैं।
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सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका
- ↑ नारकाणम् ? भव-मु., ता., ना.।