ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 5
From जैनकोष
374. किमेतावानेव दुःखोत्पत्तिकारणप्रकार उतान्योऽपि कश्चिदस्तीत्यत आह-
374. जिन कारणों से दुःख उत्पन्न होता है वे क्या इतने ही हैं या और भी हैं ? अब इस बात का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः ।।5।।
और चौथी भूमि से पहले तक वे संक्लिष्ट असुरों के द्वारा उत्पन्न किये गये दुःख वाले भी होते हैं ।।5।।
375. देवगतिनामकर्मविकल्पस्यासुरत्वसंवर्तनस्य कर्मण उदयादस्यन्ति परानित्यसुराः। पूर्वजन्मनि[1] भावितेनातितीव्रेणं संक्लेशपरिणामेन यदुपार्जितं पापकर्म तस्योदयात्सततं क्लिष्टाः[2] संक्लिष्टाः, संक्लिष्टा असुराः संक्लिष्टासुराः। संक्लिष्टा इति विशेषणान्न सर्वे असुरा नारकाणां दुःखमुत्पादयन्ति। किं तर्हि ? अम्बावरीषादय एव केचनेति। अवधिप्रदर्शनार्थं ‘प्राक्चतुर्थ्याः’ इति विशेषणम्। उपरि तिसृषु पृथ्वीषु संक्लिष्टासुरा बाधाहेतवो नातः परमिति प्रदर्शनार्थम्। ‘च’ शब्दः पूर्वोक्तदुःखहेतुसमुच्चयार्थः। सुतप्तायोरसपायननिष्टप्तायस्तम्भालिङ्गनकूट-शाल्मल्यारोहणावतरणायोधनाभिघातवासीक्षुरतक्षणक्षारतप्ततैलावसेचनायःकुम्भीपाकाम्बरीषभर्जनवैतरणीमज्जनयन्त्रनिष्पीडनादिभिर्नारकाणां दुःखमुत्पादयन्ति। एवं छेदनभेदनादिभिः शकलीकृतमूर्तीनामपि तेषां न मरणमकाले भवति। कुतः ? अनपवर्त्यायुष्कत्वात्[3]।
375. देवगति नामक नामकर्म के भेदों में एक असुर नामकर्म है जिसके उदय से ‘परान् अस्यन्ति’ जो दूसरों को फैंकते हैं उन्हें असुर कहते हैं। पूर्व जन्म में किये गये अतितीव्र संक्लेश रूप परिणामों से इन्होंने जो पापकर्म उपार्जित किया उसके उदय से ये निरन्तर क्लिष्ट रहते हैं इसलिए संक्लिष्ट असुर कहलाते हैं। सूत्र में यद्यपि असुरों को संक्लिष्ट विशेषण दिया है पर इसका यह अर्थ नहीं है कि सब असुर नारकियों को दुःख उत्पन्न कराते हैं। किन्तु अम्बावरीष आदि कुछ असुर ही दुःख उत्पन्न कराते हैं। मर्यादा के दिखलाने के लिए सूत्र में ‘प्राक् चतुर्थ्याः’ यह विशेषण दिया है। इससे यह दिखलाया है कि ऊपर की तीन पृथिवीयों में ही संक्लिष्ट असुर बाधा के कारण है, इसके आगे नहीं। सूत्र में ‘च’ शब्द पूर्वोक्त दुःख के कारणों का समुच्चय करने के लिए दिया है। परस्पर खूब तपाया हुआ लोहे का रस पिलाना, अत्यन्त तपाये गये लौहस्तम्भ का आलिंगन, कूट सेमर के वृक्ष पर चढ़ाना-उतारना, लोहे के घन से मारना, बसूला और छुरा से तरासना, तपाये गये खारे तेलसे सींचना, तेल की कढाई में पकाना, भाड़ में भूँजना, वैतरणी में डूबाना, यन्त्र से पेलना आदि के द्वारा नारकियोंके परस्पर दुःख उत्पन्न कराते हैं। इस प्रकार छेदन, भेदन आदि के द्वारा उनका शरीर खण्ड-खण्ड हो जाता है तो भी उनका अकाल में मरण नहीं होता है, क्योंकि उनकी आयु घटती नहीं।
विशेषार्थ- नारक जीव स्वभाव से क्रूर स्वभाव वाले होते हैं। एक-दूसरे को देखते ही उनका क्रोध भभक उठता है और वे एक-दूसरे को मारने काटने लगते हैं। उनका शरीर वैक्रियक होता है इसलिए उससे वे नाना प्रकार के आयुध आदिका आकार धारण कर उनसे दूसरे नारकियों को पीडा़ पहुँचाते हैं। तीसरे नरक तक देवों का भी गमन होता है, इसलिए ये भी कुतुहल वश उन्हें आपस में भिड़ा देते हैं और उनका घात-प्रत्याघात देखकर मजा लूटते हैं। पर यह काम सब देव नहीं करते किन्तु अम्बावरीष आदि जातिके कुछ ही असुर कुमार देव करते हैं। इतना सब होते हुए भी उन नारकियोंका अकाल मरण नहीं होता इतना यहाँ विशेष जानना चाहिए।