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ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 6

From जैनकोष



376. यद्येवं, तदेव तावदुच्‍यतां नारकाणामायुःपरिमाणमित्‍यत आह –
376. यदि ऐसा है तो य‍ह कहिए कि उन नारकियों की कितनी आयु है ? इसी बात को बतलाने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
तेष्‍वेक‍त्रिसप्‍तदशसप्‍तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्‍त्‍वानां परा स्थितिः ।।6।।
उन नरकों में जीवों की उत्‍कृष्‍ट स्थिति क्रम से एक, तीन, सात, दस, सत्रह, बाईस और तैंतीस सागरोपम है ।।6।।
377. यथाक्रममित्‍यनुवर्तते। तेषु नरकेषु भूमिक्रमेण यथासंख्‍यमेकादयः स्थितयोऽभिसंबध्‍यन्‍ते। रत्‍नप्रभायामुत्‍कृष्‍टा स्थि‍तिरेकसागरोपमा। शर्कराप्रभायां त्रिसागरोपमा। वालुकाप्रभायां सप्‍तसागरोपमा। पंकप्रभायां दशसागरोपमा। धूमप्रभायां सप्‍तदशसागरोपमा। तमःप्रभायां द्वाविंशतिसागरोपमा। महातमःप्रभायां त्रयस्त्रिंशतत्‍सागरोपमा इति। परा उत्‍कृष्‍टेत्‍यर्थः। ‘सत्त्वानाम्’ इति वचनं भूमिनिवृत्त्यर्थम्। भूमिषु सत्त्वानामियं स्थितिः, न भूमीनामिति।
377. इस सूत्र में ‘यथाक्रमम्’ इस पद की अनुवृत्ति होती है। जिससे उन नरकों में भूमि के क्रम से एक सागरोपम आदि स्थितियों का क्रम से सम्‍बन्‍ध हो जाता है। रत्‍नप्रभा में एक सागरोपम उत्‍कृष्‍ट स्थिति है। शर्कराप्रभा में तीन सागरोपम उत्‍कृष्‍ट स्थिति है। वालुकाप्रभा में सात सागरोपम उत्‍कृष्‍ट स्थिति है। पंकप्रभा में दस सागरोपम उत्‍कृष्‍ट स्थिति है। धूमप्रभा में सत्रह सागरोपम उत्‍कृष्‍ट स्थिति है। तमःप्रभा में बाईस सागरोपम उत्‍कृष्‍ट स्थिति है और महातमःप्रभा में तैंतीस सागरोपम उत्‍कृष्‍ट स्थिति है। ‘परा’ शब्‍द का अर्थ ‘उत्‍कृष्‍ट’ है। और ‘सत्त्वानाम्’ पद भूमियों के निराकरण के लिए दिया है। अभिप्राय य‍ह है कि भूमियों में जीवों की यह स्थिति है, भूमियों की नहीं।
378. उक्‍तः सप्‍तभूमिविस्‍तीर्णोऽधोलोकः। इदानीं तिर्यग्‍लोको वक्‍तव्‍यः। कथं पुनस्तिर्यग्‍लोकः। यतोऽसंख्‍येयाः स्‍वयंभूरमणपर्यन्‍तास्तिर्यक्‍प्रचयविशेषेणावस्थिता द्वीपसमुद्रास्‍ततस्तिर्यग्‍लोक इति। के[1] पुनस्तिर्यग्‍व्‍यवस्थिता इत्‍यत आ‍ह-


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सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ के पुनस्‍ते तिर्य- आ., दि. 1।
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