ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 7
From जैनकोष
378. सात भूमियों में फैले हुए अधोलोक का वर्णन किया। अब तिर्यग्लोक का कथन करना चाहिए। शंका- तिर्यग्लोक यह संज्ञा क्यों है ? समाधान- चूँकि स्वयम्भूरमण समुद्र पर्यन्त असंख्यात द्वीप-समुद्र तिर्यक् प्रचयविशेषरूप से अवस्थित हैं, इसलिए तिर्यग्लोक संज्ञा है। वे तिर्यक् रूप से अवस्थित क्या हैं इस बात का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः।।7।।
जम्बूद्वीप आदि शुभ नाम वाले द्वीप और लवणोद आदि शुभ नाम वाले समुद्र हैं।।7।।
379. जम्बूद्वीपादयो द्वीपाः। लवणोदादयः समुद्राः। यानि लोके शुभानि नामानि तन्नामनस्ते। तद्यथा- जम्बूद्वीपो द्वीपः। लवणोदः समुद्रः। धातकीखण्डो द्वीपः। कालोदः समुद्रः। पुष्कररवरो द्वीपः। पुष्करवरः समुद्रः। वारुणीवरो द्वीपः। वारुणीवरः समुद्रः। क्षीरवरो द्वीपः। क्षीरवरः समुद्रः। घृतवरो द्वीपः। घृतवरः समुद्रः। इक्षुवरो द्वीपः। इक्षुवरः समुद्रः। नन्दीश्वरवरो द्वीपः। नन्दीश्वरवरः समुद्रः। अरुणवरो द्वीपः। अरुणवरः समुद्रः। इत्येवमसंख्येया द्वीपसमुद्राः स्वयंभूरमणपर्यन्ता वेदितव्याः।
379. जम्बूद्वीप आदिक द्वीप हैं और लवणोद आदिक समुद्र हैं। तात्पर्य यह है कि लोक में जितने शुभ नाम हैं उन नाम वाले वे द्वीप-समुद्र हैं। यथा- जम्बूद्वीप नामक द्वीप, लवणोद समुद्र, धातकीखण्ड द्वीप, कालोद समुद्र, पुष्करवर द्वीप, पुष्करवर समुद्र, वारुणीवर द्वीप, वारुणीवर समुद्र, क्षीरवर द्वीप, क्षीरवर समुद्र, घृतवर द्वीप, घृतवर समुद्र, इक्षुवर द्वीप, इक्षुवर समुद्र, नन्दीश्वरवर द्वीप, नन्दीश्वरवर समुद्र, अरुणवर द्वीप और अरुणवर समुद्र, इस प्रकार स्वयंभूरमण पर्यन्त असंख्यात द्वीप-समुद्र जानने चाहिए।