ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 8
From जैनकोष
380. अमीषां विष्कम्भसंनिवेशसंस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह-
380. अब इन द्वीप-समुद्रों के विस्तार, रचना और आकार-विशेष का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः ।।8।।
वे सभी द्वीप और समुद्र दूने-दूने व्यास वाले, पूर्व-पूर्व द्वीप और समुद्र को वेष्टित करने वाले और चूड़ी के आकार वाले हैं ।।8।।
381. द्विर्द्विरिति [1]वीप्साभ्यावृत्तिवचनं विष्कम्भद्विगुणत्वव्याप्त्यर्थम् । आद्यस्य द्वीपस्य यो विष्कम्भः तद्द्विगुणविष्कम्भो लवणजलधिः। तद्द्विगुणविष्कम्भो द्वितीयो द्वीपः। तद्द्विगुणविष्कम्भो द्वितीयो जलधिरिति। द्विर्द्विर्विष्कम्भो येषां ते द्विर्द्विर्विष्कम्भाः। पूर्वपूर्वपरिक्षेपिवचनं ग्रामनगरादिवद्विनिवेशो मा विज्ञायीति। वलयाकृतिवचनं चतुरस्रादिसंस्थानान्तरनिवृत्त्यर्थम्।
381. द्वीप-समुद्रों का विस्तार दूना-दूना है इस बात को दिखलाने के लिए सूत्र में ‘द्विर्द्विः’ इस प्रकार वीप्सा अर्थ में अभ्यावृत्ति वचन है। प्रथम द्वीप का जो विस्तार है लवणसमुद्र का विस्तार उससे दूना है तथा दूसरे द्वीप का विस्तार इससे दूना है और समुद्र का इससे दूना है। इस प्रकार उत्तरोत्तर दूना-दूना विस्तार है। तात्पर्य यह है कि इन द्वीप-समुद्रों का विस्तार दूना-दूना है, इसलिए सूत्र में उन्हें दूने-दूने विस्तार वाला कहा है। ग्राम और नगरादिक के समान इन द्वीप-समुद्रों की रचना न समझी जाये इस बात को बतलाने के लिए सूत्र में ‘पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणः’ यह वचन दिया है। अर्थात् वे द्वीप और समुद्र उत्तरोत्तर एक दूसरे को घेरे हुए हैं। सूत्र में जो ‘वलयाकृतयः’ वचन दिया है वह चौकोर आदि आकारों के निराकरण करने के लिए दिया है।
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सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका
- ↑ वीप्सायां वृत्तिवचनं आ., दि. 1, दि. 2, मु.।