ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 9
From जैनकोष
382. अत्राह, जम्बूद्वीपस्य प्रदेशसंस्थानविष्कम्भा वक्तव्यास्तन्मूलत्वादितरविष्कम्भादिविज्ञानस्येत्युच्यते-
382. अब पहले जम्बूद्वीप का आकार और विस्तार कहना चाहिए, क्योंकि दूसरे द्वीप-समुद्रों का विस्तार आदि तन्मूलक है, इसलिए आगे का सूत्र कहते हैं-
तन्मध्ये मेरुनाभिवृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ।।9।।
उन सब के बीच में गोल और एक लाख योजन विष्कम्भ वाला जम्बूद्वीप है। जिसके मध्य में नाभि के समान मेरु पर्वत है ।।9।।
383. तेषां मध्ये तन्मध्ये। केषाम् ? पूर्वोक्तानां[1] द्वीपसमुद्राणाम्। नाभिरिव नाभिः[2]। मेरुर्नाभिर्यस्य स मेरुनाभिः। वृत्त आदित्यमण्डलोपमानः। शतानां सहस्रं शतसहस्रम्। योजनानां शतसहस्रं योजनशतसहस्रम्। योजनशतसहस्रं विष्कम्भो यस्य सोऽयं योजनशतसहस्रविष्कम्भः। कोऽसौ ? जम्बूद्वीपः। कथं जम्बूद्वीपः ? जम्बूवृक्षोपलक्षितत्वात्। उत्तरकुरूणां मध्ये जम्बूवृक्षोऽनादिनिधनः पृथिवीपरिणामो[3]ऽकृत्रिमः सपरिवारस्तदुपलक्षितोऽयं द्वीपः।
383. ‘तन्मध्ये’ पद का अर्थ है ‘उनके बीच में’। शंका-किन के बीच में? समाधान-पूर्वोक्त द्वीप और समुद्रों के बीच में। नाभिस्थानीय होने से नाभि कहा है। जिसका अर्थ मध्य है। अभिप्राय यह है कि जिसके मध्य में मेरु पर्वत है, जो सुर्यके मण्डलके समान गोल है और जिसका एक लाख योजन विस्तार है ऐसा यह जम्बूद्वीप है। शंका-इसे जम्बूद्वीप क्यों कहते हैं ? समाधान- जम्बूवृक्षसे उपलक्षित होनेके कारण इसे जम्बूद्वीप कहते हैं। उत्तरकुरुमें अनादिनिधन, पृथिवी से बना हुआ, अकृत्रिम और परिवार वृक्षों से युक्त जम्बूवृक्ष है, उसके कारण यह जम्बूद्वीप कहलाता है।
विशेषार्थ- अधोलोक का विवेचन कर आये हैं। इसके बाद मध्यलोक है। यह रत्नप्रभा पृथिवी के ऊपरी भाग पर अवस्थित है। इसमें गोल आकार को लिये हुए और एक के बाद एक को घेरे हुए असंख्यात द्वीप और समुद्र हैं। इन सबके बीचमें जम्बूद्वीप है। इसके बीचमें और दूसरा द्वीप समुद्र नहीं है। यद्यपि गोल तो सब द्वीप और समुद्र हैं पर सब चूडी़ के समान गोल हैं और यह थाली के समान गोल है। इसका व्यास एक लाख योजन है। इसके ठीक बीच में मेरु पर्वत है। यह एक लाख चालीस योजन ऊँचा है। इसमें से एक हजार योजन जमीन में है। चालीस योजन की आखीर में चोटी है और शेष निन्यानबे हजार योजन का समतल से चूलिका तक है। प्रारम्भ में जमीन पर मेरु पर्वत का व्यास दस हजार योजन है। ऊपर क्रम से घटता गया है। जिस हिसाब से ऊपर घटा है उसी हिसाब से जमीन में उसका व्यास बढा है। मेरु पर्वत के तीन काण्ड है। पहला काण्ड जमीन से पाँच सौ योजन का, दूसरा साढे़ बासठ हजार योजन का और तीसरा छत्तीस हजार योजन का है। प्रत्येक काण्ड के अन्त में एक-एक कटनी है। जिसका एक ओर का व्यास पाँचसौ योजन है। अन्तिम कटनी का व्यास मात्र छह योजन कम है। एक जमीन पर और तीन इन तीन कटनियों पर इस प्रकार यह चार वनों से सुशोभित है। इनके क्रम से भद्रसाल, नन्दन, सौमनस और पाण्डुक ये नाम हैं। पहलीं और दूसरी कटनी के बाद मेरु पर्वत सीधा गया है फिर क्रम से घटने लगता है। इसके चारों वनों में चारों दिशाओं में एक-एक वन में चार-चार इस हिसाब से सोलह चैत्यालय हैं। पाण्डुक वन में चारों दिशाओं में चार पाण्डुक शिलाएँ हैं जिन पर उस-उस दिशा के क्षेत्रों में उत्पन्न हुए तीर्थंकरों का अभिषेक होता है। इसका रंग पीला है।