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ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 21

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405. सरितो न वाप्‍यः। ताः किमन्‍तरा उत समीपा इति ? आह- तन्‍मध्‍यगाः तेषां क्षेत्राणां मध्‍यं[1] तन्‍मध्‍यम्। तन्‍मध्‍यं तन्‍मध्‍येन वा गच्‍छन्‍तीति तन्‍मध्‍यगाः। एकत्र सर्वासां प्रसंगनिवृत्‍त्‍यर्थं दिग्विशेषप्रतिपत्‍त्‍यर्थं चाह-
405. ये नदियाँ हैं तालाब नहीं। वे नदियाँ अन्‍तराल से हैं या पास-पास इस बात का खुलासा करने के लिए सूत्र में ‘तन्‍मध्‍यगाः’ पद दिया है। इसका यह भाव है कि उन क्षेत्रों में या उन क्षेत्रों में से होकर वे नदियाँ बही हैं। एक स्‍थान में सबका प्रसंग प्राप्‍त होता है, अतः इसका निराकरण करके दिशा विशेष का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः ।।21।।
दो-दो नदियों में से पहली-पहली नदी पूर्व समुद्र को जाती है ।।21।।
406. द्वयोर्द्वयोः सरितोरेकैकं क्षेत्रं विषय इति वाक्‍यशेषाभिसंबन्‍धादेकत्र सर्वासां प्रसंगनिवृत्तिः कृता। ‘पूर्वाः पूर्वगाः’ इति वचनं दिग्विशेषप्रतिपत्त्यर्थम्। तत्र पूर्वा याः सरितस्‍ताः पूर्वगाः। [2]पूर्वजलधिं गच्‍छन्‍तीति पूर्वगाः। किमपेक्षं पूर्वत्‍वम् ? सूत्रनिर्देशापेक्षम्। यद्येवं गङ्गासिन्‍ध्‍वादयः सप्‍त पूर्वगा इति प्राप्‍तम् ? नैष दोष; द्वयोर्द्वयोरित्‍यभिसंबन्‍धात्। द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगा इति वेदितव्‍याः।
406. इस सूत्र में ‘दो-दो नदियाँ एक-एक क्षेत्र में हैं’ इस प्रकार वाक्‍य विशेष का सम्‍बन्‍ध कर लेने से एक क्षेत्रमें सब नदियों के प्रसंग होने का निराकरण हो जाता है। ‘पूर्वाः पूर्वगाः’ यह वचन दिशा विशेष का ज्ञान करान के लिए दिया है। इन नदियों में जो प्रथम नदियाँ हैं वे पूर्व समुद्र में जाकर मिली हैं। सूत्र में जो ‘पूर्वगाः’ पद है उसका अर्थ ‘पूर्व समुद्रको जाती हैं’ यह है। शंका-पूर्वत्‍व किस अपेक्षा से है ? समाधान-सूत्र में किये गये निर्देश की अपेक्षा। शंका-यदि ऐसा है तो गंगा, सिन्‍धु आदि सात नदियाँ पूर्व समुद्र को जानेवाली प्राप्‍त होती है ? समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्‍योंकि ‘द्वयोः द्वयोः’ इन पदों का सम्‍बन्‍ध है। तात्‍पर्य यह है कि दो-दो नदियों में से प्रथम-प्रथम नदी बहकर पूर्व समुद्र में मिली है।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ मध्‍यं तन्‍मध्‍यं तन्‍मध्‍येन मु.। मध्‍यं तन्‍मध्‍येन आ., दि. 1, दि.2।
  2. ↑ -पूर्व जलधिं मु.।
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