ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 22
From जैनकोष
407. इतरासां दिग्विभागप्रतिपत्त्यर्थमाह-
407. अब इतर नदियों के दिशाविशेष का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
शेषास्त्वपरगाः ।।22।।
किन्तु शेष नदियाँ पश्चिम समुद्र को जाती हैं ।।22।।
408. द्वयोर्द्वयोर्या अवशिष्टास्ता अपरगाः प्रत्येतव्याः। अपरसमुद्रं गच्छन्तीत्यपरगाः। तत्र पद्मह्रदप्रभवा पूर्वतोरणद्वारनिर्गता गङ्गा। अपरतोरणद्वारनिर्गता सिन्धुः। उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता रोहितास्या। महापद्मह्रदप्रभवा [1]अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता रोहित्। उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता हरिकान्ता। तिगिञ्छह्रदप्रभवा दक्षिणतोरणद्वारनिर्गता हरित्। उद्वीच्यतोरणद्वारनिर्गता सीतोदा। केसरिह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सीता। उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता नरकान्ता। महापुण्डरीकह्रदप्रभवा दक्षिणतोरणद्वारनिर्गता नारी। उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता रूप्यकूला। पुण्डरीकह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सुवर्णकूला। पूर्वतोरणद्वारनिर्गता रक्ता। [2]प्रतीच्यतोरणद्वारनिर्गता रक्तोदा।
408. दो-दो नदियों में जो शेष नदियाँ हैं वे बहकर पश्चिम समुद्र में मिली हैं। ‘अपरगाः’ पद का अर्थ अपर समुद्र को जाती है यह है। उनमें से पद्म तालाब से उत्पन्न हुई और पूर्व तोरणद्वार से निकली हुई गंगा नदी है। पश्चिम तोरणद्वार से निकली हुई सिन्धु नदी है तथा उत्तर तोरणद्वार से निकली हुई रोहितास्या नदी है। महापद्म तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वार से निकली हुई रोहित नदी है तथा उत्तर तोरणद्वार से निकली हुई हरिकान्ता नदी है। तिगिंछ तालाब से उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वार से निकली हुई हरित नदी है। और उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई सीतोदा नदी है। केसरि तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई सीता नदी है तथा उत्तर तोरणद्वार से निकली हुई नरकान्ता नदी है। महापुण्डरीक तालाब से उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वार से निकली हुई नारी नदी है। तथा उत्तर तोरणद्वार से निकली हुई रूप्यकूला नदी है। पुण्डरीक तालाब से उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वार से निकली हुई सुवर्णकूला नदी है। पूर्व तोरणद्वार से निकली हुई रक्ता नदी है और पश्चिम तोरणद्वार से निकली हुई रक्तोदा नदी है।