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ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 23

From जैनकोष



409. तासां परिवारप्रतिपादनार्थमाह-
409. अब इनकी परिवार-नदियों का कथन करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
चतुर्दशनदीस‍हस्रपरिवृत्‍ता गंगासिन्‍ध्‍वादयो नद्यः ।।23।।
गंगा और सिन्‍धु आदि नदियों की चौदह-चौदह हजार परिवार नदियाँ हैं ।।23।।
410. किमर्थं ‘गङ्गासिन्‍ध्‍वादि’ ग्र‍हणं क्रियते ? नदीग्रहणार्थम्। प्रकृतास्‍ता अभिसंबध्‍यन्‍ते ? नैवं शंक्‍यम्; [1]‘अनन्‍तरस्‍य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा’ इति अपरगाणामेव ग्रहणं स्‍यात्। गङ्गादिग्रहणमेवास्‍तीति चेत् ? पूर्वगाणामेव ग्रहणं स्‍यात्। अत उभयीनां ग्रहणार्थं ‘गङ्गासिन्‍ध्‍वादि’ ग्रहणं क्रियते। ‘नदी’ग्रहणं द्विगुणा द्विगुणा इत्‍यभिसंबन्‍धार्थम्। गङ्गा चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृत्‍ता। सिन्‍धुरपि। एवमुत्‍तरा अपि नद्यः प्रतिक्षेत्रं तद्द्विगुणद्विगुणा[2] भवन्ति; आ विदेहान्‍तात्। तत उत्‍तरा अर्द्धार्द्धहीनाः।
410. शंका-‘गंगा सिन्‍धु आदि’ पद का ग्रहण किसलिए किया गया है ? समाधान-नदियोंका ग्रहण करने के लिए। शंका-उनका तो प्रकरण है ही, अतः ‘गङ्गासिन्‍ध्‍वादि’ पद के बिना ग्रहण किये ही उनका सम्‍बन्‍ध हो जाता है ? समाधान-ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्‍यों‍कि ‘अनन्‍तर का विधान होता है या प्रतिषेध’ इस नियम के अनुसार पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों का ही ग्रहण होता है जो कि इष्‍ट नहीं, अतः सूत्रमें ‘गङ्गासिन्‍ध्‍वादि’ पद दिया है। शंका-तो सूत्रमें ‘गङ्गादि’ इतने पद का ही ग्रहण रहे ? समाधान-यदि ‘गङ्गादि’ इतने पदका ही ग्रहण किया जाये तो पूर्व की ओर बहने वाली नदियों का ही ग्रहण होवे जो भी इष्‍ट नहीं, अतः दोनों प्रकार की नदियों का ग्रहण करने के लिए ‘गङ्गासिन्‍ध्‍वादि’ पद का ग्रहण किया है। यद्यपि ‘गङ्गासिन्‍ध्‍वादि’ इतने पद के ग्रहण करने से ही यह बोध हो जाता है कि ये नदियाँ हैं, फिर भी सूत्र में जो ‘नदी’ पद का ग्रहण किया है वह ‘द्विगुणा द्विगुणाः’ इसके सम्‍बन्‍ध के लिए किया है। गंगा की परिवार नदियाँ चौदह हजार हैं। इसी प्रकार सिन्‍धु की भी परिवार नदियाँ चौदह हजार हैं। इस प्रकार आगे की परिवार नदियाँ विदेह पर्यन्‍त दूनी-दूनी होती गयी हैं। और इससे आगे की परिवार नदियाँ आधी-आधी होती गयी हैं।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ पा. म. भा., पृ. 335।
  2. ↑ -क्षेत्रं द्विगुणा द्विगुणा मु.।
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