ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 24
From जैनकोष
411. उक्तानां क्षेत्राणां विष्कम्भप्रतिपत्त्यर्थमाह-
411. अब उक्त क्षेत्रों के विस्तार का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
भरतः षड्विंशतिपञ्चयोजनशतविस्तारः षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ।।24।।
भरत क्षेत्र का विस्तार पाँच सौ छब्बीस सही छह बटे उन्नीस योजन है ।।24।।
412. षडधिका विंशतिः षड्विंशशतिः। षड्विंशतिरधिका[1] येषु तानि षड्विंशानि। षड्विंशानि पञ्चयोजनशतानि विस्तारो यस्य षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारो भरतः। किमेतावानेव ? न; इत्याह षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य विस्तारोऽस्येत्यभिसंबध्यते।
412. यहाँ टीका में पहले ‘षड्विंशतिपंचयोजनशतविस्तारः’ पद का समास किया गया है जिसका अभिप्राय यह है कि भरतवर्ष पाँच सौ छब्बीस योजनप्रमाण विस्तार से युक्त है। शंका-क्या इसका इतना ही विस्तार है ? समाधान-नहीं, क्योंकि इसका एक योजन का छह बटे उन्नीस योजन विस्तार और जोड़ लेना चाहिए।
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सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका
- ↑ रधिकानि येषु मु.।