ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 39
From जैनकोष
440. यथैवेते[1] उत्कृष्टजघन्ये स्थिती नृणां तथैव-
440. जिस प्रकार मनुष्यों की यह उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति है उसी प्रकार-
तिर्यग्योनिजानां च ।।39।।
तिर्यंचों की स्थिति भी उतनी ही है ।।39।।
441. तिरश्चां योनिस्तिर्यग्योनिः। तिर्यग्गतिनामकर्मोदयापादितं जन्मेत्यर्थः। तिर्यग्योनौ जातास्तिर्यग्योनिजाः। तेषां तिर्यग्योनिजानामुत्कृष्टा भवस्थितिस्त्रिपल्योपमा। जघन्या अन्तर्मुहूर्ता। मध्येऽनेकविकल्पाः।
441. तिर्यंचों की योनि को तिर्यग्योनि कहते हैं। इसका अर्थ तिर्यंचगति नामकर्म के उदय से प्राप्त हुआ जन्म है। जो तिर्यंचयोनि में पैदा होते हैं वे तिर्यग्योनिज कहलाते हैं। इन तिर्यंचयोनि से उत्पन्न जीवों की उत्कृष्ट भवस्थिति तीन पल्योपम और जघन्य भवस्थिति अन्तर्मुहूर्त है। तथा बीच की स्थिति के अनेक विकल्प हैं।
विशेषार्थ- स्थिति दो प्रकार की होती है-भवस्थिति और कायस्थिति। एक पर्याय में रहने में जितना काल लगे वह भवस्थिति है। तथा विवक्षित पर्या यके सिवा अन्य पर्याय में उत्पन्न न होकर पुनः पुनः उसी पर्याय में निरन्तर उत्पन्न होने से जो स्थिति प्राप्त होती है वह कायस्थिति है। यहाँ मनुष्यों और तिर्यंचोंकी भवस्थिति कही गयी है इनकी जघन्य कायस्थिति जघन्य भवस्थिति प्रमाण है, क्योंकि एक बार जघन्य आयु के साथ भव पाकर उसका अन्य पर्याय में जाना संभव है। मनुष्यों की उत्कृष्ट कायस्थिति पूर्वकोटिपृथक्त्व अधिक तीन पल्योपम है। पृथक्त्व यह रौढिक संज्ञा है। मुख्यतः इसका अर्थ तीन से ऊपर और नौसे नीचे होता है। यहाँ बहुत अर्थ में पृथक्त्व शब्द आया है। तिर्यंचों की उत्कृष्ट कायस्थिति अनन्तकाल है जो असंख्यात पुद्गल परिवर्तनों के बराबर है। यह तिर्यंचगति सामान्य की अपेक्षा उनकी कायस्थिति कही है। यदि अन्य गति से आकर कोई जीव निरन्तर तिर्यंचगति में परिभ्रमण करता रहता है तो अधिक से अधिक इतने काल तक वह तिर्यंचगति में रह सकता है। इसके बाद वह नियम से अन्य गति में जन्म लेता है। वैसे तिर्यंचों के अनेक भेद हैं, इसलिए उन भेदों की अपेक्षा उनकी कायस्थिति जुदी-जुदी है।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां तृतीयोऽध्यायः ।3।। इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नाम वाली तत्त्वार्थवृत्ति में तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।3।।
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- ↑ -वेते द्वे उत्कृ- आ., दि. 1, दि. 2।