ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 38
From जैनकोष
438. उक्तासु भूमिषु[1] मनुष्याणां स्थितिपरिच्छेदार्थमाह-
438. उक्त भूमियों में स्थिति का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
नृस्थिती परावरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ।।38।।
मनुष्यों की उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्योपम और जघन्य अन्तर्मुहूर्त है ।।38।।
439. त्रीणि पल्योपमानि यस्याः सा त्रिपल्योपमा। अन्तर्गतो मुहूर्तो यस्याः सा अन्तर्मुहूर्ता। यथासंख्येनाभिसंबन्धः। मनुष्याणां परा उत्कृष्टा स्थितिस्त्रिपल्योपमा। अपरा जघन्या अन्तर्मुहूता। मध्ये अनेकविकल्पाः। तत्र पल्यं त्रिविधम्-व्यवहारपल्यमुद्धारपल्यमद्धापल्यमिति। अन्वर्थसंज्ञा एताः। आद्यं व्यवहारपल्यमित्युच्यते; उत्तरपल्य[2]द्वयव्यवहारबीजत्वात्। नानेन किंचित्परिच्छेद्यमस्तीति। द्वितीयमुद्धारपल्यम्। तत उद्धृतैर्लोमकच्छेदैर्द्वीपसमुद्राः संख्यायन्त इति। तृतीयमद्धापल्यम्। अद्धा कालस्थितिरित्यर्थः। तत्राद्यस्य प्रमाणं कथ्यते[3], तत्परिच्छेदनार्थत्वात्। तद्यथा-प्रमाणाङ्गुलपरिमितयोजनविष्कम्भायामावगाहानि त्रीणि पल्यानि कुशूला इत्यर्थः। एकादिसप्तान्ताहोरात्रजाताविवालाग्राणि तावच्छिन्नानि यावद्द्वितीयं कर्तरिच्छेदं [4]नावाप्नुवन्ति, तादृशैर्लोमच्छेदैः परिपूर्णं [5]घनीकृतं व्यवहारपल्यमित्युच्यते। ततो वर्षशते वर्षशते[6] गते एकैकलोमापकर्षणविधिना यावता कालेन तद्रिक्तं भवेत्तावान्कालो व्यवहारपल्योपमाख्यः। तैरेव लोमच्छेदैः प्रत्येकमसंख्येयवर्षकोटीसमयमात्रच्छिन्नैस्तत्पूर्णमुद्धारपल्यम्। ततः समये समये एकैकस्मिन् रोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्तं भवति तावान्काल उद्धारपल्योपमाख्यः। एषामुद्धारपल्यानां दशकोटीकोट्य एकमुद्धारसागरोपमम्। अर्धतृतीयोद्धारसागरोपमानां यावन्तो रोमच्छेदास्तावन्तो द्वीपसमुद्राः। पुनरुद्धारपल्यरोम-च्छेदैर्वर्षशतसमयमात्रच्छिन्नैः पूर्णमद्धापल्यम्। ततः समये समये एकैकस्मिन् रोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्तं भवति तावान्कालोऽद्धापल्योपमाख्यः। एषामद्धापल्यानां दशकोटीकोट्य एकमद्धासागरोपमम्। दशाद्धासागरोपम-कोटीकोट्य एकावसर्पिणी। तावत्येवोत्सर्पिणी अनेनाद्धापल्येन नारकतैर्यग्योनिजानां देवमनुष्याणां च कर्मस्थितिर्भव-स्थितिरायुःस्थितिः कायस्थितिश्च परिच्छेत्तव्या। उक्ता च संग्रहगाथा-
‘‘[7]ववहारुद्धारद्धा पल्ला तिण्णेव होंति बोद्धब्बा।संखा दीव-समुद्दा कम्मट्ठिदि वण्णिदा तदिए।।’’
439. ‘त्रिपल्योपमा’ इस वाक्य में ‘त्रि’ और ‘पल्योपम’ का बहुव्रीहि समास है। मुहूर्त के भीतर के काल को अन्तर्मुहूर्त कहते हैं। पर और अपर के साथ इन दोनों का क्रम से सम्बन्ध है। मनुष्यों की उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्योपम है और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है। तथा मध्य की स्थिति अनेक प्रकार की है। पल्य तीन प्रकार का है-व्यवहार पल्य, उद्धारपल्य और अद्धापल्य। ये तीनों सार्थक नाम हैं। आदि के पल्य को व्यवहार पल्य कहते हैं, क्योंकि वह आगे के दो पल्यों के व्यवहार का मूल है। इसके द्वारा और किसी वस्तु का परिमाण नहीं किया जाता। दूसरा उद्धारपल्य है। उद्धारपल्यमें से निकाले गये लोम के छेदों के द्वारा द्वीप और समुद्रों की गिनती की जाती है। तीसरा अद्धापल्य है। अद्धा और कालस्थिति ये एकार्थवाची शब्द हैं। इनमें से अब प्रथम पल्य का प्रमाण कहते हैं- जो इस प्रकार है-प्रमाणांगुल की गणना से एक-एक योजन लम्बे, चौडे़ और गहरे तीन गढ़ा करो और इनमें-से एक में एक दिन से लेकर सात दिन तक के पैदा हुए मेढ़े के रोमों के अग्र भागों को ऐसे टुकडे़ करके भरो जिससे कैंची से उनके दूसरे टुकडे़ न किये जा सकें। अनन्तर सौ-सौ वर्ष में एक-एक रोम का टुकड़ा निकालो। इस विधि से जितने काल में वह गढ़ा खाली हो वह सब काल व्यवहार पल्योपम नाम से कहा जाता है। अनन्तर असंख्यात करोड़ वर्षों के जितने समय हों उतने उन लोमच्छेदों में से प्रत्येक खण्ड करके उनसे दूसरे गढे़ के भरने पर वह गढ़ा खाली हो जाय उतने काल का नाम उद्धार पल्योपम है। इन दस कोडा़कोडी़ उद्धारपल्यों का एक उद्धार सागरोपम काल होता है। तथा ढा़ई उद्धार सागर के जितने रोमखण्ड हों उतने सब द्वीप और समुद्र हैं। अनन्तर सौ वर्ष के जितने समय हों उतने उद्धारपल्य के रोमखण्डों में से प्रत्येक के खण्ड कर के और उनसे तीसरे गढे़ के भरने पर एक अद्धापल्य होता है। और इनमें से प्रत्येक समय में एक-एक रोम के निकालने पर जितने समय में वह गढ़ा खाली हो जाय उतने काल का नाम अद्धापल्योपम है। तथा ऐसे दस कोड़ाकोड़ी अद्धापल्यों का एक अद्धासागर होता है। दस कोड़ाकोड़ी अद्धासागरों का एक अवसर्पिणी काल होता है और उत्सर्पिणी भी इतना ही बड़ा होता है।
इस अद्धापल्यके द्वारा नारकी, तिर्यंच, देव और मनुष्योंकी कर्मस्थिति, भवस्थिति, आयुस्थिति और कायस्थिति की गणना करनी चाहिए। संग्रह गाथा भी कही है- ‘व्यवहार, उद्धार और अद्धा ये तीन पल्य जानने चाहिए। संख्या का प्रयोजक व्यवहार पल्य है। दूसरे से द्वीप-समुद्रों की गणना की जाती है और तीसरे अद्धापल्य में कर्मों की स्थिति का लेखा लिया जाता है।’