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ग्रन्थ

ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 37

From जैनकोष



436. कर्मभूमियाँ कौन-कौन हैं, अब इस बात के बतलाने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्‍यत्र देवकुरूत्‍तरकुरुभ्‍यः ।।37।।
देवकुरु और उत्‍तरकुरु के सिवा भरत, ऐरावत और विदेह ये सब कर्मभूमियाँ हैं ।।37।।
437. भरता[1] ऐरावता विदेहाश्‍च पंच, पंच, एताः कर्मभूमय इति व्‍यपदिश्‍यन्‍ते। तत्र ‘विदेह’ ग्र‍हणाद्देवकुरूत्‍तरकुरुग्रहणे प्रसक्‍ते तत्‍प्रतिषेधार्थमाह- ‘अन्‍यत्र देवकुरूत्‍तरकुरुभ्‍यः’ इति। ‘अन्‍यत्र’ शब्‍दो वर्जनार्थः। देवकुरव उत्‍तरकुरवो हैमवतो हरिवर्षो[2]रम्‍यको हैरण्‍यवतोऽन्‍तर्द्वीपाश्‍च भोगभूमय इति व्‍यपदिश्‍यन्‍ते। अथ क‍थं कर्मभूमित्‍वम् ? शुभाशुभलक्षणस्‍य कर्मणोऽधिष्‍ठानत्‍वात्। ननु सर्वं [3]लोकत्रितयं कर्मणोऽधिष्‍ठानमेव। तत एवं[4] प्रकर्षगतिर्विज्ञास्‍यते, प्रकर्षेण यत्‍कर्मणोऽधिष्‍ठानमिति। तत्राशुभकर्मणस्‍तावत्‍सप्‍तमनरकप्रापणस्‍य भरतादिष्‍वेवार्जनम्, शुभस्‍य[5] च सर्वार्थसिद्ध्यादि[6]स्‍थानविशेषप्रापणस्‍य[7] कर्मण उपार्जनं तत्रैव, कृष्‍यादिलक्षणस्‍य षड्विधस्‍य कर्मणः पात्रदानादिसहितस्‍य तत्रैवारम्‍भात्‍कर्मभूमिव्‍यपदेशो वेदितव्‍यः। इतरासु दशविधकल्‍पवृक्षकस्पितभोगानुभवनविषयत्‍वाद् भोगभूमय इति व्‍यपदिश्‍यन्‍ते।
437. भरत, ऐरावत और विदेह ये प्रत्‍येक पाँच-पाँच हैं। ये सब कर्मभूमियाँ कही जाती हैं। इनमें विदेह का ग्रहण किया है, इसलिए देवकुरु और उत्‍तरकुरु का भी ग्रहण प्राप्‍त होता है, अतः उसका निषेध करने के लिए ‘अन्‍यत्र देवकुरूत्‍तरकुरुभ्‍यः’ यह पद रखा है। अन्‍यत्र शब्‍द का अर्थ निषेध है। देवकुरु, उत्‍तरकुरु, हैमवत, हरिवर्ष, रम्‍यक, हैरण्‍यवत और अन्‍तर्द्वीप ये भोगभूमियाँ कही जाती हैं। शंका-कर्मभूमि यह संज्ञा कैसे प्राप्‍त होती है ? समाधान-जो शुभ और अशुभ कर्मों का आश्रय हो उसे कर्मभूमि कहते हैं। यद्यपि तीनों लोक कर्मका आश्रय है, फिर भी इससे उत्‍कृष्‍टता का ज्ञान होता है कि ये प्रकर्ष रूपसे कर्म का आश्रय हैं। सातवें नरक को प्राप्‍त करने वाले अशुभ कर्म का भरतादि क्षेत्रों में ही अर्जन किया जाता है। इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धि आदि स्‍थान विशष को प्राप्‍त कराने वाले पुण्‍य कर्म का उपार्जन भी यहीं पर होता है। तथा पात्रदान आदि के साथ कृषि आदि छह प्रकार के कर्म का आरम्‍भ यहीं पर होता है, इसलिए भरतादिक की कर्मभूमि संज्ञा जाननी चाहिए। इतर क्षेत्रों में दस प्रकार के कल्‍पवृक्षों से प्राप्‍त भोगों की मुख्‍यता है, इसलिए वे भोगभूमियाँ कहलाती हैं।
विशेषार्थ-यह पहले ही बतला आये हैं कि भरतादि क्षेत्रों का विभाग ढाई द्वीप में ही है। जम्‍बूद्वीपमें भरतादि क्षेत्र एक-एक हैं और धातकीखण्‍ड व पुष्‍करार्ध में ये दो-दो हैं। इस प्रकार कुल क्षेत्र 35 होते हैं। उसमें भी उत्‍तरकुरु और देवकुरु विदेह क्षेत्र में होकर भी अलग गिने जाते हैं, क्‍योंकि यहाँ उत्‍तम भोगभूमि की व्‍यवस्‍था है, इसलिए पाँच विदेहों के पाँच देवकुरु और पाँच उत्‍तरकुरु इनको उक्‍त 35 क्षेत्रोंमें मिलाने पर कुल 45 क्षेत्र होते हैं। इनमें-से 5 भरत, 5 विदेह और 5 ऐरावत ये 15 कर्मभूमियाँ हैं और शेष 30 भोगभूमियाँ हैं। ये सब कर्मभूमि और भोगभूमि क्‍यों कहलाती हैं इस बात का निर्देश मूल टीका में किया ही है।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ भरतैरावतविदेहश्‍च मु., ता., ना., ।
  2. ↑ हरिवंशः रम्‍य-आ., दि. 1, दि. 2।
  3. ↑ ,सर्वो लोकत्रितयः कर्म-आ., दि. 1, दि. 2।
  4. ↑ एक प्रक- मु.।
  5. ↑ , शुभस्‍य सर्वा- मु.।
  6. ↑ -द्ध्‍यादिषु स्‍थान-आ., दि. 1, दि. 2।
  7. ↑ -पणस्‍य पुण्‍यकर्म- मु. ।
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