ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 36
From जैनकोष
434. पुष्करद्वीप के ठीक मध्य में चूड़ी के समान गोल मानुषोत्तर नाम का पर्वत है। उससे पहले ही मनुष्य हैं, उसके बाहर नहीं। इसलिए मानुषोत्तर पर्वत के बाहर पूर्वोक्त क्षेत्रों का विभाग नहीं है। इस पर्वत के उस ओर उपपाद जन्म वाले और समुद्घात को प्राप्त हुए मनुष्यों को छोड़कर और दूसरे विद्याधर या ऋद्धिप्राप्त मुनि भी कदाचित् नहीं जाते हैं इसलिए इस पर्वत का मानुषोत्तर यह सार्थक नाम है। इस प्रकार जम्बूद्वीप आदि ढाई द्वीपों में और दो समुद्रों में मनुष्य जानना चाहिए।
विशेषार्थ-ढाई द्वीप और इनके मध्य में आने वाले दो समुद्र यह मनुष्यलोक है। मनुष्य इसी क्षेत्र में पाये जाते हैं। मानुषोत्तर पर्वत मनुष्यलोक की सीमा पर स्थित होने से इसका मानुषोत्तर यह नाम सार्थक है। मनुष्य इसी क्षेत्र में रहते हैं, उनका बाहर जाना सम्भव नहीं, इसका यह अभिप्राय है कि गर्भ में आने के बाद मरण पर्यन्त औदारिक शरीर या आहारक शरीर के साथ वे इस क्षेत्र से बाहर नहीं जा सकते। सम्मूर्च्छन मनुष्य तो इसके औदारिक शरीर के आश्रय से होते हैं, इसलिए उनका मनुष्यलोक के बाहर जाना कथमपि सम्भव नहीं है। पर इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी भी अवस्था में मनुष्य इस क्षेत्र के बाहर नहीं पाये जाते हैं। ऐसी तीन अवस्थाएँ हैं जिनके होने पर मनुष्य इस क्षेत्र के बाहर पाये जाते हैं, यथा-(1) जो मनुष्य मर कर ढाई द्वीप के बाहर उत्पन्न होने वाले हैं वे यदि मरण के पहले मारणान्तिक समुद्घात करते हैं तो इसके द्वारा उनका ढाई द्वीप के बाहर गमन देखा जाता है। (2) ढाई द्वीप के बाहर निवास करने वाले जो जीव मर कर मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं उनके मनुष्यायु और मनुष्य गति नामकर्म का उदय होने पर भी ढाई द्वीप में प्रवेश करने के पूर्व तक उनका इस क्षेत्र के बाहर अस्तित्व देखा जाता है। (3) केवलिसमुद्घात के समय उनका मनुष्यलोक के बाहर अस्तित्व देखा जाता है। इन तीन अपवादों का छोड़कर और किसी अवस्था में मनुष्यों का मनुष्यलोक के बाहर अस्तित्व नहीं देखा जाता। वे मनुष्य दो प्रकार के हैं अब ये बतलाने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं –
आर्या म्लेच्छाश्च ।।36।।
मनुष्य दो प्रकार के हैं-आर्य और म्लेच्छ ।।36।।
435. गुणैर्गुणवद्भिर्वा अर्यन्त इत्यार्याः। ते द्विविधा ऋद्धिप्राप्तार्या अनृद्धिप्राप्तार्याश्चेति। अनृद्धिप्राप्तार्याः पंचविधाः क्षेत्रार्या जात्यार्या कर्मार्याश्चारित्रार्या दर्शनार्याश्चेति। ऋद्धिप्राप्तार्याः सप्तविधाः; बुद्धिविक्रियातपोबलौषधरसाक्षीणभेदात्। म्लेच्छा द्विविधाः- अन्तर्द्वीपजाः कर्मभूमिजाश्चेति। तत्रान्तर्द्वीपा लवणोदधेरभ्यन्तरे[1] पार्श्वेऽष्टासु दिक्ष्वष्टौ। तदन्तरेषु चाष्टौ। हिमवच्छिखरिणोरुभयोश्च विजयार्द्धयोरन्तेष्वष्टौ। तत्र दिक्षु द्वीपा वेदिकायास्तिर्यक् पञ्चयोजनशतानि प्रविश्य भवन्ति। विदिक्ष्वन्तरेषु च द्वीपाः पञ्चाशत्पञ्चयोजनशतेषु गतेषु भवन्ति। शैलान्तेषु द्वीपाः षड्योजनशतेषु गतेषु भवन्ति। दिक्षु द्वीपाः शतयोजनविस्ताराः। विदिक्ष्वन्तरेषु च द्वीपास्तदर्धविष्कम्भाः। शैलान्तेषु पञ्चविंशतियोजनविस्ताराः। तत्र पूर्वस्यां दिश्येकोरूकाः। अपरस्यां दिशि लाङ्गूलिनः। उत्तरस्यां[2] दिश्यभाषकाः। दक्षिणस्यां[3] दिशि विषाणिनः। शशकर्णशष्कुलीकर्णप्रा[4]वरणकर्णलम्बकर्णाः विदिक्षु। अश्वसिंहश्वमहिषवराहव्याघ्र[5]काककपिमुखा अन्तरेषु। मेघ[6]मुखविद्युन्मुखाः शिखरिण उभयोरन्तयोः। मत्स्यमुखकालमुखा हिमवत उभयोरन्तयोः। हस्तिमुखादर्शमुखाः उत्तरविजयार्धस्योभयोरन्तयोः। गोमुखमेषमुखा [7]दक्षिणविजयार्धस्योभयो-रन्तयोः। एकोरुका मृदाहारा गुहावासिनः। शेषाः पुष्पफलाहारा वृक्षवासिनः। सर्वे ते पल्योपमायुषः। ते चतुर्विंशतिरपि[8] द्वीपा जलतलादेकयोजनोत्सेधाः[9]। लवणोदधेर्बाह्यपार्श्वेऽप्येवं चतुर्विंशतिद्वीपा विज्ञातव्याः। तथा कालोदेऽपि वेदितव्याः। त एतेऽन्तर्द्वीपजा म्लेच्छाः। कर्मभूमिजाश्च शकयवनशबरपुलिन्दादयः।
435. जो गुणों या गुणवालों के द्वारा माने जाते हैं-वे आर्य कहलाते हैं। उनके दो भेद हैं-ऋद्धिप्राप्त आर्य और ऋद्धिरहित आर्य। ऋद्धिरहित आर्य पाँच प्रकार के हैं- क्षेत्रार्य, जात्यार्य, कर्मार्य, चारित्रार्य और दर्शनार्य। बुद्धि, विक्रिया, तप, बल, औषध, रस और अक्षीण ऋद्धि के भेद से ऋद्धिप्राप्त आर्य सात प्रकार के हैं। म्लेच्छ दो प्रकार के हैं-अन्तर्द्वीपज म्लेच्छ और कर्मभूमिज म्लेच्छ। लवणसमुद्र के भीतर आठों दिशाओं में आठ अन्तर्द्वीप हैं और उनके अन्तराल में आठ अन्तर्द्वीप और हैं। तथा हिमवान् और शिखरी इन दोनों पर्वतों के अन्त में और दोनों विजयार्ध पर्वतों के अन्तमें आठ अन्तर्द्वीप हैं। इनमें से जो दिशाओं में द्वीप हैं वे वेदिका से तिरछे पाँचसौ योजन भीतर जाकर हैं। विदिशाओं और अन्तरालों में जो द्वीप हैं वे पाँचसौ पचास योजन भीतर जाकर हैं। तथा पर्वतों के अन्त में जो द्वीप हैं वे छहसौ योजन भीतर जाकर हैं। दिशाओं में स्थित द्वीपों का विस्तार सौ योजन है। विदिशाओं और अन्तरालों में स्थित द्वीपों का विस्तार उससे आधा अर्थात् पचास योजन है। तथा पर्वतों के अन्त में स्थित द्वीपों का विस्तार पच्चीस योजन है पूर्व दिशा में एक टाँग वाले मनुष्य हैं। पश्चिम दिशा में पूँछ वाले मनुष्य हैं। उत्तर दिशा में गूँगे मनुष्य हैं और दक्षिण दिशा में सींगवाले मनुष्य हैं। चारों विदिशाओं में क्रम से खरगोश के समान कान वाले, शष्कुली अर्थात् मछली अथवा पूड़ी के समान कान वाले, प्रावरण के समान कान वाले और लम्बे कान वाले मनुष्य हैं। आठों अन्तराल के द्वीपों में क्रम से घोडे के समान मुख वाले, सिंह के समान मुख वाले, कुत्तों के समान मुख वाले, भैंसा के समान मुख वाले, सुअर के समान मुख वाले, व्याघ्र के समान मुख वाले, कौआ के समान मुख वाले और बन्दर के समान मुख वाले मनुष्य हैं। शिखरी पर्वत के दोनों कोणों की सीध में जो अन्तर्द्वीप है उनमें मेघ के समान मुख वाले और बिजली के समान मुख वाले मनुष्य हैं। हिमवान् पर्वत के दोनों कोणों की सीध में जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें मछली के समान मुख वाले और काल के समान मुख वाले मनुष्य हैं। उत्तर विजयार्ध के दोनों कोणों की सीध में जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें हाथी के समान मुख वाले और दर्पण के समान मुख वाले मनुष्य हैं। तथा दक्षिण विजयार्ध के दोनों कोणों की सीध में जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें गाय के समान मुख वाले और मेढा के समान मुख वाले मनुष्य हैं। इनमें से एक टाँग वाले मनुष्य गुफाओं में निवास करते हैं और मिट्टी का आहार करते हैं तथा शेष मनुष्य फूलों और फलों का आहार करते हैं और पेडों पर रहते हैं । इन सबकी आयु एक पल्योपम है। ये चौबीसों अन्तर्द्वीप जल की सतह से एक योजन ऊँचे हैं। इसी प्रकार कालोद समुद्र में भी जानना चाहिए। ये सब अन्तर्द्वीपज म्लेच्छ हैं। इनसे अतिरिक्त जो शक, यवन, शबर और पुलिन्दादिक हैं वे सब कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं।
विशेषार्थ- षट्खण्डागम में मनुष्यों के दो भेद किये गये हैं- कर्मभूमिज और अकर्मभूमिज। अकर्मभूमि भोगभूमि का दूसरा नाम है। भोगभूमि का एक भेद कुभोगभूमि है। उसमें जन्म लेने वाले मनुष्य ही यहाँ अन्तर्द्वीपज म्लेच्छ कहे गये हैं। शेष रहे शक, यवन, शबर और पुलिन्द आदि म्लेच्छ कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं। इसी प्रकार आर्य भी क्षेत्र की अपेक्षा दो भागों में विभक्त हैं-कर्मभूमिज आर्य और अकर्मभूमिज आर्य। तीस भोगभूमियों के मनुष्य अकर्मभूमिज आर्य हैं और कर्मभूमि के आर्य कर्मभूमिज आर्य हैं। इनमें से अकर्मभूमिज आर्य और म्लेच्छों के अविरत सम्यग्दृष्टि तक चार गुणस्थान हो सकते हैं किन्तु कर्मभूमिज आर्य और म्लेच्छ अणुव्रत और महाव्रत के भी अधिकारी हैं। इनके संयमासंयम और संयमस्थानों का विशेष व्याख्यान कषायप्राभृत लब्धिसार क्षपणासार में किया है।
436. काः पुनः कर्मभूमय इत्यत आह-
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अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका
- ↑ लवणोदे अष्टासु दिक्ष्वष्टौ आ. दि., 1, दि. 2। लवणोदधेरभ्यन्तरेऽष्टासु दिक्ष्वष्टौ मु.।
- ↑ उत्तरस्यामभाषका: आ. दि.1, दि. 2।
- ↑ -णस्यां विषा- दि. 1, दि. 2 ।
- ↑ -वरणलम्ब मु. ।
- ↑ काकघूककपि- मु. ।
- ↑ मेघविद्यु- मु. ।
- ↑ दक्षिणदिग्विज- मु. ।
- ↑ -शतिद्वितीयपक्षेऽपि उभयोस्तत्प्रेष्टचत्वारिंश्द्द्वीपाः जलतला- दि. 2।
- ↑ -त्सेधाः। तथा कालोदेऽपि आ., दि. 1।