ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 35
From जैनकोष
433. अत्राह किमर्थं जम्बूद्वीपहिमवदादिसंख्या द्विरावृत्ता पुष्करार्धे कथ्यते, न पुनः कृत्स्न एव पुष्करद्वीपे। इत्यत्रोच्यते-
433. यहाँ शंकाकार का कहना है कि जम्बूद्वीप में हिमवान् आदि की जो संख्या है उससे हिमवान् आदि की दूनी संख्या आधे पुष्करद्वीप में क्यों कही जाती है पूरे पुष्कर द्वीप में क्यों नहीं कही जाती ? अब इस शंका का समाधान करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः ।।35।।
मानुषोत्तर पर्वत के पहले तक ही मनुष्य हैं ।।35।।
434. पुष्करद्वीपबहुमध्यदेशभागी वलयवृत्तो मानुषोत्तरो नाम शैलः। तस्मात्प्रागेव मनुष्या न बहिरिति। ततो न बहिः पूर्वोक्तक्षेत्रविभागोऽस्ति। नास्मादुत्तरं कदाचिदपि विद्याधरा ऋद्धिप्राप्ता अपि मनुष्या गच्छन्ति अन्यत्रोपपादसमुद्घाताभ्याम्। ततोऽस्यान्वर्थसंज्ञा। एवं जम्बूद्वीपादिष्वर्धतृतीयेषु[1] द्वीपेषु द्वयोश्च समुद्रयोर्मनुष्या वेदितव्याः। ते द्विविधाः-
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