ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 34
From जैनकोष
431. तत्र द्वीपाम्भोनिधिविष्कम्भद्विगुणपरिक्लृप्तिवद्धातकीखण्डवर्षादिगुणवृद्धिप्रसंगे विशेषावधारणार्थमाह-
431. द्वीप और समुद्रोंका उत्तरोत्तर जिस प्रकार दूना दूना विस्तार बतलाया है उसी प्रकार यहाँ धातकीखण्ड द्वीप के क्षेत्र आदि की संख्या दूनी प्राप्त होती है अतः विशेष निश्चय करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
पुष्करार्द्धे च ।।34।।
पुष्करार्द्धमें उतने ही क्षेत्र और पर्वत हैं ।।34।।
432. किम्। द्विरित्यनुवर्तते। किमपेक्षा द्विरावृत्तिः ? जम्बूद्वीपभरतहिमवदाद्यपेक्षयैव[1]। कुतः ? व्याख्यानतः। यथा धातकीखण्डे हिमवदादीनां विष्कम्भस्तथा पुष्करार्धे हिमवदादीनां विष्कम्भो द्विगुण इति व्याख्यायते। नामानि तान्येव, इष्वाकारौ मन्दरौ च पूर्ववत्। यत्र[2] जम्बूवृक्षस्तत्र पुष्करं सपरिवारम्। तत एव तस्य[3] द्वीपस्य नाम रूढं पुष्करद्वीप इति। अथ कथं पुष्करार्द्धसंज्ञा। मानुषोत्तरशैलेन विभक्तार्धत्वात्पुष्करार्धसंज्ञा।
432. यहाँ ‘द्वि’ पद की अनुवृत्ति होती है। शंका-‘द्वि’ इस पद की किसकी अपेक्षा अनुवृत्ति होती है ? समाधान-जम्बूद्वीपके भरत आदि क्षेत्र और हिमवान् आदि पर्वतोंकी अपेक्षा ‘द्विः’ इस पदकी अनुवृत्ति होती है। शंका-यह कैसे समझा जाता है ? समाधान-व्याख्यानसे। जिसप्रकार धातकीखण्ड द्वीपमें हिमवान् आदिका विस्तार कहा है उसी प्रकार पुष्करार्धमें हिमवान् आदिका विस्तार दूना बतलाया है। नाम वे ही हैं। दो इष्वाकार और दो मन्दर पर्वत पहलेके समान जानना चाहिए। जहाँ पर जम्बूद्वीपमें जम्बूवृक्ष है पुष्कर द्वीपमें वहाँ अपने परिवार वृक्षोंके साथ पुष्करवृक्ष हैं। इसीलिए इस द्वीपका पुष्करद्वीप यह नाम रूढ़ हुआ है। शंका-इस द्वीपको पुष्करार्ध यह संज्ञा कैसे प्राप्त हुई ? समाधान-मानुषोत्तर पर्वतके कारण इस द्वीपके दो विभाग हो गये हैं अतः आधे द्वीपको पुष्करार्ध यह संज्ञा प्राप्त हुई।