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ग्रन्थ

ग्रन्थ:सर्वार्थसिद्धि - अधिकार 3 - सूत्र 33

From जैनकोष



429. तत्र वर्षादीनां संख्‍यादि[1]विधिप्रतिपत्‍त्‍यर्थमाह-
429. जो प‍हले जम्‍बूद्वीप कह आये हैं उसके चारों ओर एक वेदिका है। इसके बाद लवणसमुद्र है जिसका विस्‍तार दो लाख योजन है। इसके बाद धातकीखण्‍ड द्वीप है जिसका विस्‍तार चार लाख योजन है। अब इसमें क्षेत्र आदि की संख्‍या का ज्ञान कराने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं-
द्विर्धातकीखण्‍डे।।33।।
धातकीखण्‍ड में क्षेत्र तथा पर्वत आदि जम्‍बूद्वीप से दूने हैं।।33।।
430. भरतादीनां द्रव्‍याणामिहाभ्‍यावृत्तिर्विवक्षिता। तत्र क‍‍थं सुच् ? अध्‍याह्रियमाणक्रियाभ्‍यावृत्तिद्योतनार्थः सुच्। यथा द्विस्‍तावानयं प्रासादो मीयत इति। एवं [2]द्विर्धातकीखण्‍डे भरतादयो मीयन्‍ते इति। तद्यथा-द्वाभ्‍यामिष्‍वाकारपर्वताभ्‍यां दक्षिणोत्तरायताभ्‍यां लवणोदकालोदवेदिकास्‍पृष्‍टकोटिभ्‍यां विभक्‍तो धातकीखण्‍डः पूर्वापर इति। तत्र पूर्वस्‍य[3] अपरस्‍य च मध्‍ये द्वौ मन्‍दरौ। तयोरुभयतो भरतादीनि क्षेत्राणि हिमवदादयश्‍च वर्षधरपर्वताः। एवं द्वौ भरतौ द्वौ हिमवन्‍तौ इत्‍येवमादि संख्‍यानं द्विगुणं वेदितव्‍यम्। जम्‍बूद्वीपहिमवदादीनां वर्षधराणाम् यो विष्‍कम्‍भस्‍तद्द्विगुणो धातकीखण्‍डे हिमवदादीनां वर्षधराणाम्। वर्षधराश्‍चक्रारवदवस्थिताः। अरविवरसंस्‍थानानि क्षेत्राणि। जम्‍बूद्वीपे यत्र जम्‍बूवृक्षः स्थितः तत्र धातकीखण्‍डे धातकीवृक्षः सपरिवारः। तद्योगाद्धातकीखण्‍ड इति द्वीपस्‍य नाम प्रतीतम्। तत्‍परिक्षेपी कालोदः समुद्रः टंकच्छिन्‍नतीर्थः अष्‍टयोजनशतसहस्रवलयविष्‍कम्‍भः। कालोद‍परिक्षेपी पुष्‍करद्वीपः षोडशयोजनशतसहस्रवलयविष्‍कम्‍भः।
430. भ‍रत आदि क्षेत्रों की यहाँ आवृ‍त्ति विवक्षित है। शंका- सूत्रमें ‘सुच्’ प्रत्‍यय किसलिए किया है ? समाधान-वाक्‍य पूरा करने के लिए जो क्रिया जोड़ी जाती है उसकी आवृत्ति बतलाने के लिए ‘सुच्’ प्रत्‍यय किया है। जैसे ‘द्विस्‍तावान् अयं प्रासादः’ यहाँ ‘सुच्’ प्रत्‍यय के रहने से यह प्रासाद दुमंजिला है यह समझा जाता है। इसी प्रकार धातकीखण्‍ड में ‘सुच्’ से भरतादिक दूने ज्ञात हो जाते हैं। य‍था-अपने सिरे से लवणोद और कालोद को स्‍पर्श करने वाले और दक्षिण से उत्‍तर तक लम्‍बे इष्‍वाकार नामक दो पर्वतों से विभक्‍त होकर धातकीखण्‍ड द्वीप के दो भाग हो जाते हैं-पूर्व धातकीखण्‍ड और पश्चिम धातकीखण्‍ड। इन पूर्व और पश्चिम दोनों खण्‍डों के मध्‍य में दो मन्‍दर अर्थात् मेरु पर्वत हैं। इन दोनों के दोनों ओर भरत आदि क्षेत्र और हिमवान् आदि पर्वत हैं। इस प्रकार दो भरत दो हिमवान् इत्‍यादि रूप से जम्‍बूद्वीप से धातकीखण्‍ड द्वीप में दूनी संख्‍या जाननी चाहिए। जम्‍बूद्वीप में हिमवान् आदि पर्वतों का जो विस्‍तार है धातकीखण्‍ड द्वीप में हिमवान् आदि पर्वतों का उससे दूना विस्‍तार है। चक्‍के में जिस प्रकार आरे होते हैं उसी प्रकार ये पर्वत क्षेत्रोंके मध्‍यमें अवस्थित हैं। और चक्‍केमें छिद्रोंका जो आकार होता है यहाँ क्षेत्रोंका वही आकार है। जम्‍बूद्वीपमें जहाँ जम्‍बू वृक्ष स्थित है धातकीखण्‍डद्वीपमें परिवार वृक्षोंके साथ वहाँ धातकी वृक्ष स्थित है। और इसके सम्‍बन्‍धसे द्वीपका नाम धातकीखण्‍ड प्रसिद्ध है। इसको घेरे हुए कालोद समुद्र है। जिसका घाट ऐसा मालूम देता है कि उसे टाँकीसे काट दिया हो और जिसका विस्‍तार आठ लाख योजन है। कालोदको घेरे हुए पुष्‍करद्वीप है जिसका विस्‍तार सोलह लाख योजन है।


पूर्व सूत्र
अगला सूत्र
सर्वार्थसिद्धि अनुक्रमणिका

  1. ↑ संख्‍याविधि- मु.।
  2. ↑ -तकीषंडे ता., ना., दि. 1, दि. 2, आ.।
  3. ↑ -र्वस्‍य चापरस्‍य मध्‍ये मु.।
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