चक्रलाभ

From जैनकोष



गृहस्थ की त्रपेन क्रियाओं में चवालीसवीं क्रिया । इस क्रिया में निधियों और रत्नों की प्राप्ति के साथ चक्र की प्राप्ति होती है तथा जिसे यह रत्न मिलता है उसे राजाधिराज मानकर प्रजा उसका अभिषेक करती है । महापुराण 38.61, 233


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