चरमांग

From जैनकोष



चरमशरीरी और तद्भव मोक्षगामी जीव । ये जहाँ तप में लीन रहते हैं वहाँ इनके ऊपर से जाते हुए देवों के विमान रुक जाते हैं । महापुराण 15.126, 72.48-49


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