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नित पीज्यौ धीधारी, जिनवानि

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नित पीज्यौ धीधारी, जिनवानि सुधासम जानके ।।टेक. ।।
वीरमुखारविंदतैं प्रगटी, जन्मजरागद टारी ।
गौतमादिगुरु-उरघट व्यापी, परम सुरुचि करतारी।।१ ।।नित. ।।
सलिल समान कलिलमल गंजन बुधमन रंजनहारी ।
भंजन विभ्रमधूलि प्रभंजन, मिथ्याजलदनिवारी।।२ ।।नित. ।।
कल्यानक तरु उपवनधरिनी, तरनी भवजलतारी ।
बंधविदारन पैनी छैनी, मुक्ति नसैनी सारी।।३ ।।नित. ।।
स्वपरस्वरूप प्रकाशनको यह, भानु कला अविकारी ।
मुनिमन-कुमुदिनि-मोदन-शशिभा, शम-सुख सुमनसुबारी।।४ ।।नित. ।।
जाको सेवत बेवत निजपद, नशत अविद्या सारी ।
तीनलोकपति पूजत जाको, जान त्रिजग हितकारी।।५ ।।नित. ।।
कोटि जीभसौं महिमा जाकी, कहि न सके पविधारी ।
`दौल' अल्पमति केम कहै यह, अधम उधारनहारी।।६ ।।नित. ।।


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