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पद्मसद्म पद्मापद पद्मा

From जैनकोष

पद्मसद्म पद्मापद पद्मा, मुक्तिसद्म दरशावन है ।
कलि-मल-गंजन मन अलि रंजन, मुनिजन शरन सुपावन है ।।
जाकी जन्मपुरी कुशंबिका, सुर नर-नाग रमावन है ।
जास जन्मदिनपूरब षटनव, मास रतन बरसावन है ।।१ ।।
जा तपथान पपोसागिरि सो, आत्म-ज्ञान थिर थावन है ।
केवलजोत उदोत भई सो, मिथ्यातिमिर-नशावन है ।।२ ।।
जाको शासन पंचाननसो, कुमति मतंग नशावन है ।
राग बिना सेवक जन तारक, पै तसु रुषतुष भाव न है ।।३ ।।
जाकी महिमा के वरननसों, सुरगुरु बुद्धि थकावन है ।
`दौल' अल्पमति को कहबो जिमि, शशक गिरिंद धकावन है ।।४ ।।