प्रभु! तुम नैनन-गोचर नाहीं

From जैनकोष

प्रभु! तुम नैनन-गोचर नाहीं
मो मन ध्यावै भगति बढ़ावै, रीझ न कछु मनमाहीं।।प्रभु. ।।१ ।।
जनम-जरा-मृत-रोग-वैद्य हो, कहा करैं कहां जाहीं।।प्रभु.।।२ ।।
`द्यानत' भव-दुख-आग-माहिंतैं, राख चरण-तरु-छाहीं ।।प्रभु.।।३ ।।