• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • Page
  • Discussion
  • View source
  • View history

भानु

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

कृष्ण का सत्यभामा रानी से पुत्र था। ( हरिवंशपुराण/44/1 ) अंत में दीक्षा धारणकर मुनि हो गया था ( हरिवंशपुराण/61/39 )।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ


पुराणकोष से

(1) एक नृप । यह कृष्ण के कुल की रक्षा करता था । हरिवंशपुराण - 50.130

(2) कृष्ण और सत्यभामा का पुत्र । सूर्य के प्रभामंडल के समान दैदीप्यमान होने से इसका यह नाम रखा गया था । यह अंत में दीक्षा धारण कर मुनि हो गया था । हरिवंशपुराण - 44.1, 48.69 61.39

(3) जरासंध का पुत्र । हरिवंशपुराण - 52.31

(4) मथुरा के राजा लब्धाभिमान का पुत्र और यवु का पिता । हरिवंशपुराण - 18.3

(5) मथुरा का बारह करोड़ मुद्राओं का स्वामी एक श्रेष्ठी । यमुना इसकी स्त्री थी । इन दोनों के सुभानु, भानुकीर्ति, भानुषेण, शूर, सूरदेव, शूरदत्त और शूरसेन ये सात पुत्र तथा क्रमश: कालिंदी, तिलका, कांता श्रीकांता, सुंदरी, द्युति और चंद्रकांता पुत्र-वधुएँ थी । इसने अभयनंदी गुरु से तथा इसकी स्त्री यमुना ने जिनदत्ता आर्यिका से दीक्षा ले ली थी । इसके पुत्र भी वरधर्म गुरु के समीप दीक्षित हो गये थे । आयु के अंत में समाधिमरण करके यह सौधर्म स्वर्ग में एक सागर की आयु वाला त्रायस्त्रिंश जाति का उत्तम देव हुआ । इसका अपर नाम भानुदत्त था । महापुराण 71.201-206, हरिवंशपुराण - 33.96-100, [ग्रन्थ:हरिवंश पुराण_-_सर्ग_33#124|हरिवंशपुराण - 33.124-130]]

(6) जीवद्यशा के भाई और कंस के साले सुभानु का पुत्र । कंस ने यह घोषणा करायी थी कि नागशय्या पर चढ़कर एक हाथ से शंख बजाते हुए दूसरे हाथ से धनुष चढ़ाने वाले को वह अपनी पुत्री देगा । इस घोषणा को सुनकर यह अपने पिता के साथ मथुरा आया था । कृष्ण इसके साथ थे । कृष्ण ने इसे पास में खड़ा करके कंस के तीनों कार्य कर दिखाये और वह शीघ्र व्रज वापस आ गया । कुछ पहरेदारों ने कंस को यह बताया कि ये कार्य इसने किये हैं और कुछ ने यह बताया कि ये कार्य इसने नहीं किसी अन्य कुमार ने किये हैं । महापुराण 70.447-456, हरिवंशपुराण - 35.75

(7) भरतक्षेत्र के रत्नपुर नगर का कुरुवंशी एवं काश्यपगोत्री एक राजा । यह तीर्थंकर धर्मनाथ का पिता था । इसकी रानी का नाम सुप्रभा था । महापुराण 61.13-14, 18, पद्मपुराण - 20.51

(8) लंका का राक्षसवंशी एक नृप । यह राजा भानुवर्मा का उत्तराधिकारी था । यह सीता के स्वयंवर में आया था । पद्मपुराण - 5.387,पद्मपुराण - 5.394, 28.215

(9) तीर्थंकर की माता द्वारा उसकी गर्भावस्था में देखे गये सोलह स्वप्नों में सातवाँ स्वप्न । पद्मपुराण - 21.12-14

(10) चंपा नगरी का राजा । इसकी पत्नी का नाम राधा था । इन दोनों के कोई संतान न थी । इन्हें बताया गया था कि यमुनातट पर उन्हें पेटी में एक बालक की प्राप्ति होगी । इस कथन के अनुसार इन्हें पेटी में एक बालक की प्राप्ति हुई थी । बालक ग्रहण करते समय रानी ने अपना कान खुजाया था । रानी की इस प्रवृत्ति को देखकर राजा ने बालक का नाम कर्ण रखा था । पांडवपुराण 7.279-297


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=भानु&oldid=127146"
Categories:
  • भ
  • पुराण-कोष
  • प्रथमानुयोग
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 27 November 2023, at 15:15.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki