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मनु

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

 धवला 1/1,1,2/20/1  मनुःज्ञानं = मनु ज्ञान को कहते हैं।
  1. विजयार्ध की उत्तर श्रेणी का एक नगर–देखें विद्याधर ;
  2. कुलकर का अपर नाम–देखें शलाका पुरुष - 9.3 


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पुराणकोष से

(1) भरतक्षेत्र में भोगभूमि की स्थिति समाप्त होने पर तीसरे काल में पल्य का आठवां भाग शेष रहने पर उत्पन्न हुए कुलों के कर्त्ता-कुलकर ये चौदह हुए हैं । वे हैं― प्रतिश्रुत, सन्मति, क्षेमंकर, क्षेमंधर, सीमंकर, सीमंधर, विपुलवाहन, चक्षुष्मान्, यशस्वी, अभिचंद्र चंद्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित् और नाभिराय । इन्होंने हा, मा और धिक् ऐसे शब्दों का दंड रूप में प्रयोग करके प्रजा के कष्ट को दूर किया था । ये प्रजा के जीवन का उपाय जानने, मनन करने और बताने से इस नाम से विख्यात हुए थे । आर्य पुरुषों को कुल की भांति इकट्ठे रहने का उपदेश देने के ये कुलकर, वंश-संस्थापक होने से कुलधर और युग के आदि में होने से युगादि पुरुष भी कहे जाते थे । इन कुलकरों में आदि के पाँच ने अपराधी मनुष्यों के लिए ‘‘हाँ’’ नामक दंड की व्यवस्था की थी । छठे से दसवें कुलकर तक हुए पाँच कुलकरों ने ‘‘हाँ’’ ‘‘मा’’ और शेष ने ‘‘हाँ’’ ‘‘मा’’ ‘‘धिक्’’ इस प्रकार की दंड व्यवस्था की थी । वृषभदेव तीर्थंकर भी थे और कुलकर भी । कल्पवृक्षों का ह्रास होने पर ये गंगा और सिंधु महानदियों के दक्षिण भरतक्षेत्र में उत्पन्न हुए थे । प्रथम कुलकर प्रतिश्रुति की ऊँचाई अठारह सौ धनुष, इसके पुत्र दूसरे कुलकर सन्मति की तेरह सौ धनुष और तीसरे कुलकर क्षेमंकर की आठ सौ धनुष थी । आगे प्रत्येक कुलकर की ऊँचाई पच्चीस-पच्चीस धनुष कम होती गयी । अंतिम कुलकर नाभिराय की ऊँचाई पांच सौ धनुष थी । सभी कुलकर समचतुरस्रसंस्थान और वज्रवृषभनाराचसंहनन से युक्त गंभीर तथा उदार थे । इन्हें अपने पूर्वभव का स्मरण था । इनकी मनु संज्ञा थी । इनके चक्षुष्मान्, यशस्वी और प्रसेनजित् ये तीन प्रियंगुपुष्प के समान श्याम-कांति के धारी थे । चंद्राभ चंद्रमा के समान और शेष तप्त स्वर्णप्रभा से युक्त थे । मपु 3. 211-215, 229-232 हरिवंशपुराण - 7.123-124, 171-175, 8.1 पांडवपुराण 2.103-107

(2) अदिति देवी द्वारा नमि और विनमि को दिये गये विद्याओं के आठ निकायों में प्रथम निकाय । हरिवंशपुराण - 22.57

(3) विजयार्ध की उत्तरश्रेणी का सत्ताईसवाँ नगर । हरिवंशपुराण - 22.88

(4) सौधर्मेंद्र द्वारा स्तुत वृषभदेव का एक नाम । महापुराण 25.171


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