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राक्षस

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

  1. व्यंतर देवों का एक भेद− सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए - देखें व्यंतर ।
  2. पिशाच जातीय व्यंतर देवों का एक भेद | सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए−देखें पिशाच ।
  3. मनोवेग विद्याधर का पुत्र था ( पद्मपुराण/5/378 ) इसी के नाम पर राक्षस द्वीप में रहने वाले विद्याधरों का वंश राक्षस वंश कहलाने लगा । सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए −देखें इतिहास - 9.12 ।
  1. राक्षस का लक्षण
    धवला 13/5, 5, 140/391/10 भीषणरूपविकरणप्रियाः राक्षसा नाम । = जिन्हें भीषण रूप की विक्रिया करना प्रिय है, वे राक्षस कहलाते हैं ।
  2. राक्षस देव के भेद
    ति. पं./6/44 भीममहाभीमविग्घविणायका उदकरक्खसा तह य । रक्खसरक्खसणामा सत्तमया बम्हरक्खसया ।44। = भीम, महाभीम, विनायक, उदक, राक्षस, राक्षसराक्षस और सातवाँ ब्रह्मराक्षस इस प्रकार ये सात भेद राक्षस देवों के हैं ।44। ( त्रिलोकसार/267 ) ।
  • राक्षस देवों के वर्ण वैभव अवस्थान आदि | सम्बंधित विषय की अधिक जानकारी के लिए−देखें व्यंतर ।


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पुराणकोष से

(1) व्यंतर जाति के देव । ये पहली पृथिवी के पंकभाग में रहते हैं । हरिवंशपुराण - 4.50

(2) रात्रि का दूसरा प्रहर । महापुराण 74.255

(3) पलाशनगर का राजा । इसे राक्षस-विद्या सिद्ध होने के कारण इसका यह नाम प्रसिद्ध हो गया था । महापुराण 75.116

(4) एक विद्या । मर 75.116

(5) जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र की दक्षिण दिशा में स्थित एक द्वीप । राक्षसवंशी-विद्याधरों द्वारा रक्षा किये जाने से यह द्वीप इस नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसकी परिधि इक्कीस योजन है । पद्मपुराण - 3.43, 5. 386, 48.106-107

(6) विद्याधर मनोवेग का पुत्र । सुप्रभा इसकी रानी थी । इसके दो पुत्र थे― आदित्यगति और वृहत्कीर्ति । इस राजा ने इन्हीं पुत्रों को राज्यभार सौंपकर दीक्षा ले ली थी । यह मरकर स्वर्ग में देव हुआ । पद्मपुराण - 5.378-380

(7) विद्याघरों का एक वंश । इस वंश में एक राक्षस नाम का विद्याधर हुआ है, जिसके नाम पर यह वंश प्रसिद्ध हुआ । पद्मपुराण - 5.378

(8) राक्षसवंशी-विद्याधर । राक्षस जातीय देवों के द्वारा द्वीप की रक्षा होने से यहाँ के निवासी राक्षस नाम से प्रसिद्ध हुए । पद्मपुराण -5. 386

(9) विद्याधर । ये न देव होते हैं न राक्षस । ये राक्षस नामक द्वीप के रक्षक होने से राक्षस कहलाते थे । पद्मपुराण - 43.38

(10) एक अस्त्र-बाण । जरासंध ने इसको कृष्ण पर फेंका था और कृष्ण ने इस अस्त्र का नारायण अस्त्र से निवारण किया था । हरिवंशपुराण - 52.54


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