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जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

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वनस्पति

From जैनकोष



सिद्धांतकोष से

  1. वनस्पति व प्रत्येक वनस्पति सामान्य निर्देश
    1. वनस्पति सामान्य के भेद ।
    2. प्रत्येक वनस्पति सामान्य का लक्षण ।
    3. प्रत्येक वनस्पति के भेद ।
    4. वनस्पति के लिए ही प्रत्येक शब्द का प्रयोग है ।
    5. मूलबीज, अग्रबीजादि के लक्षण ।
    6. प्रत्येक शरीर नामकर्म का लक्षण ।
    7. प्रत्येक शरीर वर्गणा का प्रमाण ।
    • प्रत्येक शरीर नामकर्म के असंख्यात भेद हैं। देखें नामकर्म ।
    • वनस्पतिकायिक जीवों के गुणस्थान, जीवसमास, मार्गणास्थान के स्वामित्व संबंधी 20 प्ररूपणाएँ।
      सत् ।
    • वनस्पतिकायिक जीवों की सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अंतर, अल्पबहुत्वरूप आठ प्ररूपणाएँ ।।
    • वनस्पतिकायिक जीवों में कर्मों का बंध, उदय, सत्त्व प्ररूपणाएँ । देखें बंध ; उदय ; सत्त्व ।
    • प्रत्येक नामकर्म की बंध, उदय, सत्त्व प्ररूपणाएँ ।।
    • प्रत्येक वनस्पति में जीव समासों का स्वामित्व । देखें वनस्पति - 1.1 ।
    • निर्वृत्त्यपर्याप्त दशा में प्रत्येक वनस्पति में सासादन गुणस्थान की संभावना । देखें सासादन - 1.9 ।
    • मार्गणा प्रकरण में भाव मार्गणा की इष्टता तथा वहाँ आय के अनुसार व्यय होने का नियम । देखें मार्गणा 6।
    • उदंबर फल । देखें उदंबर ।
    • वनस्पति में भक्ष्याभक्ष्य विचार−देखें भक्ष्याभक्ष्य - 4 ।
    • वनस्पतिकायिकों का लोक में अवस्थान ।−देखें स्थावर 9 ।
  2. निगोद निर्देश
    1. निगोद सामान्य का लक्षण ।
    2. निगोद जीवों के भेद ।
    3. नित्य व अनित्य निगोद के लक्षण ।
    4. सूक्ष्म वनस्पति तो निगोद ही है पर सूक्ष्म निगोद वनस्पतिकायिक ही नहीं है ।
    5. प्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति को उपचार से सूक्ष्म निगोद भी कह देते हैं ।
    6. प्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति को उपचार से बादर निगोद भी कह देते हैं ।
    7. साधारण जीवों को ही निगोद जीव कहते हैं ।
    8. विग्रहगति में निगोदिया जीव साधारण ही होते हैं प्रत्येक नहीं ।
    9. निगोदिया जीव का आकार ।
    10. सूक्ष्म व बादर निगोद वर्गणाएँ व उनका लोक में अवस्थान ।
    • निगोद से निकलकर सीधी मुक्ति प्राप्त करने संबंधी ।−देखें जन्म - 5.5 ।
    • जितने जीव मुक्त होते हैं, उतने ही नित्य निगोद से निकलते हैं ।−देखें मोक्ष - 2.5 ।
    • नित्यमुक्त रहते भी निगोद राशि का अंत नहीं ।−देखें मोक्ष - 6.6 ।
  3. प्रतिष्ठित व अप्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर परिचय
    1. प्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित प्रत्येक के लक्षण ।
    2. प्रत्येक वनस्पति बादर ही होती है ।
    3. वनस्पति में ही साधारण जीव होते हैं पृथिवी आदि में नहीं ।
    4. पृथिवी आदि देव, नारकी, तीर्थंकर आदि प्रत्येक शरीरी ही होते हैं ।
    • क्षीणकषाय जीव के शरीर में जीवों का हानिक्रम ।−देखें क्षीणकषाय 4।
    1. कंद-मूल आदि सभी वनस्पतियाँ प्रतिष्ठित व अप्रतिष्ठित दोनों प्रकार की होती हैं ।
    2. अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पतिस्कंध में भी संख्यात या असंख्यात जीव होते हैं ।
    3. प्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पतिस्कंध में अनंत जीवों के शरीर की रचना विशेष ।
  4. साधारण वनस्पति परिचय
    1. साधारण शरीर नामकर्म का लक्षण ।
    2. साधारण जीवों का लक्षण ।
    • साधारण व प्रत्येक शरीर नामकर्म के असंख्यात भेद हैं−देखें नामकर्म ।
    • साधारण वनस्पति के भेद ।−देखें वनस्पति - 2.2 ।
    1. बोने के अंतर्मुहूर्त पर्यंत सभी वनस्पति अप्रतिष्ठित प्रत्येक होती हैं ।
    2. कचिया अवस्था में सभी वनस्पतियाँ प्रतिष्ठित प्रत्येक होती हैं ।
    3. प्रत्येक व साधारण वनस्पति का सामान्य परिचय ।
    • प्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर बादर जीवों का योनि स्थान है, सूक्ष्म का नहीं ।−देखें वनस्पति - 2.10 ।
    1. एक साधारण शरीर में अनंत जीवों का अवस्थान ।
    2. साधारण शरीर की उत्कृष्ट अवगाहना ।
    • साधारण नामकर्म की बंध, उदय, सत्त्व प्ररूपणाएँ ।−देखें बंध ; उदय  ; सत्त्व ।
    • साधारण वनस्पति जीवसमासों का स्वामित्व ।−देखें वनस्पति - 1.1 ।
  5. साधारण शरीर में जीवों का उत्पत्ति क्रम
    1. निगोद शरीर में जीवों की उत्पत्ति क्रम से होती है ।
    2. निगोद शरीर में जीवों की उत्पत्ति क्रम व अक्रम दोनों प्रकार से होती है ।
    • जन्म मरण के क्रम व अक्रम संबंधी समन्वय ।−देखें वनस्पति - 5.2 ।
    1. आगे पीछे उत्पन्न होकर भी उनकी पर्याप्ति युगपत् होती है ।
    2. एक ही निगोद शरीर में जीवों के आवागमन का प्रवाह चलता रहता है ।
    • बीजवाला ही जीव या अन्य कोई भी जीव उस योनि स्थान में जन्म धारण कर सकता है । देखें जन्म - 2 ।
    1. बादर व सूक्ष्म निगोद शरीरों में पर्याप्त व अपर्याप्त जीवों के अवस्थान संबंधी नियम ।
    2. अनेक जीवों का एक शरीर होने में हेतु ।
    3. अनेक जीवों का एक आहार होने में हेतु ।

पुराणकोष से

  1. जैन दर्शन में वनस्पति को भी एकेंद्रिय जीव का शरीर माना गया है । वह दो प्रकार का है−प्रत्येक व साधारण । एक जीव के शरीर को प्रत्येक और अनंतों जीवों के साझले शरीर को साधारण कहते हैं, क्योंकि उस शरीर में उन अनंतों जीवों का जन्म-मरण,श्वासोच्छ्वास आदि साधारण रूप से अर्थात् एक साथ समान रूप से होता है । एक ही शरीर में अनंतों जीव बसते हैं, इसलिए इस शरीर को निगोद कहते हैं, उपचार से उसमें बसने वाले जीवों को भी निगोद कहते हैं । वह निगोद भी दो प्रकार का है नित्य व इतर निगोद । जो अनादि काल से आज तक निगोद पर्याय से निकला ही नहीं, वह नित्य निगोद है  और त्रसस्थावर आदि अन्य पर्यायों में घूमकर पापोदयवश पुनः-पुनः निगोद को प्राप्त होने वाले इतर निगोद हैं । प्रत्येक शरीर बादर या स्थूल ही होता है पर साधारण शरीर बादर व सूक्ष्म दोनों प्रकार का ।
  2. नित्य खाने-पीने के काम में आने वाली वनस्पति प्रत्येक शरीर है । वह दो प्रकार है−अप्रतिष्ठित और सप्रतिष्ठित । एक ही जीव के शरीर वाली वनस्पति अप्रतिष्ठित है और असंख्यात साधारण शरीरों के समवाय से निष्पन्न वनस्पति सप्रतिष्ठित है । तहाँ एक-एक वनस्पति के स्कंध में एक रस होकर असंख्यात साधारण शरीर होते हैं और एक-एक उस साधारण शरीर में अनंतानंत निगोद जीव वास करते हैं । सूक्ष्म साधारण शरीर या निगोद जीव लोक में सर्वत्र ठसाठस भरे हुए हैं, पर सूक्ष्म होने से हमारे ज्ञान के विषय नहीं हैं । संतरा, आम आदि अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति हैं और आलू, गाजर, मूली आदि सप्रतिष्ठित प्रत्येक । अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति पत्ते, फल, फूल आदि भी अत्यंत कचिया अवस्था में सप्रतिष्ठित प्रत्येक होते हैं−जैसे कौंपल । पीछे पक जाने पर अप्रतिष्ठित हो जाते हैं । अनंत जीवों की साझली काय होने से सप्रतिष्ठित प्रत्येक को अनंतकायिक भी कहते हैं । इस जाति की सर्व वनस्पति को यहाँ अभक्ष्य स्वीकार किया गया है ।


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