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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 30

From जैनकोष



भुक्त्वोज्झिता मुहुर्मोहान्मया सर्वेऽपि पुद्गलाः।

उच्छिष्टेष्विव तेष्वद्य मम विज्ञस्य का स्पृहा।।30।।

भय के औटपाये―जब तक इस जीव की शरीर और आत्मा में एकमेक मान्यता रहती है, शरीर को ही यह मैं हूं ऐसा समझा जाता है तब तक इस जीव में भय और दुःख होता है। ये जगत के प्राणी जो भी दुःखी है उनमें दुःख का कारण एक पर्यायबुद्धि है। अन्यथा जगत में क्लेश है कहाँ? ये सब बाह्य पदार्थ है, कैसा ही परिणमें, हमारा क्या बिगाड़ किया ? कोई भी कष्ट की बात नहीं है। आज वैभव है, कल न रहा, हमारा क्या बिगड़ गया, वह तो हमसे भिन्न ही था। रही एक यह बात कि अपना जीवन चलाने के लिए तो धन की जरूरत है? तो जीवन चलाने के लिए कितने धन की जरूरत है? तृष्णा क्यों लग गयी है, उसका कारण है केवल दुनिया में अपनी वाहवाही प्रसिद्ध करना, अन्यथा धन की तृष्णा हो नहीं सकती। धन आए तो आने दो। चक्रवर्तियों के 6 खंड को वैभव आता है आने का मना नहीं हे किंतु उस वैभव को ही अपना सर्वस्व समझ लेना, इसके बिना मेरा जीवन नहीं है, यही मेरा शरण है, ऐसे बुद्धि कर लेना, यही विपत्ति की बात है।

ज्ञानी का परिणाम―जब यह जीव इन समस्त बाह्य पदार्थों को अहितकारी मानकर, अपने से भिन्न समझकर त्याग कर देता है तब फिर कभी भी ये संताप के कारण नहीं होते। ज्ञानी पुरुष इसी प्रयोजन के लिए चिंतन कर रहा है कि मैने सभी पुद्गलों को भोग भोगकर बारबार छोड़ा, अब ये सारे भोग जूठे हो गये, एक बार भोजन कर लेने पर बाद में फिर उसे खाये तो वह झूठा कहलाया , खाये हुए को उगल करके फिर खाया। ऐसे ही यह जितनी विभूति है धन संपदा है ये सब कई बार भोग चुके हैं और भोग भोगकर उन्हें छोड़ दिया था। भोगकर छोड़े गए पुद्गल फिर भोगने में आ रहें है तब ये जूठे ही तो कहलाये। उन भोगों में मुझ ज्ञानी के क्या स्पृहा होना चाहिए?

अनंते परिवर्तनों में गृहीत भोग―यह जीव अनादिकाल से पंच परिवर्तन में घूम रहा है। सबने सुना है कि परिवर्तन 5 होते हैं। छह ढाला में लिखा है यों परिवर्तन पूरे करे। पहिली ढाल के अंत में है। इस प्रकार यह जीव परिवर्तन को पूरा करता है। वह परिवर्तन क्या है? उनका नाम है द्रव्यपरिवर्तन, क्षेत्रपरिवर्तन कालपरिवर्तन, भवपरिवर्तन और भावपरिवर्तन। द्रव्यपरिवर्तनका पहिला स्वरूप देखो―किसी जीवने अगृहीत ही पुद्गल परमाणुओं को, स्कंधों को ग्रहण किया, और इस परिवर्तन से पहिले जो भोगने में आये थे, जब अनेक बार उन गृहीत स्कंधों का ग्रहण कर लिया फिर अगृहीत स्कंध ग्रहण में आया। गृहीत मानते हैं जिन पुद्गलों को पहिले भोग चुके और अगृहीतके मायने है जिन पुद्गलों को पहिले भोगा न था। यद्यपि ऐसी बात नहीं है कि कोई पुद्गल ऐसे भी हो जिन्हें पहिले कभी न भोगा था। लेकिन परिवर्तन जबसे बताया है तबका हिसाब है। अनंत बार भोगा हुआ ग्रहणकर ले तब बिना भोगा ग्रहण में आया। यों अनंत बार फिर भोगा हुआ ग्रहण करे तो फिर बिना भोगा हुआ ग्रहण में आया। इस तरह बिना भोगा भी अनंत बार ग्रहण में आ चुके, तब भोगा और बिना भोगा मिलकर ग्रहण में आया। इस तरह बिना भोगा भी अनंत बार ग्रहण में आ चुकें, तब भोगा और बिना भोगा मिलकर ग्रहण में आये, इस तरह गृहीत अगृहीत मिश्र का कई पद्धतियों में ग्रहण बता करके द्रव्यपरिवर्तनकी बात है। उससे सिर्फ यह जानना है कि इस जीवने अब तक संसार के सभी पुद्गलों को अनेक बार भोगा है और भोगकर छोड़ा है।

तृष्णाका आतंक―भैया ! अनंतों बारका भोगा हुआ व छोड़ा हुआ यह वैभव फिर मिला है तो इसमें तृष्णा फिर बन गयी। भव-भव में तृष्णाएँ की, वे तृष्णाएँ पुरानी हुई, जीर्ण हुई, मिट गयी, फिर नवीन तृष्णाएँ बना ली। जैसे पहिले हम आप सभी बच्चे थे, फिर जवान हुए, अब बूढ़े हो रहे हैं। तो बचपन में जो दिल होता है, जिस प्रकार की खुशी होती है वह अब कहाँ है? बचपन में पहिले कुछ विद्या सीखी, स्वर व्यंजन सीखा तो खुश हो गये, समझा कि बहुत कुछ सीख लिया, खूब पढ़ लिया। अब देखो जवानी व्यतीत हो गयी, बूढ़े हो गए, मरण हो जाएगा। फिर कदाचित् मनुष्य हो गये तो बच्चे होंगे फिर वही स्वर व्यंजन नई चीज मान लेंगे और फिर वही नई उत्सुकता होगी। अच्छा दूसरे भव की बात छोड़ों, कल भी कुछ आपने खाया था, वही दाल, रोटी, साग, छककर खाया था, तृप्त हुए थे, आज 10 बजे फिर वही दाल, रोटी साक खाया होगा तो कुछ नई सी मालूम हुई होगी। कितने ही बार भोग भोगता जाय यह व्यामोही फिर भी बीच-बीच में जो भोग मिलें, साधन मिले, वैभव मिले तो वे भोग नये-नये लगते हैं।

व्यर्थका अभिमान―भैया! अनेक बार सेठ हो चुके होंगे, आज लाख या हजार का वैभव मिल गया तो वही नया मान लिया। मैने बहुत चीज पायी। और इससे करोड़ों गुणा वैभव पाया और उसे छोड़ दिया। अनेक बार राज्यपद पाया होगा, बड़ी हुकूमत की होगी पर आज कुछ लोगों में नेतागिरी मिली या कुछ हुकूमत मिल जाय, थोड़े राज्य में पैठ हो जाय तो यह बड़ा अभिमान करता है, फूला नहीं समाता। मैं अब यह हो गया हूं, अरे इससे बढ़-बढ़कर बातें हुई उसके आगे आज मिला क्या है? परंतु यह मोही कुछ भी मिले उसे ही नई चीज मानता है। क्या प्रकृति है इस जीव की कि इन भोगों को अनेक बार भोगा है फिर भी ये जब मिलते हैं तो नये से लगते हैं। ज्ञानी पुरुष चिंतन कर रहा है कि अब उन जूठे भोगों में मुझ ज्ञानी की क्या स्पृहा हो? अनादि कालसे मोहनीय कर्म के उदयवश सभी पुद्गलोंको मुझ संसारी जीव ने बार-बार भोगा और भोग करके छोड़ दिया। अब कुछ चेत आया है, अब मैं विवेकी हुआ हूँ, शरीर आदिकके स्वरूपको भली प्रकार जानकर अब उन जूठे भोजन में, गंध आदिक पदार्थों मे अब मेरे भोगनेकी क्या इच्छा हो?

आत्मीय आनंदकी अपूर्वता―भैया ! जब तक किसी को निरूपम आनंद का अनुभव नहीं हो लेता तब तक विषयों की प्रीति नहीं छूट सकती। इसे तो आनंद चाहिए। वर्तमान आनंद से अधिक आनंद किसी बात में हो तो इसे छोड़ देगा, बड़े आनंद वाली चीज ग्रहण करेगा। मोह दशा में परपदार्थों की और बुद्धि होने के कारण इस जीवको अपने आत्मस्वरूप में रूचि नहीं है और न यह विकल्पों का बोझा हटाना चाहता है। विकल्पों का ही मौज मानता है। मोह बढ़ाकर, ममता बढ़ाकर, राग बसाकर यह जीव अपने को कुशल और बड़ा सुखी मानता है, फिर इसे आत्मीय सत्य आनंद कैसे प्राप्त हो? जो बड़े स्वादिष्ट पदार्थों का सेवन करने वाला है उस पुरुष को जूठा खाने में कोई अभिलाषा नहीं होती। जूठे पदार्थों को मनुष्य घृणा की दृष्टि देखते हैं। तो यो ही यह समझो कि ये रमणीक समस्त पदार्थ अनेक बार भोग लिए गए वे झूठे है। उनमें मुझ ज्ञानी की क्या इच्छा हो?

स्पर्शनेंद्रियविषयकी अरम्यता―भैया ! कुछ निर्णय तो करो कि कौनसा विषय ऐसा है जो हितकारी हो, जिसमें रमण करना हो? कोई भी विषय नहीं है। यह कामी पुरुष कामवासना के वश होकर शरीरके रूप को बहुत रमणीक मानता है। मगर रूप क्या है? अरे थोड़ी सी देर में नाक निकल पड़े तो बड़ा सुंदर जंचने वाला रूप भी किरकिरा हो जाता है, घृणा आने लगती है। जिसे जानते हैं कि यह बहुत अच्छी छवि है, क्रांति है, रूप है, सुडौल है, और जरा नाक मल बाहर निकल आये, थोड़ा ओठों से भिड़ जाय और इतना ही नहीं, कुछ अंदाज भी हो जाय तो वहाँ फिर रति नहीं हो सकती। घृणा होने लगती है।

शरीर की असारता―अहो, कर्मों ने तो मानो इस अपवित्र मनुष्य शरीर को इसलिए बनाया कि यह जीव विरक्त होकर अपने आत्महित के मार्ग में लगे। भीतर से बाहर तक सारा शरीर अपवित्र ही अपवित्र है। जैसे केले के पेड़ में सार नहीं रहता, उसे छीलते जावो तो पत्ते निकलते जायेंगे, सब खत्म हो जायेंगे, पर सारकी बात कुछ न मिलेगी। जैसे वह केले का पेड़ असार है ऐसे ही जानो कि इस शरीर में कुछ सार नहीं है। अपवित्र वस्तुओंको सबको हटा दो फिर क्या मिलेगा देह में बहुत अंदर से बाहर तक अपवित्रता ही अपवित्रता नजर आती है इस शरीर में। भीतर हड्डी, फिर मांस, मज्जा, खून, चमड़ा, रोम है। कही कुछ भी तत्त्व की बात नहीं मिलती है। यदि कुछ तत्त्व की बात मिलती हो तो बताओ, पर मोह का ऐसा नशा है इस जीव पर कि जो असार है, जिस शरीर में कुछ सारकी बात नहीं है, अपवित्र ही अपवित्र है पूरा और फिर भी इस शरीर को निरखकर मोही पुरुष कुछ कल्पना बनाकर मौज मानते हैं।

नर देहमें जुगुप्सा और असारता―भैया! पृथ्वीमें, वनस्पति में इनमें तो कुछ सार मिल जायगा, जितने ये काम आ रहे हैं पृथ्वी और वनस्पति प्रयोग में आ रहे हैं,पर यह मनुष्य का शरीर किसी काम आता है क्या? मर जाने के बाद बड़ी जल्दी जलावो ऐसी लोगों को आकुलता हो जाती है। देर तक मुर्दा न रहे, कोई लोग तो यह शंका करते हैं कि देर तक मुर्दा रहने से घर में भूत न बस जाय। कोई अपवित्र दुर्गंधित वातावरण न हो जाय, इससे डरते हैं,उसका मुख भयानक हो जाता है सो उससे डरते हैं। घरके ही लोग उस मुर्दे की शक्ल भी नहीं देख सकते हैं,छुपते हैं। किस काम आता है यह शरीर, सो बताओ? इस शरीर से भले तो उपयोग की दृष्टि से पृथ्वी और वनस्पति है, इनका फिर भी आदर है, हीरा-जवाहरात, सोना-चांदी ये सब पृथ्वी ही तो है, इनमें भी जीव था, अब जीव नहीं रहा तो मुर्दा पृथ्वी है, किंतु इस मृतक पृथ्वी का कितना आदर है? वनस्पतियों में काठ आदि का कितना आदर है, कितनी ही उस पर कलात्मक रचनाएँ की जाती है पर मनुष्य शरीर का क्या होता है, क्या आस्था है इसकी, कौन रखता है इसे?

शरीर की कृतघ्नता―यह शरीर प्रीति के योग्य नहीं है और फिर अपने आपके शरीर को भी कह लो, यह शरीर भी प्रीति के योग्य नहीं है, इसे आराम से रखो, कही इसे कष्ट न हो जाय। अरे क्या डरना, जैसे सर्प को दूध पिलाओ तो विष ही उगलेगा ऐसे ही इस शरीर को कितना ही सजाओ, कितना ही गद्दा तकियों पर रक्खे रहो, दूसरे का भी काम न करना पड़े, शरीर पर कितनी ही मेहरबानी करो पर शरीर की और से क्या उत्तर मिलेगा? रोग, अपवित्रता से सारी बातें और अधिक इसमें फैल जाती है और अंत में यह साथ न जायगा। कितना ही इससे मरते समय लड़ो―अरे शरीर ! तेरे लिए हमने जिंदगी में बड़े-बड़े श्रम किये, संकल्प विकल्प आकुलता व्याकुलता के कितने ही प्रसंग आये, उनमें मैने तुझे बड़े आराम से रक्खा, तू मेरे साथ तो चल। तो इस जीव के साथ एक कण भी चलता है क्या?

वैभव की असारता―कौन सा ठाठ है ऐसा सारभूत जिसमे इतना रमा जा रहा है? वह वैभव रमने के लायक नहीं है तिस पर भी कितना इसका बेढंगा नाच है, कितना भी वैभव मिल जाय तो इसे थोड़ा लगता है। मुझे तो यह थोड़ा ही है, हम तो बड़े कष्ट में है, कुछ ढंग से गुजारा ही नहीं चलता है। ज्ञानी जीव इस वैभव को झूठा समझता है। करने योग्य काम तो निर्विकल्प होकर ज्ञानप्रकाश का अनुभव करना है और सारी बातें मायामयी है, व्यर्थ है, केवल बरबादी के ही कारण है। ज्ञानीपुरुष इन पुद्गल से प्रीति नहीं रखता है। किस भव में ये विषयभोग नहीं मिले, सूकर, कूकर, कीट, पतंग जो कुछ भी भव धारण किया क्या उन सब भवों में विषयभोग नहीं भोगे ? इस जीव के लिए खेद की बात यह है कि जैसे अग्नि कभी यह नहीं कहती कि मुझे ईधन अब न चाहिए, अब मैं तृप्त हो गयी हूं। उसमें तो जितना ही ईधन डालो उतनी ही वह बढ़ती चली जायगी, ऐसे ही ये विषयभोग के साधन है, जितने ही भोगविषयों के साधन मिलते जायेंगे उतनी ही तृष्णा बढ़ती चली जायगी।

गुण ग्रहण की भावना―भैया ! सच बात तो यह है कि जब तक होनहार अच्छा नहीं आने को होता है तब तक इस जीव को ज्ञान भी नहीं जगता, विवेक नहीं होता। जिसका होनहार ही खोटा है उसको धर्म की रीति से ज्ञान की बात नहीं रूचती है। वह तो सर्वत्र दोष ही दोष निरखता रहता है। उसके सर्वत्र दोष ही दोष का ग्रहण होगा। धर्मीजनों में कुछ अच्छी भी बात है, पर इस और दृष्टि नहीं जाती। धर्म खराब है, कुछ जैनियों का उदाहरण दे दिया, अमुक यों है, अमुक यों है। अरे तुम्हें अमुक से क्या मतलब ? धर्म में जो वस्तुस्वरूप बताया है उस स्वरूप का आचरण करके तुम्हीं ठीक बनकर उदाहरण बन जावो। धर्म मानने वाले लोगो के दोष निरखकर कौनसी सिद्धि हो जायगी ? तुम उसके गुण देखो, धर्म में क्या गुण है, धर्म में क्या प्रकाश है, यह सिद्धांत वस्तुस्वरूप को किस प्रकार कह रहा है, उसको निरखो। जब ध्यान में आयगा―अहो, ऐसा स्वतंत्र स्वरूप मेरा है ज्ञानानंदमात्र, आनंद जगेगा और समस्त झंझटों का परित्याग हो जायगा, समस्त संकट टल जायेंगे। ये भोग भव-भव में भोगे है। इन भोगे हुए भोगों में मुझ ज्ञानस्वरूप आत्मा की इच्छा क्यों हो? ऐसी भावना ओर आचरण बनाना चाहिए।


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