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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 31

From जैनकोष



कर्म कर्महिताबंधि जीवो जीवहितस्पृहः।

स्वस्वप्रभावभूयस्त्वे स्वार्थ को वा न वांछति।।31।।

कर्म और जीव में अपने-अपने प्रभाव की और झुकाव―कर्म कर्मोंके हित की बात करते हैं और जीव-जीव के हित को चाहता है। सो यह बात युक्त ही है कि अपने-अपने को प्रभाव बढ़ाने के लिए कौन पुरुष स्वार्थ को नहीं चाहता है? इस श्लोक में बताया है कि कर्मों के उदय से होता क्या है? कर्म बँधते हैं,कर्म कर्मों को ग्रहण करने के लिए स्थान देते हैं। कर्मों में कर्म बंधन है। कर्मों से कर्म आगे संतान बढ़ाते चले जाते हैं। तो इन कर्मों ने कर्मों का कुटुंब बनाने की ठानी। और यह जीव, अंतरंग से पूछो इससे कि यह क्या चाहता है? यह अपना हित चाहता है; आनंद, शांति चाहता है। भले ही कोई भ्रम हो जाय और उस भ्रम में सही काम न कर सके, यह बात दूसरी है किंतु मूल प्रेरणा जीव को जीव के हित की भावना से उठती है। इस जीव ने जीव का हित चाहा और कर्मों ने कर्मों का कुल बढ़ाया सो यह बात लोक में युक्त ही है कि प्रत्येक जीव अपनी-अपनी बिरादरी का ध्यान रखता है, कुल को बढ़ाता है। कर्मों ने कर्मों को बढ़ाया, जीव ने जीव का संबंध चाहा।

लोकयुक्तता―संसार में यह बात प्रसिद्ध है कि जो बलवान होता है वह दूसरे को अपनी ओर खींच लेता है। जब कर्म बलिष्ठ होगा तो वह अनेक कर्मों का आकर्षण कर लेगा और जब जीव बलिष्ठ होता तो यह जीव अपने स्वभाव का विकास कर लेगा। अपना-अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए सभी पदार्थ उद्यत है। ये कर्म उदय में आते हैं तो कर्मों के उदय के निमित्त से जीव में क्रोधादिक कषायें उत्पन्न होती है और उन कषाय भावों के निमित्त से कर्मों का बंधन होने लगता है। फिर उनका उदय आता है। जीव के भाव बिगड़े, नवीन कर्म बँधे, इस तरह से यह संतति चलती रहती है। इन कर्मों ने इस प्रकार से कर्मों की संतति बढ़ायी है।

जीव और कर्म में निमित्त नैमित्तिक संबंध होने पर भी स्वतंत्रता―जीव में और कर्म में परस्पर निमित्तनैमित्तिक संबंध है। जीव के भाव का निमित्त पाकर कर्मों का बंधन होता है। अर्थात् कार्माणवर्गणाएँ स्वयं ही कर्म रूप से प्रवृत्त हो जाती है, और कर्मों का उदय होने पर यह जीव स्वयं रागादिक भावों में प्रवृत्त हो जाता है। ऐसा इन दोनों में परस्पर में निमित्त नैमित्तिक संबंध है, फिर भी किसी भी पदार्थ का परिणमन किसी अन्य पदार्थ में नहीं पहुँचता है। जैसे यही देख लो―बोलने वाला पुरुष और सुनने वाले लोग इन दोनों को परस्पर में निमित्तनैमित्तिक संबंध है। बोलने वाले का निमित्त पाकर सुनने वाले शब्दों को सुनकर और उनका अर्थ जानकर ज्ञानविकास करते हैं,यो उनके इस ज्ञानविकास में कोई वक्ता निमित्त हुआ और वक्ता को भी श्रोताओं को निरखकर धर्मचर्चा सुनाने की रूचि हुई। ये कल्याणार्थी है ऐसा जानकर वक्ता उस प्रकार से अपना भाषण करता तो यों वक्ता को बोलने में श्रोतागण निमित्त हुए और श्रोतागणों के सुनने और जानने में वक्ता निमित्त हुआ। ऐसा परस्पर में निमित्त नैमित्तिक सम्ंबध है। फिर भी वक्ता ने श्रोतावों में कुछ परिणमन नहीं किया और श्रोताओं ने वक्ता में कुछ परिणमन नहीं किया। ऐसे निमित्तनैमित्तिक संबंध का यथार्थ मर्म तत्त्वज्ञानी पुरुष जानता है।

निमित्तनैमित्तिक चक्र में जीव का कल्याण―इस निमित्तनैमित्तिक भाव के चक्र मे यह जीव अनादि काल से संसार में जन्म मरण करता चला आ रहा है। इस पर कैसी मोहनी धूल पड़ी है अथवा इसने मोह की शराब पी है कि इसे जो कुछ आज मिला है, जिन जीवों का समागम हुआ है, जो धन वैभव साथ है यह उसको अपना सब कुछ मानता है, यही मेरा है। अरे न तेरे साथ कुछ आया और न तेरे साथ जाएगा। ये तो तेरी बरबादी के ही करण हो रहे हैं। उनका निमित्त करके, आश्रय करके उनको उपयोग का विषय बनाकर अपनी विभाव परिणति रच रहे हैं,क्या कल्याण किया उन समागमों के कारण? कुछ भी कल्याण नहीं किया, लेकिन यह मोही जीव कूद-कूदकर सबको छोड़कर केवल इने गिने दो चार जीवों को अपना सब कुछ मान लिया। कितना लाखों का धन कमाया, वह किसके लिए है? केवल उन्ही दो चार जीवों के आराम के लिए। उसकी दृष्टि में जगत के शेष जीव कुछ नहीं है। यहाँ कितना बड़ा पागलपन छाया है? दुःखी होता जाता है, और दुःख का कारण जो अज्ञान है, मोह उसे छोड़ना नहीं चाहता है।

निर्मोहता का आदर―धन्य है वे गृहस्थ जन जो गृहस्थी के संपदा के बीच रहते हुए जल में भिन्न कमल की नाई रहते हैं। यह जो आगम में लिखा है कि ज्ञानी पुरुष जल में भिन्न कमल की तरह रहते हैं तो क्या कोई ऐसे होते नहीं है? किनके लिए लिखा है? न रहे जल में भिन्न कमल की भांति, खूब आसक्ति रक्खे तो उससे पूरा पड़ जायगा क्या? मरते हुए जीव को दो चार आदमी पकड़े रहें तो जीव रूक जायगा क्या? अथवा कोई कितनी ही मिन्नते करे कि ऐ जीव! तुम अभी मत जाओ तो क्या वह रूक जायगा? उसका क्या हाल होगा? बहुत मोह किया हो जिसने, वह भी क्या रूक सकता है? मोह का कैसा विचित्र नशा है कि अपने आत्मा की जो निरूपम निधि है, ज्ञानानंदस्वरूप है उस स्वरूप को तो भुला दिया और बाह्यपदार्थों में रत हो गया, समय गुजर रहा है बहुत बुरी तरह से। शुद्ध ज्ञान हो, सच्चा ज्ञान बना रहे तो वहाँ कोई क्लेश हो ही नहीं सकता। जब यथार्थ ज्ञान से हम मुख मोड़े है और अज्ञानमयी भावना बनाते हैं तब क्लेश होता है।

आत्मप्रभाव के लिए संकल्प―जो कर्मों से घिरा हुआ है, जिस पर कर्म प्रबल छाये हैं,बड़ीशक्ति के कर्म है ऐसे जीव पुनः कर्मों का संचय करते हैं,और जिनके कर्म शिथिल हो गये, ज्ञान प्रकाश जिनका उदित हो गया है ऐसे ज्ञानी पुरुष ज्ञानानंदस्वरूप में आनंदमय निज स्वभाव में स्थित रहा करते हैं। कर्म कर्मों को बढाये, जीव-जीव का ही हित चाहे, ऐसी बात जानकर है मोक्षार्थी पुरुषो ! जब कर्म अपनी हठपर तुले हुए है तब हम मुक्ति से प्रीति क्यों नहीं करते, क्यों संसार की भटकना, क्लेश, इनमें ही प्रीति करते है? कर्मों ने ऐसी हठ बनायी है तो हम अपने स्वभाव विकास की हठ बनावें ना? कर्म या चलते हैं चले। कर्म क्या करेंगे? कुछ धन नष्ट हो जायगा, या जीवन जल्दी चला जायगा या यश नष्ट हो जायगा। इन तीन बातों के सिवाय और क्या हो सकता है, सो बताओ?

शुद्ध ज्ञानरूप साहस―भैया ! अंतरंग में परमप्रकाश पावो। धन चला जाय तो चला जाय, वह दूर तो रहता ही था और दूर चला गया। कहाँ धन आत्मा में लिपटा है? वह तो दूर-दूर रहता है। यह धन दूर-दूर तो रहता ही था और दूर हो गया। इस घर में न रहा, किसी और घर में चला गया। जो धन है उसका बिल्कुल अभाव कहाँ होगा? जो इस मायामयी दुनिया में अपना झूठा पर्याय नाम नहीं चाहते हैं उन पुरुषो को यश बिगड़ने का क्या कष्ट होगा ? हाँ अपने आप में कोई दुर्भावना न उत्पन्न हो फिर तो वह मौज में ही है, उसकी शांति को किसने छीना है ? ऐसा साहस बनावो कि दो-एक नहीं, सारा जहान भी मुझे न पहिचाने, अगर अपयश गाता फिरे तो सारा जहान गावे उससे इस अमूर्त आत्मा को कौन सी बाधा हो सकती है ? सत्यमेव जयते। अंत में विजय सत्य की ही होती है। यदि शुद्ध परिणाम है, शुद्ध भावना है तो इस जीव का कहाँ बिगाड़ है, कर्म क्या करेंगे ? इन तीन पर ही तो ये कर्म आक्रमण कर सकते हैं। ज्ञानी पुरुष को इन तीन की भी कुछ परवाह नहीं होती है।

यश अपयश के क्षोभ से विरक्त रहने में भलाई―आत्मा का कल्याण तब होता है जब यह समस्त परविषयक विकल्पों को तोड़कर केवल शुद्ध ज्ञानप्रकाशमात्र अपना अनुभव बताता है ऐसा करने में उसने समस्त यश अपयश को छोड़ ही तो दिया। अपयश होने में जो बुराई है वही बुराई यश मे भी है। अपयश से तो यह जीव दुःख मानकर संक्लेश करता है और पाप का बंध करता है और यश होने पर यह जीव रौद्र आशय बनाता है, रौद्रानंदी बन जाता है, उसमे क्रूरता, बहिर्मुखता बढ़ती जा रही है और उसमें जो संक्लेश हुआ, जो कलुषता बनी, बहिर्मुख दृष्टि बढ़ी, उनके निमित्त से जो कर्मों का बंध हुआ उनके उदयकाल में क्या दुर्गति न होगी? जितना बिगाड़ अपयश से हे उतना ही बिगाड़ यश से है। अज्ञानी जीव को तो सर्वत्र विपदा है। वह कही भी सुख शांति से रह ही नहीं सकता। ज्ञानी जीव को सर्वत्र शांति है, उसे कोई भी वातावरण स्वरूप से विचलित नहीं कर सकता है, अज्ञानी नहीं बना सकता है।

मूढ़ता में क्लेश होने की प्राकृतिकता पर दृष्टांत―कोई उद्दंड पुरुष हो और उसे हर जगह क्लेश मिले तो उसका यह सोचना व्यर्थ हे कि अमुक लोग मेरे विरोधी है और मुझे कष्ट पहुँचाते हैं। अरे कष्ट पहुँचाने वाला कोई दूसरा नहीं है। खुद ही परिणाम बिगाड़ते हैं और कष्ट में आते हैं। कोई एक बुद्धिहीन मूर्ख पुरुष था। उसे लोग गाँव में मूरखचंद बोला करते थे। वह गाँव वालो से तंग आकर घर छोड़कर गाँव से बाहर चला गया, रास्ते में एक कुवां मिला, वह उस कुंवे की मेड़ के ऊपर कुंवे में पैर लटकाकर बैठ गया। कुछ मुसाफिर आए और बोले कि अरे मूरखचंद कहाँ बैठे हो ? तो वह पुरुष उठकर उन मुसाफिरों के गले लगकर बोलता है―भाई, और भई सो भई पर यह तो बताओ कि तुमको किसने बताया कि मेरा नाम मूरखचंद है ? मुसाफिर बोले कि हमको किसी ने नहीं बताया, तुम्हारी ही करतूत ने बताया कि तुम्हारा नाम मूरखचंद है।

क्लेश का कारण मोह―इस संसार में जो जीव दुःखी है वे मोह की उद्दंडता से दुःखी है, किसी दूसरे का नाम लगाना बिल्कुल व्यर्थ है कि अमुक ने मुझे यो सताया। व्यर्थ की कल्पनाएँ करना बेकार बात है। मैं स्वयं ही अज्ञानी हूँ इस कारण अज्ञान से ही क्लेश हो रहे हैं। संसार की स्थिति किसी ने अब तक क्या सुधार पायी है? बड़े-बड़े महापुरुष हुए जिनके नाम के पुराण रचे गए है, पुराणों मे जिनका नाम बड़े आदर से लिया जाता है उन्होने भी तो स्वांग रचा था, घर बनवाया, गृहस्थी बसायी, बाल बच्चे हुए, राजपाठ हुआ, युद्ध भी किया, सारे स्वांग तो रचे उन्होने भी, क्या संसार की इस स्थिति को पूरा कर पाया ? वैसी ही चलती गाड़ी बनी रही। कुछ दिन घर रहे, फिर छोड़ा कोई तप करके मोक्ष गए, कोई स्वर्ग गए, कोई बुरी वासना में मरकर नरक गए। सबका विछोह हुआ, लो कही का ईट कही का रोड़ा। जोड़ा तो बहुत था पर अंत में सब कुछ बिछुड़ गया। क्या किसी ने पूरा कर पाया?

व्यर्थ की चिंता―सब व्यर्थ की चिंता मचा रक्खी है मोही प्राणियों ने। मुझे इतनी जायदाद मिल जाय, मैं इस ढंग का कार्य बना लूं फिर तो कुछ चिंता ही न रहेगी। अरे भाई जब तक पर्याय मूढ़ता है तब तक बेफिक्र हो ही नहीं सकते। एक फिक्र मिट गई तो उसकी सवाई एक फिक्र और लग जायगी जिसमें उस फिक्र से भी ड्योढ़ी ताकत बनी हुई है। कहाँ तक मिटावोगे ? फिक्र तो तब मिटेगी जब फिक्र की फिक्र छोड़ी जाय। जो होता हो होने दो। कर भी क्या सकता है कोई इसमें? उदय होगा तो स्वतः ही अनुकूल बुद्धि चलेगी, स्वतः संयोग मिलेगा और वह कार्य बनेगा। कौन करने वाला है किसी दूसरे का कुछ। यह मनुष्य जीवन बाहरी विभूतियों के संचय के लिए नहीं पाया है। अपना उद्देश्य ही कर लो। जो उस पर चलेगा अर्थात सत्य मार्ग पर चलेगा उसी को ही फल मिलेगा। धर्म का पालन इसी को ही कहते हैं।

सपद्धति ज्ञानप्रयोग का अनुरोध―भैया! केवल पूजन स्वाध्याय का सुनना या अन्य प्रकार से धर्म पालन को शौक निभाना इतने मात्र से काम नहीं चलता किंतु कुछ अपने में अंतर लाये, कुछ ज्ञानप्रयोग करे, जो कुछ सुना है, समझा है , जाना है उसको किसी अंश में करके दिखाये। किसे दिखाये ? दूसरे को नहीं। अपने आपको दिखा दे। जो बात धर्म पालन के लिए बतायी गई है वहाँ धर्म है, केवल रूढ़िवाद मे क्या रखा है। कोई एक सेठ था, रोज शास्त्र सुनने आता था। एक दिन देर में आया तो पंडित जी ने पूछा―सेठ जी आज देर से क्यों आए ? सेठ जी बोले―पंडित जी वह एक जो छोटा मुन्ना है ना, 10 वर्ष का, वह भी हठ करने लगा कि मैं भी शास्त्र सुनने चलूंगा। फिर जब बहुत उसे मनाया, आठ आने पैसे देकर सिनेमा का टिकट कटाया, उसे भेजा तब यहाँ आ पाये। पंडित जी बोले―सेठ जी बच्चा भी आ जाता, शास्त्र सुन लेता तो क्या नुकसान था? तो सेठ जी कहने लगे―पंडित जी! तुम तो बहुत भोले हो। हम शास्त्र सुनने की विधि जानते हैं कि शास्त्र सुनने की क्या विधि है। अपने कुर्ता में, चद्दर मे सब धरते जाना फिर चलते समय उन सब कपड़ों को झटककर जाना। यह है सुनने की विधि। तो हम तो जानते हैं कि शास्त्र कैसे सुना जाता है, पर वह 10 वर्ष का बच्चा जिसे सुनने की विधि भी नही याद है, वह कही शास्त्र सुनने से विधि के खिलाफ हृदय में धारण कर ले और कुछ ज्ञान वैराग्य जगे, घर छोड़ दे तो हम क्या करेंगे ? तो भाई यह शास्त्र सुनने की विधि नही है।

कार्य की प्रयोगसाध्यता―भैया! जो करना हो अपनी कुछ शांति का काम तो अंतर में कुछ प्रयोग करना होगा। बातों से तो काम नही चलता। कोई मनुष्य प्यासा हो और वह पानी-पानी की 108 बार जाप जप ले तो कही पानी तो पेट में न आ जायगा, प्यास तो न मिट जायगी। ऐसे ही शांति आती है शुद्ध ज्ञान से। शुद्ध ज्ञान का प्रकाश हो वहाँ शांति है, हम ज्ञानप्रकाश को ही न चाहें और वही ममता तृष्णा वही कषाय निकलती रहें तो धर्म पालन कहाँ हुआ? वह तो केवल बात ही बात है।

कषायपरित्याग से शांति का उद्भव―अनंतानुबंधी क्रोध बताया है जहाँ धर्म के प्रसंग में भी क्रोध आए। और जगह क्रोध आए वह उतना बुरा नही है। अनंतानुबंधी मान बताया है कि धर्मात्माजनों के सामने अपना अभिमान बगराये। और जगह अभिमान करे वह प्रबल अभिमान नही कहलाता मगर धर्मात्माजनों के समक्ष भी अपना मान करे। मंदिर में आये तो हाथ जोड़कर नमस्कार करने तक में भी हिचकिचाहट हो या अन्य साधु संतो के प्रति, सधर्मी जनो के प्रति धर्म के नाते से धर्मीपन को दिखने के कारण अभिमान कोई बगराये तो उसे अनंतानुबंधी मान कहते हैं। धर्म के मामले में कोई माया करे, छल, कपट करे तो उसे अनंतानुबंधी माया कहते हैं,और धर्म के ही प्रसंग में कोई लोभ करे तो उसे अनंतानुबंधी लोभ कहते हैं। जहाँ अनंतानुबंधी कषाय वर्त रही हो वहाँ आनंद के स्वप्न देखने से आनंद का काम कैसे पूरा किया जा सकता है ? इस तत्त्वज्ञान की बात को हृदय में धरें और विवेकियों से उपेक्षा करे तो यह जीव अपना प्रभाव बढ़ा सकता है और कल्याण कर सकता है।


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