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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 7

From जैनकोष



मोहेन संवृत्तं ज्ञानं स्वभावं लभते न हि।

मत्तः पुमान् पदार्थानां यथा मदनकोद्रवैः।।७।।

मोहीका अविवेक—मोह से ढका हुआ ज्ञान पदार्थों के यर्थाथ स्वभाव को प्राप्त नही कर पाता है अर्थात् स्वभाव को नही जान सकता है, जैस कि मादक कोदो के खाने से उन्मत्त हुआ पुरुष पदार्थ का यथावत भाग नही कर पाता है जैसे मादक पदार्थों पान करने से मनुष्य का हेय का और उपादेयका विवेक नष्ट हो जाता है, उसे फिर पदार्थ का सही ज्ञान नही रहता। जैसे पागल पुरुष कभी स्‍त्री को माँ और मां को स्‍त्री भी कहता है ओैर किसी समय माँ को माँ भी कह दे तो भी वह पागल की ही बात है, इसी तरह मोहनीय कर्म के उदयवश यह जीव भी अपने शुद्ध स्वरूप को भूल जाता है, उसे हेय और उपादेय का सच्चा विवेक नही रहता है। जो अपनी चीज है उसको उपादेय नही समझ पाता, जो परवस्तु है उसको यह हेय नही समझ पाता। उपादेय को हेय किए हुए है और हेय को उपादेय किए हुए है।

अमीरी और गरीबी—भैया !अपने स्वरूप का यथावत भान रहे, उसकी तरह जगत में अमीर कौन है? जिसको अपने स्वरूप का भान नही है उसके समान लोक में गरीब कौन है। गरीब वह है जिसके अशांति बसी हुई है और अमीर वह है जिसके शान्ति बसी हुई है। धन सम्पदा पाकर यदि अशान्ति ही बस रही है, उस सम्पदा के अर्जन मे, रक्षण में या उस सम्पदा के कारण गर्व बढ़ाने में अशान्ति बनी हुई है तो उस अशान्ति से तो वह गरीब ही है। अमीर वह है जिसे शान्ति रहती है। शान्ति उसे ही रह सकती है जो पदार्था का यथावत ज्ञान करता है। जो पुरुष अपने से सर्वथा भिन्न धन वैभव सम्पदा के स्‍त्री पुत्र मित्र आदिक में आत्मीयत्व की कल्पना कर लेता है, यह मैं हूं, यह मेरा है, इस तरह का भ्रम बना लेता है, दुखःकारी सुखों को, भोगों को भी सुखकारी मान लेता है तो उसे फिर यह अपना आत्मा भी यथावत् नही मालूम हो सकता। यह मोही जीव को अपना आत्मा नाना रूपों प्रतिभासित होता है, मैं अमुक का दादा हूं, पिता हूँ, पुत्र हूँ, इस कल्पना में उलझकर अपने स्वरूप को भुला देता है।

मोह में विचित्ररूपता—यह मोही जीव अपने को यथार्थ एकस्वरूप निरख नही पाता। मोहवश यह अपने को न जाने किन-किन रूप मानता है? जब जैसी कल्पना उठी तैसा मानने लगता है। जैसे डाक के सम्बन्ध से दर्पण में अनेकरूप दिखने लगते हैं,लाल कागज लगावो तो वह मणि लाल दिखती है, उसके पीछे लाल-हरा जैसा कागज लगावो तैसा ही दिखने लगता है। ऐसे ही नाना विभिन्न कर्मों का सम्बंध आत्मा के साथ है। सो जिस-जिस प्रकार का सम्बंध है उससे आत्मा नाना तरह का दिखता है, लेकिन जैसे उस स्फटिक मणि से उपाधि हटा दी जाय तो जैसा वह स्वच्छ है तेसा ही व्यक्त प्रतिभास में आता है। ऐसे ही जब आत्मा से द्रव्यकर्म का भावकर्म का सम्बंध छूटता है तो वह अपने इस शुद्ध ज्ञानानन्दस्वरूप आत्मतत्त्व को प्राप्त कर लेता है, फिर उसे यह चैतन्यस्वरूप अखण्डस्वरूप अनुभव में आता है।

अचरजभरा बन्धन—देखो भैया! कितनी विचित्र बात है कि यह आत्मा तो आकाशवत् अमूर्त है। इस आत्मा में किसी परद्रव्य का सम्बन्ध ही नही होता, लेकिन कर्मों का बन्धन ऐसा विकट लगा हुआ है ऐसा एक क्षेत्रावगाह है, निमित्तनैमित्तिक रूपतन्त्रता है कि आत्मा एक भव छोड़कर दूसरे भव में भी जाय तो वहाँ भी साथ ये कर्म जाते हैं। यह क्यों हो गया कर्मबन्धन इस अमूर्त आत्मा के साथ? देख तो रहा है, अनुभव में आ तो रहा है यह सब कुछ, यही सीधा प्रबल उत्तर है इसका। मैं ज्ञानमय हूँ इसमें तो कोई संदेह ही नही, जो जाननहार है वह ही मैं हूं। अब कल्पना करो कि जाननहार पदार्थ रूपी तो हो नही सकता। पदार्थ को किस विधि से जाने, कुछ समझ ही नही बन सकती है। पुद्गल अथवा रूपी जानन का काम नही कर सकता है वह तो मूर्तिक है, रूप, रस, गंध, स्पर्श का पिंड है, उसमें जानने की कला नही है, जाननहार यह मैं आत्मा अमूर्त हूं। इसमें ही स्वयं ऐसी विभावशक्ति पड़ी हुई है कि परउपाधि का निमित्त पाये तो यह विभावरूप परिणमने लगता है और विभाव का निमित्त पाये तो कार्माणवर्गणा भी कर्मरूप हो जाती है, ऐसी इसमें निमित्तनैमित्तिक बन्धन है।

मूर्च्‍छा की पद्धति—यह ज्ञान मोह से मूर्छित हो जाता है। कैसे हो जाता है मूर्छित? तो क्या बताए। उसकी तो नजीर ही देख लो। कोई पुरुष मदिरा पी लेता है। तो वह क्यों बेहोश हो जाता है? उसका ज्ञान क्यों मूर्छित हो जाता है? क्या सीसीकी मदिरा ज्ञान के स्वरूप में घुस गयी है? कैसे वह ज्ञान मूर्छित हो गया है, कुछ कल्पना तो करो। यह कल्पना निमित्तनैमित्तिक बंधन है, वहां यह कहा जा सकता है कि उस मदिरा के पीने के निमित्त से ज्ञान मूर्छित नही होता है किन्तु पौद्‌गलिक जो द्रव्येन्द्रियाँ है वे द्रव्येन्द्रियाँ मूर्छित हो गयी है। जैसे डाक्टर लोग चमड़ी पर एक दवा लगा देते हैं जिससे उतनी जगह शून्य कर दे, ऐसे ही मदिरा आदि का पान इन्द्रियों को शून्य कर देने में निमित्त है, वह ज्ञान को बिगाड़ने मे निमित्त नही है। अच्छा न सही ऐसा, वह मदिरा द्रव्येन्द्रिय के बिगाड़ने में ही निमित्त सही, पर द्रव्येन्द्रिय बिगड़ गयी तो वह तो निमित्त है ना ज्ञान के ढकने का, मूर्छित होने का और बिगड़ने का। ऐसे ही सही, पर मदिरापान होने से यह ज्ञान मूर्छित हो गया है। फिर यह मोहनीय कर्म तो बहुत सूक्ष्म और प्रबल शक्ति रखने वाला है। उसके उदय का निमित्त पाकर यह ज्ञान मूर्छित हो जाय तो इसमें कोई आश्‍चर्य नही है । ऐसा निमित्त नैमित्तिक सम्बंध है। मदिरा जैसे बोतल में रक्खी हुई है तो उसे पीने वाले पुरुष के ज्ञान को मूर्छित करने में वह मदिरा निमित्त है, बोतल को मूर्छित कर देने में निमित्त नही है। उस काँच में मूर्छित होने के शक्ति, कला व योग्यता नही है। तो वहाँ भी यह देखा जाता कि जो मूर्छित हो सकता है वह मदिरा के निमित्त से मूर्छित हो सकता है। इसी तरह कर्मों के उदय के निमित्त से मूर्छित हो सकने वाले पदार्थ ही मूर्छित हो सकते हैं। शराब पीने से ज्ञान की मूर्छित हुई दशा में मस्त पुरुष को जैसे हेय और उपादेय का विवेक नही रहता है ठीक इसी तरह जो आत्मा मोह में ग्रस्त है वह अपने स्वरूप से गिर जाता है और नाना प्रकार के विकारी भावो में घिर जाता है, कर्मों से बँध जाता है।

विडम्बनाओं के विनाश का सुगम उपाय—जैसे बहुत बड़ी मशीन के चलाने और रोकने का पेंच एक ही जगह मामूली सा लगा है, कमजोर पुरुष भी दबा और उठा सकते हैं,चला सकते हैं,बन्द कर सकते हैं,ऐसे इतनी बड़ी विडम्बना संसार में हो रही है, जन्म हो, मरण हो, जीवनभर अनेक कल्पनाएँ की, अनेककष्टों का अनुभव किया, इतनी सारी विडम्बनाएँ है किन्तु उन सब विडम्बनावों के विनाश का उपाय केवल एक अपने आपके सहज स्वरूप का अनुभवन है, दर्शन है। इसके प्रताप से भावकर्म भी हटते हैं,द्रव्य कर्म भी हटते हैं,और यह शरीर भी सदा के लिए पृथक हो जाता है। सर्व प्रकार का उद्यम करके अपन सबको करने योग्य काम एक यह ही है कि अपने सहजस्वरूप का अवलोकन करे, दर्शन करे, अनुभवन करे, उसमें ही अपने उपयोग को लीन करके सारे संकटो से छुटकारा पाये।

कर्मबन्धन की अनादिता—यह आत्मा परमार्थतः अपने स्वरूपमात्र है, लेकिन अनादिकाल से यह कर्मबंधन से ग्रस्त है, विषय कषाय के विभावों से मलिन है, इस कारण इन मूर्त कर्मों से वह बंधन को प्राप्त हो रहा है। कब से इस जीव के साथ कर्म लगे है और कब से इस जीव के साथ रागद्वेष लगे है इसका कोई दिन मुकर्रर किया ही नही जा सकता है, क्योंकि रागद्वेष जो आते हैं वे कर्मों के उदय का निमित्त पाकर आते हैं। कर्मों का उदय तब हो जब कर्म सत्ता में हो। कर्म सत्ता में तब हो जब कर्म बँधे, कर्म तब बँधें जब रागद्वेष भाव हो तो अब किसको पहिले कहोगे? इस जीव के साथ पहिले कर्म हैं पीछे रागद्वेष हुए? ऐसा कहोगे क्या? अथवा इस जीव के साथ रागद्वेष तो पहिले थे पीछे कर्म बँधे? ऐसा कहोगे क्या? दोनों में से कुछ भी नही कह सकते।

द्रव्यकर्म व भावकर्म में किसी की आदि मानने में आपत्ति—यदि जीव में रागद्वेष पहिले थे, कर्म पीछे बँधे तो यह बतावो कि वे रागद्वेष जो सबसे पहिले थे वे हुए कैसे? यदि जीव में अपने आप सहज हो गए तो यह जीव कर्मों से छूटने के बाद एक बार वीतराग सर्वज्ञ परमात्मा होने के बाद भी अगर यो ही सहज रागद्वेष आ गए तो ऐसी मुक्ति का क्या करें कि जिसमें किसी प्रकार एक बार संकट से छूट पाये थे और अब संकट से घिर गये, इस कारण यह बात नही है कि जीव में रागद्वेष पहिले थे, कर्मबंध न था, रागद्वेष के कारण फिर कर्म बंधना शुरू हुआ, यह नहीं कहा जा सकता। यदि ऐसा कहेंगे कि जीव के साथ कर्म बंध पहिले था, उसके उदय में ये रागद्वेष हुए है। तो यह बतलावो कि जब जीव में सबसे पहिले कर्म बंध था, तो वह कर्म बंध हो कैसे गया? किस कारण से हुआ या बिना कारण के हुआ। किस कारण से हुआ यह तो कह न सकेंगे इस प्रसंग में क्योंकि सबसे पहिले कर्म बंध जायेंगे तो फिर इससे संसार में रूलना होगा, फिर मुक्ति का स्वरूप ही क्या रहा, इससे न भावकर्म ही सर्वप्रथम हुआ कह सकते और न द्रव्य कर्म को ही सर्वप्रथम हुआ कह सकते।

द्रव्यकर्म व भावकर्म की अनादिता पर दृष्टान्त—द्रव्यकर्म, भावकर्म की अनादिता समझने के लिये एक दृष्टान्त लो—आम के बीज से आम का पेड़ उगता है, आप सब जानते हैं और आम के पेड़ से आम का बीज उत्पन्न होता है। आम के फल के बीज से आम वृक्ष हुआ, आम वृक्ष से आम का फल हुआ तो आप अब यह बतलावो कि वह लगा हुआ फल कहाँ से आया? आम के पेड़ से और वह आम का पेड़ कहाँ से आया? आम के फल से और वह आम का फल कहाँ से आया? आम के वृक्ष से, इस तरह बोलते जावो, कहानी पूरी हो ही नहीं सकती। कोई फल ऐसा नही था जो कभी पेड़ से न हुआ था और कोई पेड़ ऐसा नहीं था जो कभी बीज से न हुआ था। तो जैसे बीज और वृक्ष इन दोनों की परम्परा अनादि से चली आ रही है उसमें किसे पहिले रक्खोगे, ऐसे ही जीव और कर्म का एक सम्बंध कि कर्म से रागद्वेष हुए, रागद्वेष से कर्म बँधे, यह सम्बंध अनादि से चल रहा है। अच्छा बतावो आज जो बेटा है वह किसी पिता से हुआ ना, और वह पिता अपने पिता से हुआ। क्या कोई ऐसा भी पिता किसी समय हुआ होगा जो बिना पिता के आकाश से टपककर आया हो या यह किसी और तरह पिता हुआ हो, बुद्धि में नहीं आता ना। तो जैसे यह संतान अनादि है इसी प्रकार यह जीव और कर्म का सम्बंध भी अनादि है।

द्रव्यकर्म व भावकर्म के अनादि सम्बन्ध होने पर भी विविक्ता—भैया ! जीव और कर्म का बन्धन अनादि फिर भी ये दोनों तत्त्व भिन्न-भिन्न है, और ऐसा उपयोग बन जाय सही तो कर्म जुदा हो सकते हैं और आत्मा केवल विविक्त हो सकता है। जैसे खान में जो सोने की खान है वहाँ स्वर्ण पाषाण निकलता है उसमे वह स्वर्ण किस समय से बना हुआ है? ऐसा तो नही है कि पहिले वहाँ अन्य किस्म का कोरा पत्थर था, पीछे स्वर्ण उसमें जड़ाया गया हो? वह पाषाण तो ऐसा ही स्वर्णपाषाण रहा आया है, उस पाषाण में स्वर्ण का सम्बंध चिरकाल से है, जबसे पाषाण है तब से ही है, लेकिन उसे तपाया जाय या जो प्रक्रिया की जाती है वह की जाय तो वह स्वर्ण उस पाषाण सेअलग हो जाता है। जैसे तिल में तैल बतावो किस दिन से आया है, क्या कोई नियम बना सकते हो कि कबसे आया? वह तो व्यक्तरूप से जब से तिलका दाना शुरू हुआ है, बना है तबसे ही उसमें तैल है। तो जब से तिल है तबसे उस दाने में तैल है। रहे आवो शुरू से दोनों एकमेक, लेकिन कोल्हू में पेले जाने के निमित्त से तिल अलग नजर आता है और तेल अलग नजर आता है, ऐसे ही ये जीव और कर्म दोनों अनादि से बद्ध है लेकिन सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र के प्रताप से यह जीव विविक्त हो जाता है और ये सब कर्म और नोकर्म जुदे हो जाते हैं। जब यह जीव द्रव्यकर्म और भावकर्म दोनों से मुक्त हो जाता है, फिर कभी भी कर्मों से नही बँधता।

परिस्थिति और कर्तव्यशिक्षा—यहां यह बतला रहे हैं कि जब यह कहा गया था कि ये सुख केवल वासना मात्र है, ये हैं नही, परमार्थतः तो स्वभाव ही अपना है। तो फिर यह जीव इस परमार्थ भूत स्वभाव को क्यों नही प्राप्त कर लेता है, इस आशंका के समाधान में यह बताया गया है कि मोह के उदय से यह आत्मा अपने स्वरूप से च्युत हो जाता है, विवेक फिर नही रहता। विवेक न रहने के कारण पदार्थ का स्वरूप यथार्थ परिज्ञान नही हो पाता है। जब अपना अंतस्तत्त्व न जान पाया जो यह बाह्य उपयोगी रहा, बहिरात्मा रहा, वहाँ ये परपदार्थ में यह मेरा है, यह मैं हूँ, ऐसी विधि से कल्पना बनाता रहा। अज्ञान दशा में यह बहिरात्मा दशा जब तक रहती है तब तक यह ज्ञानी अंतस्तत्त्व का ज्ञान नहीं कर पाता, इस कारण मिथ्यात्व त्यागकर ज्ञानी होकर परमात्मपद का साधन करना चाहिए। इससे इस मिथ्या सुख दुःख से परे शुद्ध आनन्द प्रकट हो जायेगा।

 


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