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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:इष्टोपदेश - श्लोक 8

From जैनकोष



वपुर्गृहं धनं दाराः पुत्रा मित्राणि शत्रवः।

सर्वथान्यस्वभावानि मूढः स्वानि प्रपद्यते।।८।।

मूढ़मान्यता—मोह से मूर्छित हुआ यह अज्ञानी प्राणी कैसा बाह्य में भटकता है कि जो-जो पदार्थ सर्वथा अपने से भिन्न स्वभाव वाले हैं उन परपदार्थों को यह मैं हूं इस प्रकार मानता फिरता है। शरीर घर, धन, स्‍त्री, पुत्र मित्र और कहां तक कहा जाय, शत्रु को भी मोही जीव अपना मानता है। कहते हैं कि यह मेरा शत्रु है, उसे अपना माना है।

शरीर क्या—जो शीर्ण हो, जीर्ण हो, गले उसका नाम शरीर है, यह तो संस्कृत का शब्द है, उर्दू में भी शरीर कहते हैं। जिसका प्रतिकूल शब्द है शरीफ। शरीफ का है अर्थ सज्जन,उससे उल्टे शरीर का दुर्जन, बदमाश। तो यह शरीर-शरीर है, दुर्जन है, बदमाश है, इससे कितना ही प्रेम करो, कितना ही खिलावो, कितना ही तेल फुलेल लगावो, कितनी ही सेवा करो, यह जब फल देता हे। तो बदबू पसीना आदि ऐब देता है। ये जितनी मूर्तियाँ दिखती है हम आपको ये सब बड़ी अच्छी देवतासी साफ सुथरी दिख रही है, सिर में तेल लगा है, बड़ा श्रृंगार है, कपड़े भी चमकीले हैं,किसी का चद्दर शृंगार है, किसी का कोट। सजे-धजे देवता से सब बैठे है, पर ये सब भरे पूरे किस चीज से है उसका भी दर्शन कर लो। अपनी ग्लानि अपने को जल्दी मालूम हो सकती है और दूसरे की भी। मोही जीव इस शरीर को अपना मानते हैं।

शरीर सेवा का कारण—जो बुद्धिमान पुरुष होते हैं वे भी इस शरीर की सेवा करते हैं,वे भी स्वस्थ रहने के उपाय बनाते हैं,संयत भोजन करते, संयमित दिनचर्या करते, सब कुछ स्वास्थ्य ठीक रखने का प्रोग्राम रखते हैं लेकिन शरीर की यह सेवा अपना मोह पुष्ट करने के लिए नही करते किन्तु इस शरीर को सेवक समझ कर इस शरीर से कुछ अपने आत्मा की नौकरी लेना है, कुछ आत्मा का हित करना है, केवल इस हितभाव से शरीर की सेवा करते हैं।

शरीर की अस्वता—यह शरीर ममत्व के लायक नही है, यह अपने से अत्यन्त भिन्न स्वभाव वाला है। मैं चेतन हूं, यह शरीर अचेतन है, इसको जो आपा मानता है उसी को तो बहिरात्मा कहते हैं। जो पुरुष इस शरीर को और आत्मा को एक मानता हे वह अज्ञानी है। कितने शरीर पाये इस जीव ने ? अनन्त सबको छोड़कर आना पड़ा। उसी तरह का तो यह शरीर हैं। कितने समय तक रहेगा शरीर? आखिर इसे भी छोड़कर जाना होगा। जिसका इतना मोह कर रहे हैं यह शरीर कुटुम्बियों द्वारा, मित्रजनों द्वारा जला दिया जायगा। इसको क्या अपना मानना? क्या इस शरीर की सेवा करना? अपने अंतर में सावधानी बनाये रहो कि मैं शरीर नही हूँ यह मूढ़ जीव ही इस शरीर को अपना बनाए फिरता है।

मूढ़ का गृह—घर का नाम है गृह । गृह उसे कहते हैं जो ग्रह ले, पकड़ ले या जो ग्रहा जाय पकड़ा जाये। यह मोही जीव जिसको पकड़कर रहेउसका नाम गृह हे। आप जिस घर के हैं कुछ कामवश घर छोडकर १० साल भी बाहर रहे तो भी जब सुध आती है तो आप फिर अपने घर आ जायेंगे उसी का नाम घर है। ऐसे ही गृहिणी है। गृह और गृहिणी ये दोनों जकड़ी जाने वाली चीजें है। प्रयोजनवश कितना भी दूर रह जायें पर गृह और गृहिणी येदोनों नही छूटते हैं। किन्तु विरक्त ज्ञानी हो तो ये छूटते हैं,इस जीव का ज्ञानानन्दस्वरूप है, किन्तु मोही जीव विकट जकड़ा हुआ है इस गृह से। इस गृह को मूर्ख जीव मानते हैं कि यह मेरा है। घर तो इस आत्मा के साथ एक क्षेत्रावगाही भी नही है घर तो प्रकट अचेतन घर को भी यह मोही जीव अपना मानता है। कभी यह जिज्ञासा हो सकती है तो फिर क्या करे। क्या घर छोड़ दे। अरे भैया! छोड़ो अथवा न छोड़ो—छोड़ दो तो भी कुछ संकट नही है और न छोड़ सको कुछ काल तो भी कुछ मिथ्यात्व नही आ गया है, लेकिन सत्य बात जो है उसका प्रकाश तो रहना चाहिए। यह घर मेरा कुछ नही है।

धन—धन की भी निराली बात है। धन में परिजन को छोड़कर सब कुछ आ गये। सोना चाँदी, रूपया पैसा, गाय-भैस सभी चीजें आ गयी। ये सब भी प्रकट जुदे है। लेकिन कल्पना में ऐसे बसे हुए है कि ज्ञानप्रकाश के लिए भी कुछ ख्याल नही आता । छोड़ने की बात तो दूर रहो, पर किसी समय कुछ हिचकता भी नही धन की कल्पना करने मे, इस धन से भिन्न अपने को यह मोही नही मान पाता है।

स्‍त्री—यह भी एक भिन्न जीव है, सबके अपने-अपने कर्म है सबके अपने-अपने कषाय है। कषाय से कषाय मिल रही है इस कारण परस्पर में प्रेम है। जिस घर को पुरुष आबाद रखना चाहता है उस ही घर को स्‍त्री भी आबाद रखना चाहती है, एक सी कषाय मिल गयी और उसके प्रसंग में प्रत्येक बात में भी प्रायः एक सी कषाय मिल गयी है। जब दोनों उद्देश्य एक हो जाते हैं तो कषाय अनुकूल हो ही जाती है। किसी एक काम को मिलजुलकर करने की धुन बन जाय 5आदमियों की भी तो उन पाँचों की इच्छा कषाय एक सी अनुकूल हो जायगी और फिर उस अनुकूलता में एक दूसरे के लिए श्रम करते रहेंगे।

दारा, भार्या, कलत्र—यहाँ स्‍त्री को दारा शब्द से कहा गया है। हिंदी में लोग दारी-दारी कहा करते हैं। गाली के रूप में यह शब्द बोला जाता है। यह रिवाज यहाँ चाहे न हो पर देहातों में अधिक है। दारा का अर्थ है दारयति भ्रातृन् इति दारा, जो भाई-भाई को लड़ाकर जुदा कर दे। स्‍त्री का नाम दारा भी है। उस शब्द में ही यह अर्थ भरा है। यद्यपि यह रिवाज हो गया है कि बड़े हो गए तो अब जुदे-जुदे होना चाहिए, मगर बड़े हो जाने से जुदा कोई नही होता। विवाह होने से स्‍त्री होने से फिर जुदेपन की बात मन में आती है तो उस जुदेपन के होने का कारण स्‍त्री है ना इसलिए उसका नाम दारा रक्खा गया है। स्‍त्री का भार्या भी नाम है। जो अपनी जिम्मेदारी समझकर घर को निभाये उसे भार्या कहते हैं। कलत्र भी कहते हैं। कल कहते हैं शरीर को और त्र मायने है रक्षा करने वाला। पति के शरीर की रक्षा करे, पुत्र के शरीर की रक्षा करे और खाना देकर सभी के शरीर की रक्षा करती है इसलिए उसका नाम कलत्र है, इसे यह मूढ़ जीव अपना मानता है।

स्‍त्री की पति से विविक्ता—स्‍त्रीजन पुरुषों के विषय में सोच लों कि वे पति को अपना समझती है व्यवहार में चूँकि एक उद्देश्य बना है और कषायें मिल रही है इस कारण मिल जुलकर रहा करती है तिस पर भी ऐसा नही है कि पुरुष की इच्छा से स्‍त्री काम करती हो, स्‍त्री की इच्छा से पुरुष काम करता हो, यह त्रिकाल हो ही नही सकता है। सब अपनी-अपनी इच्छा से अपना-अपना काम करते हैं। मिलजुल गयी इच्छा और कषाय, पर प्रेरणा सबको अपनी-अपनी इच्छा की ही मिली हुई है, ये मोही जीव ऐसे परजनों को अपना मानते हैं।

पुत्र—व्यामोही पुरुष को अपना मानते हैं। पुत्र किसे कहते है? जो कुल को बढ़ाये पवित्र करे। इस आत्मा का वंश है चैतन्यस्वरूप। इस चैतन्यस्वरूप को पवित्र करने वाला, वृद्धिगत करने वाला तो यह ज्ञानपरिणत स्वयं का आत्मा हे इसलिए यह मेरा तत्त्व ज्ञान ही वस्तुतः मेरा पुत्र है जो चैतन्य कुल को पवित्र करे। यहाँ कौन सा कुल अपना है? आज इस घर में पैदा हुए है तो इस घर के उत्तरोत्तर अधिकारी बनते जायें ऐसा कुल मान लेते हैं पर यहाँ के मरे कहाँ पहुँचे ३४३ घनराजू प्रमाण लोक में न जाने कहाँ-कहाँ जन्म हो जाय, क्या रहा फिर यहाँ का समागम? सब मोह की बातें है। पुत्र का दूसरा नाम है सुत। सुत उसे कहते हैं जो उत्पन्न हो, इसी से सूतक शब्द बना है। कही ऐसी प्रथा है कि जन्म के १० दिनों को सौर कहते हैं और मरे के १२ दिनों को सूतक के दिन कहते हैं,मगर सूतक नाम उत्पन्न होने का है, जन्म में कहते हैं सूतक और मरने में कहते पातक। किसी के यहाँ बच्चा पैदा हुआ हो और जाकर कह दो कि अभी इनके यहाँ सूतक है तो वह बुरा मान जाता है, वह सोचेगा कि हमारे घर में किसी का मरना सोचते हैं क्योंकि मरे पर सूतक कहने का रिवाज हो गया है। पर ऐसा नही मरे को पातक और पैदा होने को सूतक कहते हैं। चाहे कुपूत हो, चाहे सुपूत हो सब सुत कहलाते हैं।

लौकिक मित्र—संसार के दोस्तों की बात देख लो—एक कहावत है कि आप डूबते पांड़े तो डूबैं जजमान। गिरते हुए को एक धक्का लगा देते हैं ऐसी परिभाषा है दोस्तों की। कोई यह घटाते हैं कि जो दोस्त होते हैं वे अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दोस्त होते हैं,ठीक है, यह भी अर्थ है पर अध्यात्म में यह अर्थ लेना कि जो जिगरी मित्र है, हार्दिक मित्र है, निष्कपट है, संसार की दृष्टि में वह बिल्कुल स्वच्छ हृदय का है तो भी सिवाय मोहगर्त में गिराने के और करेगा क्या वह? मित्र लोग विषयों के साधन जुटाने के लिए, संसार के गड्ढों में गिराने के लिए, संसार के संकटो में भटकाने के लिए होते हैं।परमार्थ से तो अपने मित्र है देव शास्‍त्र और गुरु। देव, शास्‍त्र, गुरु के सिवाय दुनिया में कुछ मित्र नही है। जैसे मित्र जन प्रसन्न हो गए तो क्या करा देंगे? ज्यादा से ज्यादा दुकान करा देंगे, विवाह करा देंगे, तृष्णा की बातें लगा देंगे। चाहिए तो वही पाव डेढ़ पाव अन्न और दो मोटे कपड़े और तृष्णा ऐसी बढ़ जायगी कि जिसका अंत ही नही आता। कितने ही मकान बन जाये, कितना ही धन जुड़ जाय, कितने ही धन आने के जरिये ठीक हो जाये तिस पर भी तृष्णा का अंत नही आता। कभी यह नही ख्याल आता कि जो भी मिला है वही आवश्यकता से अधिक है। तो मोह में मित्र जन क्या करेंगे; तृष्णा बढ़ाने का काम करते हैं और संसार के गड्ढे में गिराते हैं। यह मूढ जीव मित्र को भी अपना मानता है।

शत्रु—यह व्यामोही शत्रु को भी अपना मानता है। देखिये विचित्रता कि यह अज्ञानी प्राणी शत्रु का ध्वंस करना चाहता है। शत्रु इसके लिये अनिष्ट बन रहा है, किन्तु मिथ्यात्व भाव की परिणति कैसी है कि शत्रु के प्रति भी यह मेरा शत्रु है, इस प्रकार अपनत्व को जोड़ता है। शत्रु को मिटाने के लिये अपनत्व को जोड़ रहा है। हद हो गई मिथ्यात्व की यह मोही जीव मोह की बेहोशी में यह मेरा शत्रु है ऐसा मानता है।

मोह में भूल—भैया ! मोह के उदय में यही होता है। अपने स्वरूप को भूलकर अपने भले बुरे का कुछ भी विवेक न रखकर बाहरी पदार्थों मे अपनी तलाश करते हैं,मैं कौन हूं, मेरा क्या स्वरूप है, मुझे क्या करना चाहिए? जिन समागमों में पड़े हुए हो उन समागमों से, परपदार्थों से तुम्हारा कुछ सम्बंध भी है क्या? किसी की भी चिंता नही करता है। ये सभी पदार्थ मेरी आत्मा से भिन्न है। इन पदार्थों में से किस पदार्थ में झुककर शांति हासिल कर ली तो बतावो? पर के झुकाव में शान्ति हो ही नही सकती, क्योंकि परकी और झुकाव होना यह साक्षात् अशान्ति का कारण है। ये सर्व भिन्न स्वभाव वाले हैं फिर इन्हें मैं क्यों अपना मान रहा हूं ऐसी चित्त में ठेस इस जीव के मोह में हो नही पाती है। क्योंकि इसने अपने इस शरीर पर्याय को ही आपा मान लिया है। जब मूल में ही भूल हो गयी तो अब जितना भी यह अपने गुजारे का विस्तार बनायेगा वह सब उल्टा ही विस्तार बनेगा।

भूल पर भूल—देह को ही जीव आत्मा समझते हैं,उनके उपयोग का जितना विस्तार बढ़ेगा वह सब कुमार्ग का विस्तार बढ़ेगा। घर मे रसोई में चावल शाक आदि बनाने की जो भगोनी है, पतेली है वे किसी कोने मे दस पाँच इकट्ठी लगानी है तो चूँकि जगह कम घिरे इसलिए एक के ऊपर एक क्रम से लगाते हैं। तो नीचे की पतेली यदि औंधी कर दी है तो ऊपर जितनी भी पतेली रखी जावेंगी वे सब औंधी ही रखी जा सकेगी, सीधी नही, और नीचे की पतेली यदि सीधी रखी है तो ऊपर की सभी पतेली सीधी ही रखी जा सकेगी, औंधी नही। यो ही प्रारम्भ में उपयोग यदि सही है तो विकार विस्तार भी सही रहेगा और मूल मे ही यदि भूल कर दी तो अब जितने भी विकार होगे, श्रम होगे वे सब उल्टे ही उल्टे हो जायेंगे। यह मूढ़ जीव पर्याय व्यामोह के वश हुआ इन समस्त पदार्थों को अपना मानता है। ये सब विडम्बनाएँ इस निज आत्मास्वरूप को न जानने के कारण है।

 


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