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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 207

From जैनकोष



जं इंदिएहिं गिज्झं रूवं-रस-गंध-फास-परिणामं ।

तं चिय पुग्गल-दव्वं अणंत-गुणं जीव-रासीदो ।।207।।

पुद्गलद्रव्य का स्वरूप―जो रूप, रस, गंध और स्पर्श परिणाम युक्त होने के कारण इन इंद्रियों के द्वारा ग्रहण में आते हैं वे सब पुद्गलद्रव्य हैं । इस गाथा में पुद्गलद्रव्य का स्वरूप कहा गया है । यहाँ स्पष्टतया यह बताया है कि जहाँ रूप, रस, गंध, स्पर्श का परिणाम होता है वे सब पुद्गलद्रव्य कहलाते हैं । तो जिनमें रूप, रस, गंध, स्पर्श पाये जाये उनको पुद्गल द्रव्य कहते हैं, ऐसे पुद्गलद्रव्य की संख्या जीवराशि से अनंतगुनी है । अनंतगुनी क्यों है? तो उसका स्पष्ट प्रमाण तो यह है कि एक जीव ने जो शरीर ग्रहण किया है उस शरीर में अनंत परमाणु हैं और जीव में जो कर्म बँधे हुए हैं उनमें शरीर से भी अनंतगुणे परमाणु हैं । तब एक जीव के ही जुम्मे जो संसार में बस रहे हैं अनंतानंत पड़े हुए हैं और ऐसे संसारी जीव हैं अनंतानंत । तो पुद्गल द्रव्य इस जीव की संख्या से भी अनंतगुने हो गए । पुद्गल द्रव्य इन इंद्रिय के द्वारा ग्रहण में आते हैं क्योंकि पुद्गल पर्याय रूप, रस, गंध, स्पर्श में परिणत हुई है । वह कितनी ही प्रकारों की है ।

पुद्गलद्रव्य के गुणों की पर्यायें―सिद्धांत ग्रंथों में बताया गया है कि स्पर्श 8 प्रकार के हैं―शीत, उष्ण, स्निग्ध, सूक्ष्म, कोमल, कठोर, भारी और हल्का । ये स्पर्शन इंद्रिय के द्वारा जाने जाते हैं, स्पर्श किए जाते हैं, इस कारण ये स्पर्श हैं और ये सब स्पर्शन इंद्रिय के विषयभूत हैं । रस 5 प्रकार के हैं―तीखा, कडुवा, कषायला, खट्टा, मीठा ये 5 प्रकार के रस रसनाइंद्रिय के द्वारा निरखे जाते हैं । ये रसना इंद्रिय के विषयभूत हैं । गंध दो प्रकार के हैं―सुगंध और दुर्गंध । ये घ्राणइंद्रिय के विषयभूत हैं । वर्ण 5 तरह के हैं―सफेद, पीला, नीला, लाल और काला । ये वर्ण चक्षुइंद्रिय के द्वारा निरखे जाते हैं, इस कारण चक्षुइंद्रिय के विषयभूत हैं । जो शब्द है वें सब कर्णेंद्रिय के विषयभूत हैं । ये सभी के सभी विषय पुद्गल द्रव्य कितने हैं? तो सर्व जीव राशि

से अनंतानंत गुने हैं । बताया गया है सिद्धांत ग्रंथों में कि जीव के द्वारा ग्रहण किए हुए पुद्गल अनंत हैं और जीवत्यक्त भी पुद्गल अनंत हैं, इस प्रकार ये अनंतानंत सभी पुद्गल द्रव्य जीव से पृथक् हैं । ये अचेतन हैं, जीव चेतन हैं, इनसे निराला जो अपने आपको ज्ञानमात्र अनुभव करता वह जव अंतरात्मा होता है और इस अंतरात्मत्व के उपाय से अपने उस परम स्वरूप की प्राप्ति कर लेता है।


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  • कार्तिकेय अनुप्रेक्षा
  • प्रवचन
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