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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 208

From जैनकोष



जीवस्स बहु-पयारं उवयारं कुणदि पुग्गलं दव्वं ।

देहं च इंदियाणि य वाणी उस्सास-णिस्सासं ।।208।।

जीव के पुद्गलद्रव्यकृत उपकार का वर्णन―लोक भावना में समस्त द्रव्यों का वर्णन किया गया है । जब पदार्थ का यथार्थस्वरूप चित्त में आता है तो उस समय मोह रागद्वेष न होने से अथवा रागादिक मंद हो जाने से आत्मा को एक अपूर्ण शांति मिलती है । यह लोक कितना बड़ा है, उसके सामने आज के परिचय का क्षेत्र कितना है? यहाँ राग मोह करके इस जीव को क्या लाभ मिलेगा? छोड़ने की चीज है यह । इसी प्रकार इस लोक में क्या-क्या रचनायें हैं, कहां-कहां कैसे-कैसे जीव रहते हैं? अज्ञान के वश होकर कैसे-कैसे शरीरों को ग्रहण करना पड़ता है, जन्म मरण है, ये सब बातें यथार्थ ध्यान में आने से जीव की अशांति समाप्त हो जाती है । इस प्रकरण में पुद्गल द्रव्य का वर्णन चल रहा है । जीवतत्त्व का वर्णन करने के बाद पुद्गलद्रव्य का वर्णन इस कारण किया जा रहा है, जीव का पुद्गल के साथ कुछ निकट संबंध है, और दिख भी रहा है जीव शरीर में बद्ध है । कर्मों का बंधन होता है और यह जीव संबान व असंबद्ध उस पुद्गल द्रव्य से कितना अपने में विकल्प से काम लेना चाहता है और पुद्गल इस प्रसंग में जीव का क्या-क्या उपकार करता है वह इस गाथा में बताया है । यहाँ उपकार का अर्थ भलाई से नहीं है किंतु कुछ काम करने से है । चाहे जीव वहाँ सुख माने या दुःख । जोव के किसी भी प्रकार के परिणमन में ये पुद्गल, कर्म, अजीव कुछ भी निमित्त होते हों तो वह पुद्गल द्रव्य का उपकार कहा जाता है । यह पुद्गल द्रव्य जीव का बहुत प्रकार से उपकार करता है ।

शरीर, इंद्रिय, वाणी श्वासोच्छ्वास, सुख और दु:ख की पौद्गलिकता―शरीर इंद्रियवाणी और श्वासोच्छ्वास इनके होने में निमित्त पुद्गल ही तो है अथवा यह पुद्गलस्वरूप ही तो है । और, इसका जीवों से संबंध है इस कारण इसे जीव के प्रति पुद्गल का उपकार कहा गया है । सुख होना, जन्ममरण होना यह पुद्गल द्रव्य का उपकार है, क्योंकि सुख दुःख पुद्गल द्रव्य के संबंध बिना, उनका आश्रय किए बिना, कर्म का उदय आये बिना नहीं होता । यद्यपि सुख और दुःख जीव का स्वरूप नहीं है । जीव एक प्रतिभासात्मक पदार्थ है, जो आँखों से दिखता नहीं, कानों से सुना जाता नहीं, किसी भी इंद्रिय द्वारा ग्रहण में नहीं आता, अमूर्त पदार्थ है और चैतन्य को लिए हुए है, संसार के समस्त पदार्थों में एक विलक्षण पदार्थ है, जो सर्व कुछ जान लेता है । भला मैं सत्रूप तो हूँ, मेरी सत्ता है, मैं हूँ और जाननहार हूँ । मैं कैसा हूँ और किस तरह जार लेता हूँ इसका चाहे हम विश्लेषण न कर सकें, मगर अनुभव में तो आता है कि मैं हूँ कोई और जानने वाला हूँ । यदि ऐसा जानने का स्वभाव जिसका है उसके सम्यक्स्वरूप को सोचा जाये तो उस रागद्वेष मोह सुख दुःख तरंग ये भी स्वभावत: नहीं पाये जाते, किंतु हैं जीव के ही परिणमन । इनमें निमित्त तो कर्मों का उदय है और आश्रयभूत पदार्थ हैं ये बाहरी विषयभूत पदार्थ । तो इस पुद्गलद्रव्य के आश्रय और निमित्त से ये सुख दुःख आदिक हुए है, इस कारण इन्हें पुद्गल द्रव्य का उपकार कहते हैं । उपकार के मायने हैं कार्य । पुद्गल द्रव्य के निमित्त से यह कार्य बना और चूंकि इसका जीव से संबंध है अतएव ये जीव के प्रति उपकार कहलाते हैं ।

जन्म और मरण की पुद्गलकृत उपकाररूपता―जीवन भी पुद्गल द्रव्य का उपकार है और मरण भो पुद्गल का उपकार है, अर्थात् पुदगल द्रव्य के काम हैं । आयु का उदय हुआ जीवन बन गया, आयु का क्षय हुआ मरण बन गया, यह कर्मों के निमित्त से हुआ, इस कारण से ये पुद्गल के उपकार कहलाते हैं, उपकार का अर्थ भलाई नहीं । और भलाई की बात सोचो तो यह जीव अपनी भलाई इसमें मानता है कि मैं पैदा हो गया और खुशी मानता है, और मरण में भी चाहे कोई भलाई न माने पर इस जीव की भलाई जीवन की अपेक्षा मरण से अधिक होती है । यद्यपि संसारी जीवों को मरण के बाद जन्म लेना ही पड़ेगा, मगर कोई मरण ऐसा भी होता है कि जिसके बाद जन्म नहीं होता । ऐसे मरण को कहते हैं पंडितपंडितमरण अथवा निर्वाण ।

अरहंत भगवान के आयु का क्षय होता है तो आयुक्षय का ही तो नाम मरण है । उनका आयुक्षय होने पर मरण नाम नहीं लेते क्योंकि ऐसी रूढ़ि है कि जिसके बाद जन्म हो उसको मरण कहा करते हैं । भगवान को कैसे कह दिया जाय कि लो अब अरहंत भगवान का मरण हो गया, पर है तो आयु का क्षय ही, उसका नाम मरण कहा जायगा । लेकिन इसके बाद जन्म नहीं है, और उनका निर्वाण है इस कारण मरण शब्द से नहीं कहा करते और कहेंगे तो पंडितपंडितमरण कहेंगे अथवा निर्वाण कहेंगे । जो कोई ज्ञानी पुरुष मरण के समय में समाधिभाव रखते हैं, समतापरिणाम रखते हैं उनका भी भला होता है, एक दृष्टि से देखा जाय तो मरण बहुत ही अच्छा उपकार है ।

पुद्गल द्वारा देहादि का निष्पादन और इनके विवेक में जीव का उपकार―देह बनता है, औदारिक आदिक शरीर बनते हैं, इंद्रियाँ होती है, रसना, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र इन सबका जो निष्पादन है वह सब पुद्गल का उपकार है । वाणी होती है भाषात्मक, अभाषात्मक आदिक, अक्षररूप, अनक्षर रूप, वह सब पुद्गलद्रव्य का उपकार है । श्वासोच्छ्वास लेना यह भी जीव का उपकार है, पुद्गल द्रव्य के द्वारा किया गया है । यों जीव और पुद्गल का ऐसा परस्पर कार्य कारण भाव है, एक दूसरे से काम होता रहता है, किंतु विवेकी पुरुष जिनको भेदविज्ञान प्रकट हुआ है वे सर्वत्र यह देख रहे हैं कि प्रत्येक सत् अपने आपके स्वरूप में रहते हुए ही परिणमन करते हैं । देखिये जीव अगर अपने एकत्वस्वरूप का चिंतन करे तो उसे कहीं भी दुःख नहीं है । यह जीव तो व्यर्थ का मोह करके, अपनी ही इस मिथ्या करतूत से दुःखी हो जाता है । तब इस जीव का अपने आपके स्वरूप के सिवाय कुछ है ही नहीं, तत्त्वत: विचार कीजिए । वास्तविकता यह है कि जीव का जीव स्वरूप के सिवाय कुछ भी नहीं है । तब अत्यंत भिन्न पदार्थों में राग होना, अपनायत होना यह सब व्यर्थ का मोह करना, अर्थात् कायदे में तो मोह न होना चाहिए क्योंकि मोह के विषयभूत ये भिन्न पदार्थ हैं, सभी अपने-अपने स्वरूप में रह रहे हैं । ये अचेतन पदार्थ किसी भी चेतन में कुछ अपना व्यापार नहीं करते, लेकिन यह जीव चूँकि उपयोगवान है, बाह्य पदार्थों में उपयोग लगाये रहता है, न लगाये पर में उपयोग और स्वरूप यथार्थ जाने तो इसको कहीं भी कष्ट

नहीं है । इस मोही जीव ने विकल्प करके अपने कष्ट बनाया है । लोक में मेरी इज्जत रहे, मेरी शान बनी रहे, ऐसी चाह इस जीव को पीड़ित करती है । जिनमें राग है, जिनसे प्रीति है उनसे प्रीति भरे वचन सुनना चाहते हैं । अपने आपका उत्पात पर में यदि होता है तो इस उत्पात का फल तो कष्ट ही है । यदि उत्पात न करे यह जीव, समता से शांति से जैसा है वैसा अपना विचार करे, पर का विचार करे, ज्ञाताद्रष्टा रहे तो इसको कहीं कष्ट नहीं है । ज्ञानी पुरुष को इसीलिए निराकुल कहा गया है । भले ही किसी स्थिति में कर्मप्रेरणा से इसको कुछ आपत्तियां आयें, लेकिन यह अंत: तृप्त रहता है, भीतर में व्याकुल नहीं होता है । सो जीव का स्वरूप यद्यपि सुख दुःख का नहीं है लेकिन अनादि बंधन होने के कारण कर्मोदय में यह जीव अपने को सुखी दुःखी अनुभव करता है । है यह सब पुद्गल के संबंध से, इस कारण जीव के इस तरह के परिणमन भी पुद्गल द्रव्य के उपकार कहे जाते हैं ।

गाथा― 209

अण्णं पि एवमाई उवयारं कुणदि जाव संसारं ।

मोह-अणाण-मयं पि य परिणामं कुणदि जीवस्स ।।209।।

संसारपर्यंत पुद्गलकृत उपकार―इसी प्रकार जब तक संसार है तब तक अन्य भी उपकार पुद्गल के द्वारा किए जाते हैं । उपकार के मायने यहाँ मौज की बात नहीं, नहीं तो यह अर्थ हो जायगा कि देखो संसार में जीव का उपकार करने के लिए पुद्गल भी तुले हो जाते हैं । उपकार किसका है? पुदगल के संबंध में जो कुछ जीव का हो रहा है वह तो अपकार है, लेकिन यहाँ उपकार का अर्थ काम मात्र है, कार्य हो रहा है । जैसे शरीर मिलना, वचन होना, मन होना, श्वासोच्छ्वास होना यह पुद्गल का उपकार है । सुख दुःख जीवन मरण होना यह पुद्गल का उपकार है, इन सबकी रचना के कारणभूत तो नियम से पुद्गल ही हैं । कर्म के उदय में ये सब रचनायें होती है ।

कर्मों की पौद्गलिकता की सिद्धि―यहां कोई शंका कर सकता है कि कर्म दिखते तो नहीं हैं । ये कहीं व्यवहार में, छूने में आते नहीं हैं, तो ये कर्म पौद्गलिक न होना चाहिए । इन कर्मों का कोई आकार ही नहीं है । जैसे शरीर का आकार है तो शरीर को पौद्गलिक कह लो और दिखने वाले जो ये जीव व्यक्तकाय हैं चौकी आदिक इनका भी आकार है, इन्हें भी पौद्गलिक कह लो, पर कर्म तो निराकार हैं, उन्हें पौद्गलिक क्यों कहा गया ? इसके समाधान में यह अनुमान प्रयोग कर लेना चाहिए कि कर्म भी पौद्गलिक हैं, क्योंकि मूर्तद्रव्य के संबंध से इनका विपाक होता है । एक हेतु दिया गया है कि जिसका विपाक, जिसका पकना पुद्गलद्रव्य के संबंध से हो वह पौद्गलिक कहलाता है । जैसे धान्य का विपाक । धान्य का पकना मट्टी पान आदिक पुदगल के संबंध से होता है, इस कारण धान्य को पौद्गलिक कहा गया है, यों देखा ही जाता है । तो इसी तरह इन कर्मों में भी यह इतना निर्णय रखना चाहिए कि कर्मों का विपाक सुख दुःख आदि जब स्वादिष्ट भोजन आदिक द्वारा होता है तो ये कर्म पौद्गलिक हैं ।

कर्मबंधन का स्वरूप―ये कर्मपरिणमन कहलाते क्या हैं ? तो इसको दो दृष्टियों से निरखा जाता है―भावदृष्टि से और द्रव्यदृष्टि से याने भाव बंधन और द्रव्य बंधन । भावबंधन के नाते तो बंधन कहलाते हैं सुख दुःख रागद्वेषादिक सारे विकार । इनके भावों का उठाना यही कहलाता है भावबंध । जीव में विभावों से परतंत्रता आयी हुई है और जीव अपने किसी स्वभावरूप ही है, वहाँ विभावों का बंधन बन गया है । केवल सुख दुःख के अनुभव का ही नाम बंधन नहीं । वह भी बंधन है और रागद्वेष आदिक किसी भी प्रकार के विकार उत्पन्न हों उसे भी बंधन कहते हैं । तो भावदृष्टि से तो रागद्वेष सुख दुख के बंधन का नाम बंधन है और द्रव्यदृष्टि से अथवा द्रव्यबंधन की निगाह से जीव के प्रदेश में पौद्गलिक कर्म का बंधन होने का नाम कर्मबंधन है । दोनों ही इसके समाधान हैं । बंध दो प्रकार का बताया गया है―भावबंध और द्रव्यबंध, द्रव्यबंध है या नहीं, इसकी जानकारी के लिए यह समझना चाहिए कि कोई भी पदार्थ स्वयं अपने में अकेला होता है, तो वह न तो अशुद्ध होता है और न उसमें परतंत्रता आती है । एक यह नियम है । अकेले में परतंत्रता क्या और विकार क्या ? कोई भी पदार्थ केवल अकेला ही हो, उसमें किसी भी दूसरे पदार्थ का संबंध न हो तो वहाँ न विकार आयगा और न परतंत्रता आयगी । खूब भली प्रकार सर्वत्र निहार लो । एक मोटी बात समझ लो कि जैसे कोई एक पुरुष है, साधु मुनि है वह अपने को अकेला अनुभव करके अकेले का उपयोग रखता है तो उसको बहुत से बंधन नहीं हैं और विकार भी नहीं हैं । यह एक स्थूल दृष्टांत कह रहे हैं तो कोई भी पदार्थ खाली अकेला हो, उसके साथ किसी दूसरे का बंधन न हो, संबंध न हो तो वहाँ विकार भी न बनेगा और परतंत्रता भी न बनेगी, लेकिन यहां हम अपने-आपमें तक रहे हैं कि परतंत्रता भी है और विकार भी जगते हैं तो इससे सिद्ध है कि हम में किसी दूसरे पदार्थ का संबंध है ।

कर्मों की विजातीयता व सूक्ष्मता―इस प्रसंग तक इतना तो निश्चित हो ही गया है कि मुझमें दूसरे पदार्थ का संबंध है । अब इसके आगे बात और देखिये कि अपने से विजातीय, अपने से विपरीत स्वरूप वाला कोई पदार्थ संबंध में हो तो विकार जगता है । मैं हूँ चैतन्य ज्ञानस्वरूप और मुझमें जो विपरिणमन हो रहा है, विकार जग रहा है तो समझना चाहिए कि मुझसे विपरीत चीज कोई मेरे साथ लगी है । जैसे मैं चेतन हूँ ऐसे ही चैतन्यमात्र दूसरे सत् मुझसे चिपका हो तो वहाँ न बंधन बनेगा, न विकार अर्थात् किसी भी चैतन्य पदार्थ के संबंध से विकार नहीं जगता, किंतु कोई अचेतन पदार्थ ही बंधन में है तब विकार जग रहा है । यहाँ तक दो बातें सिद्ध हो गईं । जीव के साथ किसी दूसरे पदार्थ का बंधन है तभी इसमें विकार है और पारतंत्र्य है, और वह बंधन भी है विजातीय पदार्थ का, तो मैं चेतन हूँ तो दूसरा जो कुछ-बँधा है वह अचेतन है । अब तीसरी बात सोचिये―जीव है एक अमूर्त पदार्थ । इस अमूर्त पदार्थ के साथ किसी मूर्तिक का बंधन कहां? एक यह प्रश्न हो सकता है । उत्तर तो यह है कि अनुभव ही बता रहा है कि बंधन है तब वहाँ इसका यों निर्णय करना होगा कि वह मूर्तिक पदार्थ भी अतीव सूक्ष्म पदार्थ है और इसी कारण कर्म से अधिक सूक्ष्म परमाणु को माना है और किसी को नहीं माना है । जहाँ पुद्गल स्कंध के 6 भेद किए गए हैं वहाँ सूक्ष्म-सूक्ष्म तो पुद्गल परमाणु कहे गए हैं और सूक्ष्म कर्म कहे गए हैं, तो इससे सूक्ष्म और कुछ नहीं होता । ऐसे सूक्ष्म पुद्गल स्कंधों का अजीव पदार्थों का उसके साथ बंधन है । अब जिन कर्मों का बंधन है वे कर्म जीव के साथ एकक्षेत्रावगाहरूप से पड़े हुए हैं ।

मरण के पश्चात् भी जन्म के लिये गये जीव के साथ कर्मों का गमन―जब यह जीव एक भव को छोड़कर दूसरे भव में जाता है तो यह स्थूल शरीर यहीं रह जाता है, जिसे लोग जला देते हैं, पर जीव के साथ वे कर्म पुद्गल बंध साथ नहीं छोड़ते । वे साथ ही जाते हैं और अगले भव के शरीर निष्पन्न होने के वे कारण बनते हैं, इसी कारण अनेक दार्शनिकों ने दो प्रकार के शरीर माने हैं―स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर । जैन सिद्धांत के अनुसार ये जो औदारिक आदिक शरीर हैं ये हैं स्थूल शरीर और जो कर्म एवं तैजस शरीर है वह है सूक्ष्मशरीर । जैसे परमागम में बताया है कि तैजस और कार्माण शरीर अनादि काल से जीव के साथ संबंध लिए हुए हैं और वे प्रतिघातरहित हैं । जीव मरण करके जब दूसरे भव में जाता है तो रास्ते में पहाड़ भी होते हैं वज्र भी पड़े हों तो उनसे भी यह जीव छिड़ता नहीं है और जीव के साथ बँधे हुए कर्म भी छिड़ते नहीं हैं । सो कर्म को अप्रतिघात बताया है, और अनादिकाल से इनका संबंध है । अनादिकाल से लेकर अब तक भी यह संबंध दूर नहीं हो सका । जिस समय कर्म का बंध थोड़ी देर को हट गया हो तो फिर सदा के लिए यह कर्मबंध दूर हो जायेगा । अर्थात् जिनका निर्वाण होता है उनको यह अवस्था प्राप्त होती है कि कर्म की बंध परंपरा वहाँ खतम होती है । तो इस जीव के साथ कोई दूसरी चीज लगी है वह दूसरी चीज जीव से विपरीत स्वभाव वाली है और वह है सूक्ष्म, और उसका है जीव में एकक्षेत्रावगाह बंधन । जीव जब मरण करता है तब उसके साथ ये कर्म जाते हैं और ये कर्म औदारिक आदिक शरीर की निष्पत्ति में कारण पड़ते हैं । तो कर्मों के उदय का निमित्त पाकर ये सब कार्य होते हैं, इस कारण इन सबको पुद्गल का उपकार कहा गया है । इन कार्यों में जीव चाहे मौज माने या कष्ट माने, पर यह पुद्गल का विकार है । पुद्गल के संबंध बिना ये कार्य नहीं हो सकते, इस कारण इन्हें पुद्गल का उपकार कहा गया है । यहाँ जो विवेक करेगा वह आकुलता न पायेगा और जो इनमें अविवेक से लगेगा वह अशांत होगा । इस कारण हमारा कर्तव्य है कि हम भेदविज्ञान करें और अपने अंतःस्वरूप के अनुभव से तृप्त रहा करें ।

भाववचन व द्रव्यवचन की पौद्गलिकता―अब यहाँ बताया जा रहा है कि दुनिया में अपने को जितने व्यवहार के प्रसंग मिल रहे हैं वे सब इस पुद्गल के उपकार हैं अर्थात् पुद्गल के कार्य हैं । अज्ञानी जन यह समझते हैं कि मैं बोलता हूँ, मैं अमुक काम करता हूँ, श्वास लेता हूँ, ऐसी इन पुद्गल की बातों को अपनी करतूत मानते हैं लेकिन इनमें अपनी करतूत नहीं है । ये सब पुद्गल की करतूत हैं । पुद्गल मिल गए, उनकी जैसी योग्यता है उस प्रकार उनकी वृत्ति बन जाती है । हाँ इतनी बात अवश्य है कि जीव का संबंध है तब ये वचन बोले जाते हैं । श्वासोच्छ्वास चलती है, दैहि की क्रिया होती है । वचन एक भाषावर्गणा जाति के पुद्गल का परिणमन है, जैसे जीभ हिलाया तो इसके हिलने से यहीं भरे पड़े हुए जो भाषावर्गणा जाति के सूक्ष्म पुद्गल हैं वे उस वचनरूप परिणाम जाते हैं । इनको करने वाला मैं आत्मा नहीं हूँ । मैं आत्मा तो सिर्फ भाव बनाता हूँ और अपने आपमें उस तरह का योग किया करता हूँ, हिलता डुलता हूँ । यों योग उपयोग तो उसके परिणमन हैं, फिर इसके बाद वचन जो निकलते हैं सो निमित्तनैमित्तिक भावपूर्वक ये स्वयं निकलते हैं । तो ये वचन भी पुद्गलद्रव्य की क्रिया है । वचन दो प्रकार के हैं―द्रव्यवचन और भाववचन । द्रव्यवचन के मायने जो शब्द सुनाई देते हैं वे द्रव्यवचन कहलाते हैं और उन द्रव्य वचनों को सुनकर भीतर में जो गुनगुनाहट होती है या भीतर में जिन शब्दों के डोलते हुए में ज्ञान करते हैं वह भाववचन है । तो भाववचन कैसे होता है कि जब वीर्यांतराय कर्म का क्षयोपशम हो, मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण का क्षयोपशम हो और अंगोपांग नाम कर्म का उदय हो तो ये भाववचन हुआ करते हैं, इस कारण भीतर का जो अंतर्जल्प है वह भाववचन भी पौद्गलिक है और उस सामर्थ्य करके सहित क्रियावान आत्मा के द्वारा प्रेरित होकर जो ये पुद्गल वचन रूप बन जाया करते हैं वे द्रव्यवचन हैं, ये दोनों पुद्गल के उपकार हैं, ये जीव के स्वयं के परिणमन नहीं हैं ।

मन की पौद्गलिकता―मन भी जिसको अज्ञानी भी बहुत अपनाते हैं, मन राजी होता है वह मन भी पौद्गलिक है, मेरा खुद का स्वरूप नहीं है, पर इस मन में इस आत्मा ने ऐसा लगाव बनाया है कि मन के सिवाय और कुछ अपने को मान ही नहीं पाता । वह मन दो प्रकार का है―भावमन और द्रव्यमन । कर्मों का क्षयोपशम होने पर जो ऐसी योग्यता बनी कि हम किसी वस्तु का विचार कर सकते हैं वह तो भावमन है, ऐसा भावमन गी पुद्गल के सहारे बनता है इस कारण पौद्गलिक है । द्रव्यमन साक्षात् पौद्गलिक है । ज्ञानावरण का क्षयोपशम होने पर, अंतराय का क्षयोपशम होने पर और अंगोपांग का उदय होने पर, गुण और दोष के विचार करने का सामर्थ्य आता है या गुण दोष विचार करने में जो सावधान हुआ है ऐसे पुरुष को यह मन विचार करने का आलंबन बनता है । जैसे कहते हैं कि भीतर हृदय पर जो अष्टकमल के आकार एक पुद्गल रचना है वह द्रव्य मन कहलाता है । यह सब पौद्गलिक है ।

प्राणापानादि वायु, सुख, दुःख आदि की पौद्गलिकता―जो वायु निकलती है, प्राण, अपान, आदि यह वायु भी पौद्गलिक है, क्योंकि कर्म के उदय से और जैसा क्षयोपशम है उसके अनुसार यह वायु निकलती है । तो श्वास के बाहर फेंकने को तो उच्छ्वास कहते हैं और श्वास के लेने को निःश्वास कहते हैं । तो श्वास का लेना और बाहर निकालना यह जो जीवन का कारण है यह सब मूर्तिमान है । मूर्तिमान है इसका प्रमाण यह है कि जब कोई भय की बात आती है बज्र गिर गया, बिजली तड़की, किसीने अचानक चीख दिया तो मन दुःखता है । इससे सिद्ध है कि मन मूर्तिक है । किसी प्रकार अगर श्वास की नली में कफ अटक गया तो श्वास रुक जाती है अथवा घृणा वाली चीज देखकर कोई नाक दाबता है तो वायु रुक जाती है । इससे सिद्ध है कि यह श्वास मूर्तिमान है । यह अमूर्त होती तो नाक के दाबने पर रुक न सकती थी । इसी प्रकार सुख दुःख भी: पुद्गल के उपकार हैं । यहाँ उपकार के मायने भलाई न लेना किंतु कार्य लेना । ये सब पुद्गल के काम हैं । साता असाता का उदय हो और बाह्यद्रव्य अनुकूल मिल जाय तो वहाँ प्रीति का परिणाम होता है, चित्त राजी होता है उसे सुख कहते हैं और असाता वेदनीय का उदय होने पर बाह्यद्रव्यों का प्रतिकूल परिणमन दिखता है जिससे भीतर में यह रंज मानता है और दु:खी होता है । ये भी पुद्गल के ही काम हैं ।

तत्त्वज्ञानियों की पावनता―कोई जीव यदि भीतर दृष्टि देकर एक यह निर्णय करले कि मैं तो केवल चैतन्यस्वरूप हूँ । विशुद्ध जो जानना है वह मेरा कार्य है और जो कुछ विकल्प तरंग आदिक काम होते रहते हैं ये सब पुद्गल के उपकार हैं । ये पुद्गल के कारण से बनते हैं । मैं स्वयं इनका करने वाला नहीं हूँ । मेरा स्वरूप तो शुद्ध जानना देखना है । वे भव्य जीव बहुत ही महाभाग हैं, बहुत ही पुण्यवान पुरुष है कि जिनको बाह्यपदार्थों में मोह नहीं रहता और अपने आपकी स्वरूपदृष्टि में प्रीति उत्पन्न होती है, यह बात कठिन नहीं है । जानकारी होने पर फिर उस जानकारी को कौन मेट सकता है? जान लिया ठीक है । अब कोई कितना ही कहे कि तुम ठीक नहीं जान रहे, क्या होता बहकाने से । जो कुछ जान लिया वह तो जानने में आ ही गया । जब कोई चीज ज्ञान में आ गयी तो उसके विपरीत कोई कैसे मान लेगा? इसी तरह जब भीतरी पुरुषार्थ के वल से अपने आपके स्वरूप का परिज्ञान हो गया, मैं ज्ञानमात्र हूँ ऐसा अनुभव हो गया तब उसे कोई नहीं बह का सकता है? उसकी प्रीति अपने स्वरूप में टिकेगी, बाह्यपदार्थों में मोह नहीं हो सकता । पर होना चाहिए ऐसे आत्मा का अनुभूतिपूर्वक परिचय । एक तो सामान्यतया ज्ञान हो जाना, शास्त्रों में लिखे अनुसार ज्ञान कर लेना और एक उसका साक्षात्कार होकर, अनुभव होकर उपयोग में वह ज्ञानस्वरूप आ जाय इस विधि से परिचय होवे तो वह अनुभूतिपूर्वक परिचय होना है । अनुभवपूर्वक जो परिचय है वह दृढ़ परिचय है । जैसे रूस, अमेरिका आदिक बहुत से देशों का ज्ञान नक्शों द्वारा कर लिया तो वहाँ की पूरी रचना का ज्ञान हो जाता है, उसे भली-भाँति दूसरों को समझा बता भी देते हैं । तो एक तो इस प्रकार का ज्ञान हुआ, और इस प्रकार का ज्ञान होना कि वहाँ जाकर सब कुछ देखकर ज्ञान कर लिया, यह परिचय है अनुभव वाला परिचय । तो अनुभव वाले परिचय में जो दृढ़ता है वह पढ़कर जानने में नहीं है, इसी प्रकार आत्मा का जो परिज्ञान किया जा रहा है वह ऊपरी परिज्ञान है, भीतर तैयारी करके वह परिचय नहीं किया जा रहा है ।

पर से असहयोग व सत्य का आग्रह करके आत्मपरिचय पाने की आवश्यकता―अपने परिचय की भीतरी तैयारी का अर्थ है कि असहयोग और सत्याग्रह करके करना है अपना परिचय । किसी भी प्रोग्राम में पूरी तैयारी के साथ कोई लगता है तो उसकी दो स्थितियाँ हो जाती हैं―असहयोग और सत्याग्रह । असहयोग तो करना था हमें इन बाह्यपदार्थों का, जिनका सहयोग करने से, जिनका लगाव रखने से हमने दुःख पाया है । यहाँ के संयोग वियोग होना, धन वैभव का मिलना न मिलना आदि सभी स्थितियाँ दु:ख के ही कारण बन रहे हैं । यहाँ कोई की ऐसी स्थिति नहीं दिखती जो वास्तविक शांति का कारण बन सके । ऐसा जानकर इन बाह्यपदार्थों का पूरा असहयोग ठान लिया जाये । जब कोई भी परपदार्थ मेरे लिए हितकारी नहीं है तो में व्यर्थ में क्यों किसी परपदार्थ को अपने चित्त में रखूं? एक बार अपने चित्त को ऐसा बनायें कि अब तो मुझे किसी भी परपदार्थ को अपने चित्त में नहीं बसाना है । सर्व बाह्यपदार्थ मेरे से अत्यंत भिन्न हैं, सर्व पदार्थ दुःख के ही हेतुभूत हैं । यों सर्व बाह्यपदार्थों का असहयोग कर दें और भीतर में एक ऐसा सत्याग्रह कर लें कि मैं तो ज्ञानमात्र हूँ, अन्य रूप नहीं हूँ, मैं ज्ञान को ही करता हूँ, ज्ञान को ही भोगता हूँ, ज्ञान ही मेरा सर्वस्व है, ज्ञान के सिवाय अन्य कुछ नहीं है, मैं ज्ञानमात्र हूँ, ऐसा एक सत्य आग्रह कर लिया जाये तो जीव को अपने आत्मा का अनुभवपूर्वक परिचय हो सकेगा, ऐसा परिचय अगर उस जीव को हो जाय तो वही वास्तविक अमीर है, महान है । आज पुण्ययोग से यदि उत्तम साधन पाया है, आजीविका भी ठीक है, किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं है, कोई शारीरिक आपत्तियाँ नहीं हैं, कुल भी श्रेष्ठ मिला है, जहाँ आचार विचार अच्छा चलता है, जैनशासन मिला है, तत्त्वज्ञान की योग्यता मिली है तो ऐसे सुंदर अवसर को पाकर एक ऐसी तैयारी कर लेना चाहिए कि जिस किसी भी प्रकार हो, मुझे अपने आत्मा के शुद्ध स्वरूप का परिचय कर लेना है, इसके अतिरिक्त अन्य सब कार्य असार हैं, और अनुभव भी बताता होगा कि बहुत काल से बाह्यपदार्थों में लगे रहे, कितनी ही कमाई किया, कितने ही लोगों से परिचय किया, कितने ही दंदफंद किए फिर भी अंत में हाथ कुछ न लगा । तो ये सर्व

समागम असार हैं । तो सबको भूलकर एक ज्ञानस्वरूप के भावना की धुन बनाना चाहिए । ऐसा करने से ही आज का जो महान समागम पाया है वह सफल हो जायगा । बाकी ये सब पुद्गल के काम हैं, पुद्गल के उपकार हैं ।

पुद्गलकृत कार्यों में प्रीति न करने का निश्चय―इस प्रकरण को सुनकर हमें इस निर्णय में आना चाहिए कि जो-जो पुद्गल के उपकार हैं उनमें मेरे को प्रीति नहीं करना है । जीवन और मरण भी पुद्गल के उपकार बताये गए थे, उस ही से संबंधित यहाँ मरण की बात कह रहे हैं कि मरण नाम है किसका? प्राणापान जो क्रिया चल रही है, श्वास लेने और फेंकने की जो क्रिया चल रही है इस क्रिया विशेष का विच्छेद हो जाय, यह क्रिया समाप्त हो जाय तो इसी का नाम मरण है । जीव ने आयु के उदय से भव पाया था । अब उस आयु के क्षय से संबंधित यह प्राणापान क्रिया का विच्छेद हो जाना वही मरण है । तो ये सुखदुःख जीवन मरण आदिक सब पौद्गलिक हैं, क्योंकि मूर्तिमान कारण के प्राप्त होने पर ही ये चीजें उत्पन्न होती है ।

विविध पुद्गलों द्वारा जीव का सांसारिक उपकार―जीव के उपकारक पुद्गल केवल शरीरादिक की ही रचना के कारणभूत हों यही बात नहीं है किंतु इस जीव का उपकार उनसे तो हुआ है लेकिन जो अन्य चीज है, जल है, भस्म है, अग्नि हैं, धातुवें हैं, इन सबसे उपकार देखा जा रहा है । यहाँ जीव के उपकार का अर्थ है कि संसार अवस्था में जीव जिन-जिन बातों में पड़ा हुआ है वे सब पुद्गल के संबंध से हो रहे हैं । अभी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति इन पांचों से किसी एक से काम न लें तो यहाँ का सब व्यवहार रुक जाय । पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु इनके बिना किसी का गुजारा नहीं चलता । पंचमकाल का अंत होने के बाद छठा काल आयगा, उस छठे काल में अग्नि का भी लोप हो जायगा, तब फिर भोजन बनाने के कुछ भी साधन न रहेंगे । तो फिर वहाँ मनुष्य सभी वनचर पशुओं की भाँति माँसभक्षी हो जायेंगे । और जब छठे काल का अंत होता तो प्रलय होता है । इसके बाद फिर छठा काल शुरू होता है । छठे काल के बाद फिर छठा काल आया तो जो वृत्ति पहले छठे काल में थी वही वृत्ति दूसरे छठे काल में होगी; लेकिन फर्क इतना है कि पहिले छठे काल में खोटी वृत्तियाँ बढ़ती हुई चल रही थीं और दूसरे छठे काल में घटती हुई खोंटी वृत्तियाँ चलेंगी । फिर पंचम काल आयगा । बाद में चतुर्थ काल आयगा । वहाँ फिर तीर्थंकर जन्मेंगे, धर्म का प्रसार होगा । तो बात यहाँ यह बतला रहे थे कि अग्नि न होवे तो यह गड़बड़ी हो जायगी । यहाँ का जो उपकार है वह सब पुद्गल के संबंध से है । इस तरह ये सब शरीर मन आदि पुद्गल के द्वारा रचे गए हैं । अजीव के उपकार को बताकर अब यह बतलाते हैं कि जीव-जीव भी परस्पर एक दूसरे का कुछ उपकार (काम) करते हुए पाये जाते हैं ।


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