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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 288

From जैनकोष



सो तिव्ब असुहलेस्सो णरये णिवडेइ दुक्खई भीमे ।

तत्थवि दुक्खं भुंजदि सारीरं माणुसं पउरं ।।288।।

तीव्र अशुभलेश्यावश जीव का नरक में पतन व शारीरिक मानसिक दुःख का उपभोग―वे पशु तिर्यंच जीव तीव्र अशुभ लेश्या वाले होकर नरक में जन्म लेते हैं, जहाँ पर भयंकर दु:ख हैं । वहाँ पर ये जीव शारीरिक और मानसिक सभी प्रकार के दुःख भोगते हैं । देखिये―शरीरजन्य दुःख कितने प्रकार के हैं, सर्दी गर्मी भूख प्यास आदिक रोगों की तो गिनती क्या है? आयुर्वेद शास्त्रों में बताया है कि व्याधियाँ 5 करोड़ 68 लाख 99 हजार 584 (5, 68, 99, 584) प्रकार की हैं । अब लोगों को कोई 10-20 प्रकार की व्याधियाँ मालूम हैं जैसे ज्वर खांसी, टीबी, कैन्सर आदिक । मगर इतनी ही जातियाँ उन शारीरिक व्याधियों की नहीं हैं । तो अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक दुःख इस जीव ने सहे, क्योंकि बड़ी तीव्र कषाय है, कलुषितचित्त है, ऐसा मानसिक दु:ख होता है । शारीरिक दुःख पर हमारा वश नहीं चल सकता । तो मानसिक दुःखों को दूर करने के लिए हम कुछ तत्काल यत्न कर भी सकते हैं, क्योंकि वह तो मन से विचारा हुआ है, कल्पना कर लिया है । किसी को मान लिया कि यह मेरा विरोधी है बस दुःख उसमें होना शुरू हो जाता है । उसका देखना, बोलना, बैठना आदिक न सुहाये और सामने भी न हो, तो कल्पनायें करके दुःख मान लेते । देखो सब जीवों में जीवत्व जाति से समानता है और जगत का कोई यह नियम नहीं है कि ये जीव मेरे विरोधी हैं और रहेंगे । अरे आज अगर विरोधी हैं तो कहो इसी जीवन में थोड़ी ही देर बाद में परम मित्र बन जायें । और, आज जो मित्र हैं उनका भी कुछ भरोसा नहीं कि कब तक मित्रता निभाये, थोड़ी ही देर में शत्रु बन सकते हैं । तो यहाँ किसे विरोधी मानें और किसे बंधु मानें? जीव हैं सब । सभी के प्रति समता का भाव रखें । भीतर में ऐसा परिणाम हो तो वहाँ मानसिक दुःख न रहेगा, । जब, चिंता कलुषता जगती है तो वहाँ मानसिक दुःख होता है ।

नारकियों की परस्परोदीरित दुःखता―नरकों में कुछ परस्पर क्रिया वाले भी दुःख हैं । जैसे एक नारकी दूसरे नारकी को छेदता भेदता है । कोल्हू में पेलना, भाड़ में भूजना, पकाना शूलों पर फेंक देना, तलवार के, धार के समान नुकीले पत्तों वाले वृक्षों के नीचे डाल देना आदिक दुःख एक नारकी दूसरे नारकी को देता है । वहाँ दूसरे नारकी को दुःख देने के साधनभूत शस्त्र कहीं बाहर से नहीं लाने पड़ते । उनके शरीर में ही ऐसी ही ऐसी विक्रिया है कि जहाँ संकल्प किया कि मैं इसे तलवार से मार दूँ तो उनका वह हाथ ही तलवार का रूप धारण कर लेता है । यहाँ तो हम आपका औदारिक शरीर है लेकिन जब किसी को तीव्र कषाय जगती है तो उनके हाथ ही अनेक शस्त्रों का काम करने लगते हैं । जैसे किसी को मुट्ठी बाँध कर तेजी से हाथ मार दिया तो, वह हाथ गदा का काम करता है, अथवा हाथ के मुट᳭ठे से अंगूठा निकालकर तेजी से मार दिया तो वह हाथ सूली का काम करता है अथवा हाथ को यों ही बगल से तेजी से मार दिया तो वह हाथ तलवार का काम करता है । तो जब यहाँ हम आप औदारिक शरीर वालों में ऐसी बात पायी जाती है तो फिर वे तो वैक्रियक शरीर वाले जीव हैं, उनको तो दुःख देने के साधन कैसे कहीं बाहर में ढूँढने पड़ेंगे । वे तो मारने का संकल्प जब

करते हैं तब ही उनके हाथ शस्त्ररूप बन जाते हैं । तो कितने कठिन दुःख हैं नरकों में ।

आजकल अधिकांश लोग तो स्वर्ग और नरक का विश्वास ही नहीं करते । वे तो कहते कि स्वर्ग नर्क सब यहीं है । लेकिन कुछ युक्तियों से और आगम से जानकर स्वर्ग और नरक की बात बतायी गई है । जिन ऋषि संतों के वस्तुस्वरूप के वर्णन में कहीं विरोध नहीं पाया जाता उन ऋषि संतों द्वारा बतायी हुई बातों में शंका न करना चाहिए । करणानुयोग में जब नरकभूमि का, शरीर का, और-और बातों का वर्णन आता है और दूरवर्ती मेरूपर्वत आदिक का वर्णन आता है, और-और प्रकार के वर्णन चलते हैं तो उनको पढ़कर वहीं ऐसी प्रमाणिकता की बुद्धि कर लेते हैं कि हाँ यह सत्य है । तो नरक इस पृथ्वी से नीचे हैं । 7 नरक हैं । उनमें ऐसी तीव्र वेदना भोगनी होती है, और वह भी 100-200 वर्ष ही की बात नहीं, अनगिनते वर्षों तक, सागरों पर्यंत तक वहाँ घोर दुःखों को सहन करना पड़ता है । नरक में कम से कम 10 हजार वर्ष तो रहना ही पड़ता है और सागरों का समय तो असंख्यात वर्षों का है । इतने लंबे समय तक वहां की घोर यातनाओं को सहन करना पड़ता है । तो ऐसी खोटी योनियों में तीव्र कषाय करने वाले जीवों को जन्म लेना पड़ता है । अब विचार करना होगा कि हम आपने कितना दुर्लभ मानव जीवन पाया है? इस जीवन का ऐसा उपयोग करें कि जिसमें धर्मसाधना का ही विशेष महत्त्व हो ।


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