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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 289

From जैनकोष



तत्तो णिस्सरिदूणं पुणरवि तिरिएसु जायदेणवो ।

तत्थ वि दुक्खमणंतं विसहदि जीवो अणेयविहं ।।289।।

नरक से निकलकर तिर्यंच होने पर अनेकविध दुःखों का पुन: उपभोग―यह जीव नरक से निकला तो फिर तिर्यंचगति में पापरूप उत्पन्न हुआ । नरक से निकलकर जीव की केवल दो ही स्थितियां होती हैं या तो मनुष्य हो या तिर्यंच हो । प्राय: करके नरक से निकलकर यह जीव तिर्यंच बनता है । तो नरक से निकलकर तिर्यंचगति में आकर बहुत समय तक इस जीव ने नाना प्रकार के दुःख सहे । तिर्यंचगति के नाना तरह के दुःख स्पष्ट विदित हो रहे हैं । भूख प्यास, भार लादना, ठंड, गर्मी आदिक अनेक प्रकार के दुःख हैं । कुत्ता, घोड़ा, हाथी, गाय, भैंस आदि बिरले ही कोई पशु जीव पुण्यवान ऐसे पाये जाते हैं जिनकी उनके मालिक लोग बड़ी सेवा करते हैं, लेकिन प्राय: करके सभी तिर्यन्च जीव नाना प्रकार के दुःख सह रहे हैं । कितने ही लोग तो उन पशुओं का निर्दयतापूर्वक शिकार करते हैं, उनका छेदन भेदन करना, उनको ताड़ना देना, उनकी हत्या करना आदिक नाना प्रकार के दुःख इन तिर्यंचों के पाये जाते हैं । किसी पशु के शरीर में व्याधि हो जाय, जैसे कुत्तों के, झोटों के, गधों के कंधे वगैरह सूज जाया करते हैं, उनसे खून भी चूता रहता है पर कौन है उन पर रहम करने वाला ? उन बेचारे पशुओं के पास इलाज करने का कोई साधन नहीं है, अथवा गाय, बैल, भैंस आदि कहीं बाँध दिए, मालिक ने उनकी ओर अगर ध्यान न दिया तो वे बेचारे भूखे प्यासे जहाँ के तहां बंधे रहा करते हैं, किसी ने कहीं धूप में किसी जानवर को बाँध दिया, अगर उसको वहाँ से लाना भूल गए तो वह पशु धूप की ज्वाला में जल जलकर दुःखी होता रहता है । उन बेचारों पर कौन दया का भाव करता है? दया का भाव होने

को अनुकंपा कहते हैं । जब खुद के अंदर भी कुछ कंपन हो गया तो ऐसी स्थिति में दया का भाव उत्पन्न होता है । बोधिदुर्लभ भावना में यह बतला रहे हैं कि हम आपने जो भी स्थिति पायी है वह बड़ी दुर्लभ है, और आगे कौनसी स्थिति पाने योग्य है जो कि अति दुर्लभ है ? निगोद, स्थावर, विकलेंद्रिय आदिक से निकलकर हम आप आज मनुष्य हुए हैं तो कितनी ऊंची स्थिति में आ गए, यहाँ आकर हमको कितनी ऊंची स्थिति बनानी चाहिए क्या पुरुषार्थ करना चाहिए ? यह सब बताया जायेगा । यहाँ तक यह बात आयी कि यह जीव तिर्यंच गति में भ्रमता फिरा । वहाँ से भ्रमकर नरक में गया, नरक से निकलकर तिर्यंच हुआ ।


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  • कार्तिकेय अनुप्रेक्षा
  • प्रवचन
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