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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 290

From जैनकोष



रयणं चउप्पहे पिव मणुपत्तं सुद्रु दुल्लहं लहिय ।

मिच्छो हवेइ जीवो तत्थ वि पावं समज्जेदि ।।290।।

दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर भी पापोपार्जन का अपराध―मनुष्यभव का पाना ऐसा दुर्लभ है कि जैसे चौहट्टे पर गिरी हुई रत्नमणि का मिलना दुर्लभ है । चौहट्टे पर चारों ओर से लोगों का आना जाना बना रहता है, वहाँ पर किसी का गिरा हुआ रत्न कैसे पड़ा रहेगा ? तो जैसे चौहट्टे पर रत्नमणि मिलना दुर्लभ है ऐसे ही यह नरभव मिलना अति दुर्लभ है । ऐसे दुर्लभ नरभव को पाकर यहाँ मिथ्यादृष्टि होकर लोग पापकार्यों में रत होते हें । पापकार्य वे हैं जो भले कामों से बचावें, याने अच्छे काम जो न करने दें उनका नाम पाप है । हिंसा, झूठ, चोरी कुशील, परिग्रह आदि इन समस्त पापों में आकुलता बसी है । उसे आकुलता को यह जीव भोगता जाता और उस दुःख को दूर करने का उपाय पाप को ही समझता है । दूसरों का दिल दुखा दिया, जैसी चाहे बात कह दिया । थोड़ी सी पुण्य सामग्री पाकर यह जीव मौज मानता है, दूसरों से ईर्ष्या करता है । सो ठीक है, कर लें जैसा चाहें मनचाहा, पर इस खोटी करनी का फल कोई दूसरा भोगने न आयेगा । यहाँ तो सब कुछ सच्चाई से काम चल रहा है । जो जीव जैसा परिणाम करता है उसके अनुसार कर्मों का बंध होता है । उन कर्मों का उदय आने पर उस जीव को वैसा फल प्राप्त होता है । यह निमित्तनैमित्तिक भाव की बात ठीक जंच रही है क्योंकि इसमें दो चीजों का संबंध है―एक यह चैतन है और दूसरा अचेतन है । बेईमानी अचेतन क्या करेगा ? चेतन जैसे परिणाम करेगा वैसा उसमें प्रभाव बनेगा । लेकिन यह सोचना चाहिए कि यहाँ थोडीसी मौज के लिए यदि, पापकार्यों में प्रवृत्ति की तो उसका फल भोगने कौन आयेगा ? कदाचित् पूर्वकृत पुण्य के उदय से पापकार्य करते हुए भी मौज के प्रसंग बने रहें, पर उस पापकर्म का फल बेकार न जायेगा उसका फल अवश्य भोगना पड़ेगा । तो मनुष्य होकर यह सावधानी रखनी है कि हमारा पाप करने का भाव न हो, किसी का दिल दुखाने का भाव न हो, झूठ बोलने का भाव न हो, किसी की चीज चुराने का भाव न हो, किसी परपुरुष अथवा परस्त्री पर कुदृष्टि का भाव न हो, परिग्रह की लालसा न हों, इस प्रकार का परिणाम रखने का यत्न करें । तो यहाँ खेद के साथ कहा जा रहा है कि मनुष्यभव तो पाया मगर वहां पर भी इस जीव ने पापकर्म का ही उपार्जन किया और प्राय: करके म्लेच्छ खंड में जन्म पाया, म्लेच्छमयी स्थितियां पायीं तब फिर इसने मनुष्य होकर भी कुछ लाभ न उठा पाया ।


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  • कार्तिकेय अनुप्रेक्षा
  • प्रवचन
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