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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 322

From जैनकोष



तं तस्स तम्मि देसे तेण विहाणेण तम्मि कालम्मि ।

को सक्कदि वारेदुं इंदो वा अह जिणिंदो वा ।।322।।

होनी की अनिवार्यता का विचार―सम्यग्दृष्टि जीव इस प्रकार का विचार रखता है कि जो बात जिस जीव के जिस देश में जिस प्रकार से जिस समय में जो होनी है, जिनेंद्र भगवान द्वारा ज्ञात है, वह चाहे जन्ममरण सुख दुःख आदिक कोई भी परिणति की बात हो, जो होना है वह जिनेंद्र द्वारा ज्ञात है और वह उस जीव के उस देश में उस प्रकार से उस काल में होगा, उसका निवारण करने के लिए इंद्र अथवा जिनेंद्र भी समर्थ नहीं है । इस विषय को एक मोटे रूप से यों भी सोचें कि हमें यह नहीं मालूम कि कल 8 बजे क्या होगा, मगर यह तो निश्चित है कि कुछ तो होगा ही । जितने भी पदार्थ हैं उन सबका प्रति समय परिणमन होता है । अब हम नहीं जान रहे कि कल 8 बजे क्या होगा, किंतु जो होगा वह होगा ही । अब इस संबंध में यह आशंका लोग करने लगते हैं कि तब फिर कुछ कारण मिलाने की आवश्यकता क्या है? जो होगा सो होगा, लेकिन यह जानना चाहिए कि जो होने की बात है वह जिस विधान से होने की है उसही विधान से होगी । वहाँ कारण कलाप ऐसा ही जुटेगा और उन ही कारणों के बीच वह होनी बनेगी । कोई होनी जो कभी होती है फिर मिट जाती है, ऐसी होनी कारण के बिना कभी नहीं होती । जो बात बिना कारण के होगी वह सदा रहेगी । जो बात सदा नहीं रहती, समझना चाहिए कि उस बात में कोई कारण था । कारणपूर्वक होने वाली बात सदा नहीं रहा करती है, और जो बिना कारण के होती है वह सदा रहा करती है । जैसे बिना कारण के वस्तु का स्वरूप बना है उसका ज्ञान स्वभाव है, यह बिना कारण के हैं, तो यह ज्ञानस्वभाव सदा रहेगा, पर हमने यह पुस्तक जाना, अमुक पदार्थ को जाना ऐसा जो हमारा अलग-अलग जानना बन रहा है इसमें कारण है हमारा ज्ञानावरण का क्षयोपशम, इंद्रियां हमारी पुष्ट हों, होशहवास हैं, अनेक कारण हैं इस कारण यह जानन मिटता रहता है । कोई चिंता हो, दुःख हो, सुख हो, मौज हो, ये सब बातें कारणपूर्वक हो रही हैं, इस कारण ये सब मिट जाया करते हैं । इसी कारण सम्यग्दृष्टि जीव न सुख में हर्ष मानता है, न दुख में विषाद करता है । ये तो सब मिट जाने वाली चीजें हैं । तो जो जब जहाँ जिस कारणपूर्वक होनी है वह वहाँ तब उस कारणपूर्वक होती ही है ।

कल्याणकारी सरल अंतर्बाह्य निर्णय―जिस गृहस्थ को इन दो बातों का श्रद्धान होगा एक तो जो समागम मिला है वह नियम से बिछुड़ेगा । दूसरी बात यह कि मेरा जब अस्तित्व है तो कभी मेरा विनाश नहीं हो सकता । ये दो बातें जब निर्णय में आ गईं तब उस गृहस्थ को दुःख क्या रहा ? एक मनुष्य दुःख दो बातों का मानते हैं―एक तो कहीं मैं नष्ट न हो जाऊँ, दूसरे कहीं ये प्राप्त पदार्थ छूट न जायें । सो पदार्थ हमसे छूटेंगे ही और छूटेंगे क्या ? इस समय भी पदार्थ हमसे छूटे हुए ही हैं । आप लोग यहाँ मंदिर में आये हैं तो घर, धन आदि साथ में चिपककर आये हैं क्या ?... नहीं । तो सब आप से दूर-दूर ही है । आप उन सबसे निराले हैं । आपने उन परपदार्थों को मान लिया कि ये मेरे हैं तो यह आपकी कल्पना ही तो हुई । ऐसा मानने से कहीं वे परपदार्थ आपके तो न बन जायेंगे । कल्पना करने मात्र से यदि परपदार्थ अपने बन जायें तब तो फिर आप भगवान से भी बढ़कर हैं । भगवान का तो कोई परपदार्थ उनका बन नहीं सका और आपका बन गया तब तो फिर आप भगवान से भी बड़े हो गए (हंसी) । कोई परपदार्थ किसी का हों जाय ऐसा हो नहीं सकता । सभी पदार्थ स्वतंत्र हैं, निराले हैं, और बड़े-बड़े छह खंड के चक्रवर्ती छह खंड का राज्य तजकर याने सारे भरत क्षेत्र का साम्राज्य छोड्कर जंगल में निर्ग्रंथ दिगंबर होकर रहते हैं, तो उनको छह खंड के वैभव से भी अधिक कोई अलौकिक सुख मिला है तभी तो उन्होंने सारा राज वैभव छोड़ा । तो निर्जन बन में अकेले रहकर भी उन्हें जो अलौकिक आनंद प्राप्त होता है तो वह किसका आनंद है ? अपने ज्ञानस्वभाव की अनुभूति का अनुपम आनंद है । अपना आत्मा अपने आपकी दृष्टि में आ जाय इसमें जों आनंद भरा हुआ है उस आनंद का अनंतवीं हिस्सा भी कहीं बाह्यपदार्थों के समागम में नहीं है ।

सर्वस्वसार अमर ज्ञानस्वरूप के अनुभव में असंख्यभवद्वद्धकर्मक्षपण की क्षमता―असंख्याते या अनंते भवों के कर्म अब भी हम आपके साथ लगे हैं । यह न जानें कि पूर्व के एक भव के बांधे हुए कर्म ही हमारे साथ हैं । करोड़ों भवों के बांधे हुए कर्म भी अब तक हमारे साथ हैं । और, यों कह लीजिए कि किसी जीव के तो अनंतभवों के बांधे हुए कर्म भी साथ लगे हैं । अनंतभवों के मायने अनंतानंत नहीं, किंतु जितने भवों को अवधिज्ञान से न जान सकें । अंत तो है उनका पर जो अवधिज्ञान में आयें उससे भी परे की बात है, उसे भी अनंत कहते हैं । निगोद जीव के एक ही दिन में कितने भव हो जाते हैं । जब एक श्वांस में 18 भव निगोद के बन गए तो एक मिनट में करीब 1380 भव बन गए । एक घंटा में 82800 हो गये । अब आप 1 दिन रात के भव देख लीजिए कितने हो गए ? 1987200 और, कोई निगोद जीव यदि 10-20 वर्ष निगोद में रहे तो कितने भव हो गए ? वहाँ से निकलकर मनुष्य हो गए तो उसके वे सब भवों के बांधे हुए कर्म हम आप सभी जीवों के साथ हैं । इतने कर्मों को काट देना किस बल पर होता है ? जब आत्मा अपने आपमें अपने उस आत्मा के शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप को निहारता है और वहीं तृप्त रहता है, विलक्षण आनंद का अनुभव करता है तो उस समय परभावों का लगाव छूट जाने के कारण असंख्याते अथवा अनंते भव के बांधे हुए कर्म क्षण मात्र में खिर जाते हैं । यह बात किसी सांसारिक सुख में रहकर नहीं की जा सकती है । तो आत्मा के अनुभव का आनंद अनुपम आनंद होता है ।

प्रकृत अर्ंताह्यनिर्णय का प्रभाव―जिसने इतना भी अपने निर्णय में रख लिया कि हमें जो भी समागम प्राप्त हैं वे नियम से शीघ्र ही बिछुड़ जायेंगे । अब कोई चाहे त्याग करके छोड़े और चाहे जीवित समय में ही लुटेरे लूट ले जायें, अथवा मर जायें तो छूट जायें, समागम तो हटेंगे ही । द्वितीय बात यह है तब सच्चा ज्ञानप्रकाश बनायें कि मेरे आत्मा का सर्वस्व धन मेरा ज्ञानस्वरूप है । मेरे ज्ञानस्वरूप के अलावा मेरा रंच मात्र भी कुछ नहीं है ऐसा निर्णय बनायें और भीतर ही भीतर इसका बारंबार विचार करें, इस भावना को पुष्ट बनायें कि मेरा तो सब कुछ केवल ज्ञानस्वरूप है, इस ज्ञानस्वरूप के अलावा अन्य कुछ भी मेरा नहीं लगता । जो कुछ मिला है वह सब मुझ से निराला है । अब भी छूटा हुआ है और देश से भी जल्दी छूट जायेगा । दूसरी बात यह निर्णय में रखना है कि मेरा विनाश कभी नहीं होता । आज हम यहाँ हैं, यहाँ से मरण करके किसी दूसरी जगह पहुंच गए तो इसमें मेरा क्या बिगाड़ ? बिगाड़ तो मोही जीव ही मानते हैं कि मैंने यहाँ इतनी इज्जत बना ली, इतना परिचय कर लिया है, इतना धन संचित कर लिया है, हाय ! यह सब छूटा जा रहा है । अरे यह सब तो तब भी असार था जब मान रहे थे कि मेरा कुछ है यहाँ । तब भी यह सब कुछ आप से बाहर था, पर अपनी बरबादी का कारण बन रहा था । मेरा क्या बिगाड़ है ? छूट जाय तो छूट जाय । अपने आत्मा के स्वरूप के अभ्यास का इतना धुनिया बन जाय कि सारा जहान भी अगर हमें पागल कहने लगे तो कहने दो; क्योंकि दुनिया चिपकी जा रही है वैभव इज्जत से । और, वैभव, इज्जत मेरी निगाह में तृणवत् है, तुच्छ है । एक ज्ञानस्वरूप ही मेरा सर्वस्व धन है यह मेरी दृष्टि में रहे, उसही में मैं निरंतर लीन रहा करूँ । बस हे प्रभो ! हमें एक यही आकांक्षा है । अगर बीमारी आ गई है, दिल धड़क रहा है, हार्ट फैल जैसी नौबत भी आ रही हो तो ज्ञानी यह देख रहा है कि मेरा तो कुछ भी नहीं हो रहा । शरीर-शरीर है, मैं ज्ञानस्वरूप में पूरा का पूरा हूँ, इस जीर्ण खराब शरीर में न रहकर किसी नवीन पुष्ट शरीर में पहुंच जाऊंगा । और, मैं तो यह भी नहीं चाहता कि किसी नवीन अच्छे शरीर में पहुंचूँ । कोई भी शरीर मुझे न मिले । मैं केवल रह जाऊं जैसा मेरा खालिस स्वरूप है, ज्ञान और आनंद अमूर्त स्वरूप, जिसमें रूप, रस, गंधादिक नहीं हैं ऐसे ही मैं अपने इसे ज्ञानानंद स्वरूप में बस जाऊं, बस यही भावना है । शरीर मिलने की तो भावना है ही नहीं । तब क्या बिगाड़ है ? जो होता हो, होओ, छूट रहा है छूटे, मेरा कुछ नहीं छूटा । जो मेरा है वह मुझसे छूट नहीं सकता । जो मेरा नहीं है वह मुझमें मिल नहीं सकता । जितने पदार्थ हैं वे सब स्वरूप सिद्ध है, स्वतंत्र हैं । किसी पदार्थ का किसी अन्य पदार्थ में मेल नहीं होता । भले हीं मिल जाये, जैसे आज दिख रहे हैं ये खंभा भींत वगैरह मिले हुए है लेकिन यहाँ भी प्रत्येक परमाणु की सत्ता न्यारी-न्यारी है । कोई किसी के स्वरूप में मिल नहीं सकता । तब ऐसी स्थिति में कोई चीज बिछुड़ जाय तो उससे मेरा क्या बिगाड़ है ?

प्रकृत अंतर्बाह्य निर्णय की उपयोगिता का उपसंहार―मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, जिसका कभी विनाश नहीं होता । मैं अपने ज्ञान के निकट रहूं तो यहाँ भी आनंदमय हूँ, और जहाँ भी जाऊंगा, वहाँ भी मैं अपने ज्ञानस्वरूप के निकट रहूं तो वहाँ भी मैं आनंदमय रहूंगा । और, जब अपने स्वरूप में न रहकर बाहरी किसी पदार्थ में नेह लगा रहे हैं तो यहाँ भी हम आनंदरूप नहीं हैं । चिंता, शल्य, शोक आदि में घबड़ाहट जरूर है । तो इतना तो है ही कि जैसे मछली जल से बिछुड़ गयी, बाहर पड़ी है तो वह तड़फ तो रही ही हैं ऐसे ही यह उपयोग जब ज्ञानसमुद्र से दूर पड़ गया, बाहर में ज्ञानदृष्टि लगा दी तो यह उपयोग तो घबड़ायेगा ही । बाहर में उपयोग लगा तो वहाँ नियम से व्याकुलता ही मिलेगी । वहाँ शांति नहीं मिल सकती । तो जिस गृहस्थ को यह निर्णय है वह यहाँ रहता हुआ भी सुखी है । एक तो यह निर्णय बनाना जरूरी है कि जो भी समागम मिला है यह नियम से जल्दी ही बिछुड़ेगा । और दूसरा यह निर्णय बना होगा कि मैं आत्मा ज्ञानसर्वस्व हूँ । मेरे इस ज्ञानानंद सर्वस्व आत्मा का कभी विनाश नहीं होता । ये दो निर्णय तो अवश्य रखना ही चाहिए ।

ज्ञानी पुरुष का होनी विषयक चिंतन―अब ज्ञानी पुरुष वाह बातों में यह विचार कर रहा है कि बाहर में जौ घटना होती है, जो परिणमन होता है वह जिस निमित्त सन्निधान में जिस वातावरण में जिस प्रकार से होना है उस प्रकार से होगा । उसे मेटने के लिए न इंद्र समर्थ है और न जिनेंद्रदेव समर्थ हैं । प्रत्येक पर्याय का द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव नियत है अर्थात् प्रत्येक पदार्थ अपने ही द्रव्य में परिणमता है, अपने ही प्रदेश से परिणमता है और अपनी ही पर्याय से परिणमता है, अपनी ही शक्ति में परिणमता है और फिर ऐसे परिणमते हुए पदार्थ का जो बाह्य वातावरण है याने जिस देश में जिस समय में जिस प्रकार से जो बात होने वाली है वह होती है, उसे कोई टालने में समर्थ नहीं है । सर्वज्ञदेव सर्व अवस्थाओं को जानते हैं । यहाँ पर एक केवल निश्चयदृष्टि से ही निरखा तब तो वहाँ उसे यह ही दिखेगा कि इस द्रव्य में इस द्रव्य की परिणति से पर्यायें हो रही हैं, अन्य से मतलब क्या है ? लेकिन जब युक्तिपूर्वक विचार करने बैठते हैं तब यह समझ में आता है कि जितनी भी विभाव परिणतियां हैं, उल्टी परिणतियां हैं, वस्तु के स्वभाव के विरुद्ध परिणतियां हैं, वे परिणतियां वस्तु में स्वभावत: नहीं हुआ करती हैं । होती हैं वस्तु में किंतु वे अन्य निमित्त पाकर हुआ करती हैं अन्यथा ये विभाव स्वभाव बन जायेंगे । तो यह तो निश्चित है कि जितने भी रागादिक गुजरते हैं वे निमित्तसन्निधान में गुजरते हैं । वे अनैमित्तिक परिणति नहीं हैं, लेकिन यहाँ भी यह विश्वास बनाना होगा कि कुछ भी निमित्त हो, किसी पदार्थ की परिणति किसी दूसरे निमित्तभूत पदार्थ से निकलकर नहीं आती । तो इसे सर्वज्ञदेव जानते हैं, अवधिज्ञानी जानते हैं । उनके जान लेने से यह तो निर्णय हो गया कि जो कुछ जब होना है, जिस समय होना है, जिस प्रकार से होना है वह उस प्रकार से होता है । इस बात को हिंदी कवियों ने एक दोहे में बताया है कि ‘‘जो जो देखी वीतराग ने सो सो होती बीरा रे । अनहोनी नहीं होती कबहूँ, काहे होत अधीरा रे ।।’’ हे मनुष्य ! तू अधीर क्यों होता है ? तू यह समझता है कि हाय ! ऐसा हो गया, ऐसा न हो जाय, आदि इतनी अनेक कल्पनायें तू क्यों करता है ? देख बाह्यपदार्थों में जब जो परिणमन होना है, होगा । इन बाह्य परिणमनों से भी दूसरे में कुछ आता नहीं है । तेरा परिणमन तुझ में है । और, विभाव परिणमन निमित्तपूर्वक हैं, फिर भी वे सब तेरे ही परिणमन हैं । पूर्वपर्यायसंयुक्त द्रव्य उत्तर पर्याय का उपादान कारण है । सो अपने ही भावों के द्वारा अपना ही अगला भाव बनता चला जाता है । अत: अब अधीरता मत करो और इन बाहर पदार्थों का विकल्प त्यागकर अपने आपके सहज ज्ञानस्वरूप में विश्राम करो । इसमें तेरी उन्नति है । बाह्य पदार्थों के विकल्प करने से तेरी उन्नति नहीं है ।

ज्ञान व प्रशम के बल पर कर्मों का संहार―अहा ! आत्मा के अनुभव में जो आनंद उत्पन्न होता है, समस्त बाह्यपदार्थों का राग छोड़कर जो उपयोग को विश्राम मिलता है उस विश्राम में जो आनंद उत्पन्न होता है उस आनंद में सामर्थ्य है कि असंख्याते भवों के बाँधे हुए कर्मों को नष्ट कर दे । एक कवि ने कहा है कि हे प्रभो ! बड़े आश्चर्य की बात है कि लोग तो शत्रु को तब नष्ट कर पाते हैं जब कि तेज क्रोध मन लायें, पर आपने तो अपने इन कर्म शत्रुवों का नाश करने के लिए क्रोध के बजाय उत्कृष्ट शांतिरूपी शस्त्र को अपनाया । सो बात सही है । ये कर्म शत्रु शांति के बल पर ही नष्ट हो सकते हैं, क्रोध के बल पर नहीं । तो जो अपने आपके स्वरूप को निहारता है उसमें ही पूज्यता है और वही सर्व कर्मों का नाश करने में समर्थ है, वह अपना उद्धार

कर लेगा । और, जो पुरुष दूसरे-दूसरे की ही बात को निहारता है और कुछ थोड़ा सा शुभ भाव बनाता है तो यों धुन बनाता कि दूसरे लोग धर्मात्मा बनें, और लोग यह कहने लगें कि इनका धर्म बात अच्छा है । विद्वान बुलवाया, व्याख्यान दिलवाया, जलूस निकाला, इसलिए कि सभी लोग समझ जायें कि इनका धर्म बहुत अच्छा हैं, ये सभी लोग धर्मात्मा बन जायें, ऐसी जो कोई पुरुष धुन रखते हैं और खुद धर्मात्मा बन नहीं पाते हैं, खुद उस तत्त्व का अनुभव कर नहीं सकते हैं तो ऐसे यदि 100 आदमी हों इस विचार के कि ये 99 आदमी इस धर्म को खूब समझ जाये तो यहाँ एक ने भी धर्म नहीं समझा, और अगर कोई पुरुष खुद अपने धर्म को समझता है तो उसने समझा धर्म को रूप और तब संभव है कि दूसरे के दिल पर भी उसका सही प्रभाव बन जायगा कि दूसरे लोग भी धर्म का पालन करेंगे । सो जो पुरुष इस तरह पहिचानते हैं कि जब जहाँ जैसा जो कुछ होना है वह होगा, उसे कोई मेटेगा नहीं, तब क्यों कुछ सोचकर अधीर होते हो ? विषय के निर्णय को अब इस गाथा में कह रहे हैं ।


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