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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 323

From जैनकोष



एवं जो णिच्छयदो जाणदि दव्वणि सव्व-पज्जाए ।

सो सद्दिट्ठा सुद्धो जो संकदि सो हु कुद्दिट्ठा ।।323।।

द्रव्य गुण पर्याय के निर्णय से वस्तुस्वातंत्र्य की दृष्टि―उक्त प्रकार से जो अपना निर्णय रखता है, समस्त द्रव्यों को समस्त पर्यायों को सही रूप में जानता है वहतो शुद्ध सम्यग्दृष्टि है, और जो इस द्रव्य में शंका करता है सो वह मिथ्यादृष्टि जीव है । द्रव्य 6 प्रकार के बताये गए हैं―जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल । द्रव्य 6 नहीं किंतु अनंत हैं, क्योंकि जीव ही अनंतानंत हैं। पुद्गल उससे भी अनंत गुने हैं । असंख्याते कालद्रव्य हैं, धर्म, अधर्म, आकाश ये एक-एक हैं, किंतु ये अनंत पदार्थ 6 जातियों में ही गर्भित हो जाते हैं । तो इन पदार्थों की फिर पर्यायें हैं । गुणों की पर्याय, प्रदेश की पर्याय, तो द्रव्य है, द्रव्य में शक्तियां हैं । उन शक्तियों की परिणतियां होती हैं । द्रव्य शाश्वत है, शक्ति भी हमेशा रहने वाली है और उनका जो परिणमन हो रहा है वह अनित्य है, नष्ट हो जाने वाला है । यों द्रव्य, गुण, पर्यायों का जो निर्णय रखता है वह है ज्ञानी, और जो इसमें शंका करता है वह है मिथ्यादृष्टि जीव । तो यही निरखना है कि प्रत्येक द्रव्य उत्पादव्ययध्रौव्य वाला है । वह अपने में अपनी नवीन परिणति बनाता है, पुरानी परिणति विलीन करता है, फिर भी सदा बना रहता है । अतएव किसी द्रव्य का किसी अन्य द्रव्य के साथ संबंध नहीं है । यों वस्तु की स्वतंत्रता को जो निहारता है वह ज्ञानी जीव है ।


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  • कार्तिकेय अनुप्रेक्षा
  • प्रवचन
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