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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 10

From जैनकोष



दुरंतदुरिताक्रांतनि:सारमतिवंचकम्।

जन्म विज्ञाय क: स्वार्थे मुह्यत्यंगी सचेतन:।।10।।

जन्म की अनांद्यता―यह जन्म अर्थात् संसार के इन भवों में उत्पन्न होना बहुत पापों का आक्रांतक है, जिसका परिणाम खोटा है। लोग जन्म को निरखकर सोचकर हर्ष मनाया करते हैं, किंतु जन्म अच्छी चीज नहीं है, उसमें हर्ष की क्या बात आ गई? खुद के जन्म में तो हर्ष मानने लायक बुद्धि भी नहीं चलती। किसने अपने जन्म पर खुशी मानी? अरे उसे तो कुछ होशहवास ही नहीं, जन्म लेने वाला खुशी क्या मनायें। जन्म लेने वाला व्यक्ति तो खुद बड़ा क्लेश भोग रहा है। जन्म में एक तो निकलने का दु:ख, दूसरे अत्यंत कोमल शरीर, जगह-जगह चोट लगने की वेदना भोगता है, जन्म लेने वाले को कहाँ होश है कि इस बात की खुशी मनायें कि लो मेरा जन्म हुआ है। हाँ, ये बड़े लोग बच्चे के जन्म पर खुशी मनाया करते हैं। उनका वह खुशी मनाना एक मोह से भरी हुई बात है। काहे की खुशी?

जन्म से अलाभ― कदाचित् कोई यह खुशी को सिद्ध करने की बात कहे कि मेरे घर एक जीव उत्पन्न हुआ है, वह श्रावक बनेगा, धर्मपालन करेगा, मोक्ष का मार्ग निभायेगा उसकी खुशी है। यदि इस बच्चे के पैदा होने की खुशी है तो अन्य बहुत से बच्चे पैदा होते हैं, उनके भी पैदा होने की खुशी मनाना चाहिये, पर कौन मनाता है? ग्रंथों में तो यह जरूर लिखा है कि गृहस्थ को गृहस्थी का धर्म चलाने के लिये संतान उत्पन्न करना चाहिये, पर किसकी यह दृष्टि है? केवल मोह से आक्रांत होकर ही व्यवहार चलता है। खुद के जन्म पर दृष्टि दो। जन्म हुआ तो क्या हो गया है, कौनसी खास बात हुई? संसार में परिभ्रमण कर रहे थे, किसी जगह से मरकर आये, यहाँ एक नया शरीर पा लिया। ऐसा तो करते आये अनंतकाल से। कौनसी बड़ी विशेषता की बात हुई?

हर्ष और विषाद का वास्तविक आधार―भैया ! जन्म कोई विशेषता की बात नहीं है, और मरने में कुछ खो जाने की भी बात नहीं मरण हो रहा है तो ठीक है, उस आत्मा का क्या बिगाड़ है, जिसे कल्याण की वांछा है, आत्मतत्त्व की सुध है उसे मरण समय में कुछ विषाद नहीं होता, और जिसके मोह है, पर्यायबुद्धि है, कुछ जीवों को अपना मान लिया है ऐसे पुरुष ही मरण के समय में विषाद किया करते हैं। हाय ! ये मेरे बच्चे नाती पोते अब बड़े हो गये थे, सुख लूटने के अब दिन थे। पर इन्हें छोड़कर मरण करके जा रहे हैं, यों सोचकर दु:खी तो मोही पुरुष होते हैं। दु:ख काहे का? अपनी खुशी आये थे अपनी खुशी जा रहे हैं, इसमें हर्ष विषाद क्या? हर्ष विषाद तो उसका करें कि मेरा परिणाम निर्मल बने उसकी खुशी मनावें, उससे बढ़कर वैभव कुछ नहीं है। परिणामों में मलिनता आये, विषयकषायों की बात आये, दूसरे को धोखा देने की बात आये, और और भी गंदगियाँ आयें उसका रंज करें। हाय ! मेरे कैसा पाप का उदय है। यह कैसा अशुभ भाव बन रहा है?

निर्वाण से प्रथम स्थिति― यह जन्म पापों से आक्रांत है। जिसका बड़ा खोटा परिणाम है ऐसे पापों से भरा हुआ यह जन्म है जन्म से किसी की सिद्धि नहीं होती है। मरण से तो सिद्धि हुई है। भगवान मोक्ष गये तो मरण के बाद गए कि जन्म के बाद? निर्वाण जन्म के बाद होता है कि मरण के बाद होता है? मरण के बाद। आयु के क्षय का ही तो नाम मरण है। जब आयोगकेवली गुणस्थान में अंत में आयु का भी क्षय हो जाता है तब ही तो वे निर्वाण पाते हैं, सिद्ध होते हैं। सदा के लिये शुद्धि और आनंद मिल जाना यह मरणपूर्वक होता है, जन्मपूर्वक नहीं होता। ज्ञानियों की दुनिया में मरण का तो समारोह मनाया जाता है जन्म का समारोह नहीं मनाया जाता। मोहियों की दुनिया में जन्म समारोह मनाया जाता है मरण पर नहीं मनाया जाता। मरण के समय समारोह मनाने की बात वहाँ सोचियेगा जहाँ अनेक साधु संत हैं संग में और कोई साधु समाधिमरण में आया है, समाधि धारण की है उसकी आत्मा की रक्षा के लिये 48 मुनि उसकी सेवा करते हैं, और किस प्रकार की सेवा― कोई चार फर्लांग दूर बैठे हैं, कोई निकट सीमा के बाहर बैठे हैं ताकि कोई मोही आक्रांता वहाँ से न गुजरे और उस समाधिमरण वाले साधु को विघ्न न करे, अथवा कोर्इ उससे विवाद करने आया है तो उसे वे मुनि दूर हटा देते हैं, कितने ही मुनि उसकी सेवा करने वाले होते हैं। यह है उनका समारोह। तो ज्ञानी पुरुष मरण में जलसा समारोह करते हैं।

मुट्ठी बांधे आना व हाथ पसारे जाना― लोग कहते हैं कि यह जीव मुट्ठी बांधे आता है और हाथ पसारे जाता है। इसका और क्या अर्थ है? पूर्व भव की कमाई साथ में लेकर आता है, और ज्यों-ज्यों बड़ा होता जाता है, विषयकषायों में पड़कर अपने पुण्य को खत्म करता जाता है, यों सारा पुण्य खत्म करके अंत में सब कुछ खोकर हाथ पसारे जा रहा है। यह जन्म नि:सार है। जैसे कहीं कोई गुंडों के बीच फंस जायें तो किसी भी प्रकार उनसे छूटने के लिये राग का व्यवहार करना पड़ता है, ऐसे ही जानों कि हम अनंत विषय वासनावों से रंगे हैं तो ऐसी स्थिति में एक नरभव का जन्म ऐसा उत्तम सहारा है कि यहाँ किसी तरह अपने बचाव की बात बनाकर इसके माध्यम से हम सदा के लिये जन्म के पंजें से छूट जायें, इस कारण इसे सारभूत कहा है, पर वस्तुत: जन्म तो जन्म ही है।

जन्म की वंचकता― यह जन्म, यह संसार अत्यंत ठगिया है। जैसे कोई पुरुष थोड़े से सुख का लोभ देकर उसका सर्वस्व हर लेता है इसी प्रकार यह जन्म थोड़े से विषयों का लोभ देकर इसका सर्वस्व हर लेता है और नरक निगोद का निवास दिया करता है। ऐसा यह नि:सार जन्म है। इसकी असारता जानकर कौन बुद्धिमान् पुरुष अपने स्वार्थ में मोह को प्राप्त होता है, अर्थात् आत्मकल्याण में प्रमादी होता है। इन सर्वसमागमों को असार जानकर आत्मकल्याण में लग जावो, आत्मकल्याण में प्रमादी मत बनो। तुम्हारे साथ रहोगे, ये सारे समागम न रहेंगे। जब हम ही हमारे साथ रहेंगे तो अपने को ऐसा योग्य बनायें कि भविष्य में हम संकट न पायें। यहाँ की ही सारी व्यवस्थाएँ बनाते रहने में तो अपनी भूल ही है, और इस भूल के कारण कुछ सिद्धि नहीं होने की है।

निज के सुध की भूल में विडंबना― एक बाबू जी अपने घर की व्यवस्था बना रहे थे तो उस व्यवस्था में जो चीज जहाँ रखनी है, रख दिया और उस जगह उस चीज का नाम डाल दिया। जूतों की जगह जूता लिख दिया, छाते की जगह छाता, कुर्ते की जगह कुर्ता, छड़ी की जगह छड़ी, यों सभी चीजें रख दिया और उसी जगह उसका नाम लिख दिया। यही तो व्यवस्था कहलाती है। इसी धुन में व्यवस्था में लगे हुए बाबू जी को नींद आ गयी। बाबू जी पलंग पर लेट गये। जहाँलेटे उस जगह लिख दिया मैं, याने यहाँ मैं धरा हूँ। सो गए। जब सुबह सोकर जगे, उठे तो देखा कि हमने जो व्यवस्था की थी वह ठीक है कि नहीं। जो चीज जहाँ धरी थी वह चीज वहीं पर ठीक-ठीक रखी है या नहीं? सब कुछ देखा तो ठीक दिखा। जब पलंग पर दृष्टि गई जहाँ पर मैं लिखा हुआ था वहाँ देखा तो मैं न था। सोचा कि मैं कहीं खो गया। खाट के छेदों में देखा कहीं मैं घुसा तो नहीं है, नीचे देखा कहीं टपक तो नहीं गया। जब कहीं न दिखा तो अपने नौकर को पुकारा। अरे मनुवा दौड़, देख मेरा मैं गुम गया। नौकर ने सोचा कि आज क्या हो गया बाबू जी को जो इस तरह की बात कह रहे हैं। वह बात समझ गया। कहा बाबूजी आप थक गये हैं, सो लो, आपका मैं आपको मिल जायगा। उसे विश्वास हो गया कि यह पुराना नौकर है झूठ न बोलेगा। कहीं देखा होगा, मिल जायेगा। बाबूजी सो गए। बाद में नौकर ने जगाया उठो बाबूजी देखो आपका मैं मिल गया कि नहीं। ज्यों ही जगेत्यों ही खाट पर हाथ फेरने लगे। बाबूजी बड़े खुश हुए ओह ! मेरा मैं मिल गया।

व्यामोही प्राणी की बेसुधी― अपने को भूले हुए बाबूजी की तरह ये लौकिकजन घर, दूकान आदिक की सारी व्यवस्थाएँबनाते हैं और इसका पता नहीं है कि मैं क्या हूँ, मुझे क्या करना चाहिये? ये सारी बातें भूल गए, इसका फल क्या होगा? यहाँ जो दिखती हुई मायामय दुनिया है, यह असार है। स्वप्न में देखी हुई बात स्वप्न में झूठ नहीं मालूम पड़ती, किंतु जब जग जाता है तब पता होता है, ओह सारा झूठा देखा, ऐसे ही मोह की नींद में यह सब कुछ मायारूप नहीं मालूम होता, वाह मेरे ही तो लड़के हैं, मेरा ही तो घर है। जो खुद है वह खुद को बड़ा अच्छा लगता। अभी किसी लड़की से कहो कि तुम लड़का हो तो वह कहेगी हट मैं क्यों लड़का होती? किसी छोटे लोगों से भी कहकर देख लो कोई बड़ी जाति का नाम लेकर तो वह उसे पसंद नहीं करता। मैं क्यों ऐसा होता? कैसा जाल छाया है, जो जिस पर्याय में है, जो जिस ढंग में है, तन में है उसे वह ही सब कुछ मालूम होता है। आप किसी बूढ़े आदमी से कहें कि तुम्हारे गाल भी पिचक गए, दांत भी गिर गए, सारा शरीर सिकुड़ गया, भूत जैसा तुम्हारा शरीर लगता है, देखो हमारा शरीर पुष्ट है, अच्छा है, इससे तुम राग करने लगो, अपने शरीर का राग छोड़ दो तो क्या वह अपने शरीर का राग छोड़ देगा? अरे कैसे छोड़ सकता है? उसके लिये तो वही अच्छा है।

धर्मपालन में एकचित्तता की आवश्यकता― यह लोक मायाजाल है, यह जन्म यह संसार अति ठगिया है। अब अपने कदम बढ़ावो आत्मकल्याण के लिये। जैसे किसी व्यापारी को समझाते हैं देखो तुम दसों काम न छेड़ों, किसी एक काम को मजबूती से पकड़ कर चलो तो तुम्हारा काम व्यवस्थित बनेगा। ऐसे ही थोड़ा पूजन में आ गये, थोड़ा सत्संग में आ गये, थोड़ा गुरुसेवा में आ गये, थोड़ा दूकान में, थोड़ा लड़कों बच्चों में, सब काम कर रहे हैं। अरे, तुम जितनी देर को धर्म करना चाहो उतनी देर को ऐसा पक्का साहस बनाकर उतरो कि मेरा मात्र मैं हूँ, और चित्त में प्रतीति में ऐसा दृढ़ विश्वास बना लो कि सब असार हैं बातें। मेरा तो केवल यह मैं चित्स्वरूप ही मेरे लिये सार हूँ। प्रतीति बना लो ऐसी। देखो इस शुद्ध ज्ञान के प्रताप से क्षमा, नम्रता, उदारता, सरलता सभी गुण विकसित हो जायेंगे। इस ग्रंथ की भूमिका में बात यह कह रहे हैं कि इस संसार को असार जानकर इसमें लीन मत हो और हित को न भूलो। एक आकांक्षा उत्पन्न करा रहे हैं ताकि हितभरी बातों को सुनकर यह श्रोता अपना कल्याण कर सके।


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