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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 11

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अविद्याप्रसरोद्भूतग्रहनिग्रहकोविदम्।

ज्ञानार्णवमिमं वक्ष्ये सतामानंदमंदिरम्।।11।।

ग्रंथकार का शुभ संकल्प― इस श्लोक में ग्रंथकार एक अपना शुभ संकल्प कर रहा है कि में इस ज्ञानार्णव ग्रंथ को कहूँगा। जो ग्रंथ अज्ञान के फैलाव से उत्पन्न हुआ जो परिग्रह पिशाच ग्रह है उसका विग्रह करने में प्रवीण है। बताओ भैया ! अनादिकाल से जो अज्ञान अंधकार आज तक छाया चला आ रहा है इसे समूल नष्ट करना है कि नहीं? नष्ट करना है ना? तो वह इन विधियों से ही तो नष्ट होगा। आचार्य संतों की वाणी सुनना, ज्ञानविज्ञान के भेदविज्ञान की बात सुनना और सुनकर उनका आचरण करना यही तो पद्धति है, इस अज्ञान अंधकार के संकटों को मिटाने की। तो यह करना चाहिये ना? अब जितना विलंब आप करेंगे उतना ही और संकटों में रहने की बात है। इस ग्रंथ में जो उपदेश होगा वह उपदेश अज्ञान अंधकार को मिटाने में समर्थ है।

आनंदमंदिर― यह ग्रंथ सज्जन पुरुषों के आनंद का मंदिर है। ज्ञान की बात सुनते जावो, प्रसन्न होते जावो, अपने आत्मा के निकट आते जावो। यही तो एक बड़ा बहुत आराम है, लोग आराम समझते हैं स्वच्छंद होकर पड़े रहने में। प्रमादी रहने में। पर आराम शब्द तो यह बतलाता है कि आराम। हे राम: आ। तब आराम हैं।रमंते योगिन: अस्मिन् इति राम:। जिस तत्त्व में योगीजन रमण करे उसे राम कहते हैं।वह है सहज शुद्ध चैतन्यस्वरूप परमब्रह्म चित्प्रकाश, केवल ज्ञाताद्रष्टा रहना, ऐसी स्थिति आये तो उसका नाम है आराम। ज्ञानी पुरुष अपने आत्मस्वरूप में रमण करके आत्मा के निकट पहुँचकर अपनी सारी थकान को दूर कर देते हैं। तो ये ज्ञान की बातें आनंद के घर हैं। और बाहरी प्रसंगों में कोई चित्त लगाता है तो उसमें उसे क्षोभ होता है, वे बाहरी प्रसंग शांति के कारण नहीं बन पाते हैं।

प्रकृत ग्रंथ की विहतपक्षता― यह ज्ञानार्णव ग्रंथ दो विशेषणों के द्वारा विशेष मर्म प्रकट कर रहा है― एक तो यह कि ग्रंथ सभी पक्षों को मिटा देगा, एकांत हठ मिटा देगा। ये जगत के प्राणी मिथ्यात्व के वशीभूत होकर अपनी-अपनी हठ बनाये हुये हैं। मिथ्यात्व दो प्रकार के हैं― एक अग्रहीत और दूसरा ग्रहीत। एक तो बिना सिखाये मिथ्यात्वबनता है और एक सिखाने से मिथ्यात्व बनता है। जैसे शरीर को आपा मानना, विषयकषायों से अपना हित समझना इन बातों को कोई सिखाता है क्या? यह अग्रहीत मिथ्यात्व है। इसमें पक्ष में बना है। क्या? जो मैं नहीं हूँ उसे मैं मानना, जो अपना अहित है उसे हित मानना। और सिखाये हुए मिथ्यात्व में तो वह बड़े कलात्मक ढंग से पक्ष का लोभी बनता है। जीव तो नित्य ही है, अनित्य ही है, एक ही है, अनेक ही है, इन एकांतों का पक्ष करता है। इस ग्रंथ के अध्ययन से दोनों प्रकार के पक्ष दूर हो जायेंगे।

आनंदधाम― ज्ञानार्णव शास्त्र का दूसरा विशेषण बताया है कि यह सज्जन पुरुषों के लिये शांति का मंदिर है। ग्रंथ की भूमिका के बाद पहिले बारह भावनाओं का वर्णन आयेगा। उन भावनाओं में जब हम भावित हो जावेंगे तब खुद समझेंगे कि हाँ आनंद का देने वाला यह ज्ञान है, इस ज्ञान को आनंदमंदिर कहा है। ज्ञान में आनंद विराजा है और यह ग्रंथ भी ज्ञान है। ज्ञानरूप अर्णव में अर्थात् समुद्र में आनंद विराजा है। जैसे समुद्र में अनेक रत्न भरे पड़े रहते हैं, इस ही प्रकार इस ज्ञान समुद्र में भी अनेक रत्न भरे पड़े हैं ऐसे इस ज्ञानार्णवग्रंथ को अथवा ऋषि संतों की परंपरा से चले आये हुये विशेष विज्ञान को अब इस ग्रंथ में कहेंगे।


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