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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 1005

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निरुध्य बोधपाशेन क्षिप्ता वैराग्यपंजरे।

हृषीकहरयो येन स मुनीनां महेश्वर:।।1005।।

मुनीगणों द्वारा ज्ञानपाश से बाँधकर वैराग्य पंजर में इंद्रियवानरों का निरोधन―जिस मुनि ने इंद्रियरूपी बंदरों को ज्ञानरूपी पाश से बांधकर वैराग्य पिंजरे में बंद कर दिया ऐसा योगी पुरुष ही मुनियों में महेश्वर कहा गया है। बंदर ऊधम करता है तो लोग क्या करते हैं कि उसे पकड़कर रस्से या सांकल से बांधकर उसे पिटारे में बंद कर देते हैं। लो बंदर असहाय हो गया, अब वह बाहर निकल नहीं सकता। इसी तरह ये इंद्रियरूपी बंदर अत्यंत चंचल हैं। क्षण-क्षण में कुछ से कुछ, विषय उपभोग इनमें रत रहा करती हैं ये इंद्रियाँ। तो इन इंद्रियरूपी बंदरों को ज्ञान की फांस से बाँधें याने ऐसा ज्ञान प्रकट करें कि इस ज्ञानबल से ये इंद्रियाँ नियंत्रित हो जायें। मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, ज्ञान के सिवाय और मेरा कोई कार्य नहीं, मेरा कार्य तो वह है जो मैं अपने आप सहज पर की अपेक्षा के बिना करता रहता हूँ। ज्ञातादृष्टा रहना मेरा कार्य है। सहज ज्ञानस्वरूप मेरा स्वभाव है। मेरे को और कुछ पडा क्या? करने को कुछ है ही नहीं। ज्ञानस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप परिणमता है। हाँ गलती यह हे कि मोह है, अज्ञान है, उस ज्ञान की जरा दुर्दशा कर रखी है। विकल्परूप में उसका नाच हो रहा है। तो कर्तव्य अब यह है कि ज्ञान को ज्ञानस्वरूप में मग्न करें। ज्ञान में ज्ञानस्वरूप ही विषय रहा करे। इतना ही तो कार्य हे मेरे लिए। अन्य कुछ काम तो पडा ही नहीं है, ऐसा ज्ञानबल बनायें और इंद्रिय विषयों को इस ज्ञानपाश से नियंत्रित करें और वैराग्य पिंजरे में बाँध दें। विरक्त पुरुषों की ऐसी दृष्टि होती है कि जिस किसी भी पदार्थ में मन अधिक चलता हो उस पदार्थ का त्याग कर देवें। जिस रस पर, जिस वस्तु पर, भोजन पर, किसी पर चित्त ज्यादह रहता हो, मन में वासना रहती हो, उस चीज का परित्याग कर दें। उसे तो वैराग्य और ज्ञान से प्रीति है, और बाहरी पदार्थों में प्रीति नहीं है। तो यों ज्ञानपाश से इंद्रिय को बांधकर उन्हें वैराग्य के पिंजड़े में डाल दें, यों ही खुला छोडने में लाभ न मिलेगा। तत्काल तो लाभ मिला, लेकिन वह फिर उद्दंड हो जायगा, ऐसा मौका आ सकता है। इसलिए वैराग्य के पिंजड़े में इसे बंद करें। अवकाश ही न रहे। जो पुरुष रात्रि में पानी नहीं पीते, रात्रिजल का त्याग कर देते हैं उनको प्यास नहीं लगती, इच्छा भी नहीं होती। थोड़ी बहुत प्यास लगी तो न लगे की तरह रहती है। रात्रि का समय बिना बाधा के व्यतीत हो जाता, क्योंकि त्याग कर दिया। वैराग्य के पिंजरे में बाँध दिया। अब उनको आकुलता नहीं होती। जब तक विषय की आशा लगी हे तब तक आकुलता है। तो इन इंद्रियरूपी बंदरों को ज्ञान की फांस से बांधो और वैराग्य पिंजड़े में बंद करो। यदि ऐसा कर सके तो वही वास्तव में मुनियों में महेश्वर हैं।


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